हनुमानगढ़ विधायक गणेश राज बंसल को बड़ी राहत देते हुए हाईकोर्ट ने की सख्त टिप्पणी, 23 साल पुराने मामले की दोनों FIR रद्द
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य की पुलिस ओर CID (CB) के खिलाफ बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए हनुमानगढ़ से विधायक गणेश राज बंसल के खिलाफ दर्ज दोनों FIR को रद्द कर दिया है।
जस्टिस अशोक कुमार जैन की अदालत द्वारा सुनाया गए फैसले की विस्तृत आदेश मंगलवार देर रात जारी किया गया.
फैसले में जस्टिस अशोक कुमार जैन ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा हैं कि पुलिस और CID (CB) को कानून के मुताबिक काम करना चाहिए, वें किसी व्यक्ति के आदेश पर कठपुतली नही बने.
आदेश में एकलपीठ ने विस्तृत फैसले में विधायक और उनके परिजनों के खिलाफ दर्ज FIR संख्या 624/2026 और 625/2026 को रद्द करते हुए उनसे जुड़ी सभी परिणामी कार्यवाहियों को भी समाप्त कर दिया।
कानून का खुला दुरूपयोंग है दोनो एफआईआर
कोर्ट ने मामले में यह भी कहा कि कथित घटना वर्ष 2003 की थी, जबकि दोनों FIR सितंबर 2026 में दर्ज की गईं। हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों FIR का दर्ज होना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग मात्र है।
अदालत ने अपने निष्कर्ष में कहा कि 23 साल बाद दर्ज की गई दोनों FIR कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग की श्रेणी में आती हैं। कोर्ट ने इसे याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रतिशोध और उत्पीड़न का मामला बताया।
कोर्ट ने कहा कि विधायक की पत्नी संतोष बंसल के खिलाफ आधिकारिक कृत्य के संबंध में 23 वर्ष बाद FIR दर्ज किया जाना, प्रतिशोध और उत्पीड़न का कृत्य है।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि शिकायतकर्ता के व्यक्तिगत पूर्वाग्रह और पक्षपात के कारण याचिकाकर्ताओं के प्रति वैमनस्य प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है।
एकलपीठ ने कहा कि उसे यह कहते हुए संकोच नहीं हैं कि FIR का पंजीकरण और उसके बाद की सभी कार्यवाहियां कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग की श्रेणी में आती हैं।
पुलिस और CID (CB) को फटकार, कानून से ऊपर कोई नहीं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले के अंत में राज्य की पुलिस और CID (CB) को भी कड़ी फटकार लगाई हैं.
कोर्ट ने कहा कि पुलिस और CID (CB) से अपेक्षा की जाती है कि वह कानून के अनुसार सख्ती से कार्य करे।
पुलिस किसी व्यक्ति विशेष के आदेश पर कानून के विरुद्ध कार्य करने वाली कठपुतली नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह संवैधानिक नैतिकता और संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखे। यदि कोई व्यक्ति कानून की अवहेलना करता है तो वह उसके लिए उत्तरदायी होगा, क्योंकि “कानून से ऊपर कोई नहीं है।”
तत्काल रिहा करने का आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने इसके साथ ही बंसल की ओर से दायर दोनो याचिकाओं को मंजूर करते हुए दोनो एफआईआर रद्द करते हुए विशेष रूप से आदेश दिया कि यदि गणेश राज बंसल FIR संख्या 624/2026 में हिरासत में हैं, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
जस्टिस अशोक कुमार जैन ने फैसले में एक ओर यह कानूनी सिद्धांत स्वीकार किया कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस को FIR दर्ज कर जांच करने का अधिकार है, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस की कार्रवाई कानून के अनुरूप होनी चाहिए।
क्या था पूरा मामला?
मामला हनुमानगढ़ नगर परिषद से जुड़ी वर्ष 2003 की कथित अनियमितताओं और जमीन/पट्टा प्रकरण से संबंधित था।
इस संबंध में वर्ष 2026 में दो FIR दर्ज की गईं।
दोनों FIR में IPC की धारा 420, 467, 468, 471 और 120-B के तहत आरोप लगाए गए थे। मामला सामने आने के बाद जांच CID (CB) को सौंप दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से क्या दलील दी गई?
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में FIR को राजनीतिक दबाव, प्रतिशोध और कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग का परिणाम बताते हुए कई महत्वपूर्ण दलीलें रखी गईं।
23 साल बाद दर्ज हुई FIR पर सवाल
याचिकाकर्ताओं के वकील कुणाल उपाध्याय ने कहा कि जिन घटनाओं को लेकर FIR दर्ज की गई हैं, वे वर्ष 2003 की हैं, लेकिन पुलिस ने करीब 23 साल बाद 17 और 18 सितंबर 2026 को FIR दर्ज की। इतनी लंबी देरी का कोई संतोषजनक कारण FIR में नहीं बताया गया।
2003 की घटना से आधिकारिक संबंध नहीं
याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से कहा कि वर्ष 2003 में गणेश राज बंसल न तो नगर परिषद के चेयरमैन थे, न पार्षद और न ही किसी आधिकारिक पद पर थे। उस समय उनकी पत्नी संतोष बंसल नगर परिषद की चेयरपर्सन थीं।
राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि गणेश राज बंसल राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं और वर्तमान में विधायक हैं। हालिया नगरपालिका चुनाव में उनके समर्थक कई पार्षद चुने गए, जिसके बाद उन्हें राजनीतिक रूप से दबाव में लेने के उद्देश्य से शिकायत कराई गई।
शिकायतकर्ता के पुराने मुकदमों का हवाला
याचिकाकर्ताओं ने शिकायतकर्ता संदीप सोनी द्वारा पूर्व में दायर विभिन्न याचिकाओं और मुकदमों का उल्लेख किया। उनके अनुसार शिकायतकर्ता पहले भी इसी विवाद से संबंधित न्यायिक कार्यवाहियों में सक्रिय रहे हैं।
पुराने मामलों में FIR की मांग स्वीकार नहीं हुई
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि इसी जमीन और विवाद से संबंधित पूर्व कार्यवाहियों में FIR दर्ज कराने की मांग को पहले भी अदालत के समक्ष उठाया गया था, लेकिन संबंधित कार्यवाहियों में राहत नहीं मिली।
पट्टा/लीज डीड पर गणेश राज बंसल की भूमिका नहीं
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि संबंधित पट्टा या लीज डीड लाभार्थियों द्वारा हस्ताक्षरित थे और गणेश राज बंसल की व्यक्तिगत भूमिका का कोई ठोस आधार नहीं बताया गया।
गिरफ्तारी पर भी आपत्ति
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के Satender Kumar Antil और Jaskaran Jeet Singh Deol के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि FIR दर्ज होने के तुरंत बाद गिरफ्तारी आवश्यक नहीं थी और गणेश राज बंसल की गिरफ्तारी कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी।
FIR को क्वैश करने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने State of Haryana v. Bhajan Lal के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि FIR की सामग्री से प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनता और पूरी कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से क्या जवाब दिया गया?
राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से याचिकाकर्ताओं के आरोपों का विरोध किया गया।
राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप से इनकार
अतिरिक्त महाधिवक्ता ने स्पष्ट रूप से राजनीतिक प्रतिशोध या पुलिस की दुर्भावना के आरोपों से इनकार किया।
पुलिस के लिए FIR दर्ज करना वैधानिक दायित्व
राज्य की ओर से कहा गया कि शिकायतकर्ता ने SHO के समक्ष शिकायत दी थी और संज्ञेय अपराध का आरोप होने के कारण BNSS की धारा 175 के तहत पुलिस FIR दर्ज करने के लिए बाध्य थी।
FIR दर्ज करने के समय को आधार नहीं बनाया जा सकता
राज्य ने कहा कि केवल यह तथ्य कि FIR वर्ष 2003 की कथित घटना को लेकर वर्ष 2026 में दर्ज हुई, अपने आप में FIR को अवैध नहीं बनाता।
CID (CB) ने स्वतंत्र जांच की
राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि गणेश राज बंसल के विधायक होने के कारण मामले की जांच CID (CB) को दी गई। जांच एजेंसी ने गवाहों के बयान दर्ज किए और दस्तावेज जुटाए।
गिरफ्तारी के लिए कस्टोडियल पूछताछ जरूरी बताई
राज्य ने कहा कि जांच के दौरान पुलिस को ऐसा प्रथम दृष्टया आधार मिला जिसके कारण गणेश राज बंसल को गिरफ्तार किया गया और disclosure, recovery तथा आगे साक्ष्य जुटाने के लिए custodial interrogation आवश्यक था।
राज्य ने आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड भी रखा
AAG ने गणेश राज बंसल के खिलाफ दर्ज पुराने आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड अदालत के सामने रखा। हालांकि फैसले के आगे के विश्लेषण में अदालत ने यह भी दर्ज किया कि प्रस्तुत 49 मामलों में से अधिकांश या तो बंद हो चुके थे अथवा उनमें अंतिम रिपोर्ट दाखिल हो चुकी थी; कुछ मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई थी।
शिकायतकर्ता की ओर से भी FIR बचाने की दलील
शिकायतकर्ता के वकील ने कहा कि केवल FIR के शुरुआती चरण में अदालत को जांच रोकने से बचना चाहिए और पुलिस को संज्ञेय अपराध की जांच का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के Neeharika फैसले का हवाला
शिकायतकर्ता की ओर से Neeharika Infrastructure v. State of Maharashtra का हवाला देते हुए कहा गया कि पुलिस को संज्ञेय अपराध की जांच करने का वैधानिक अधिकार है और अदालत को सामान्यतः जांच के शुरुआती चरण में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
विधायक होने के कारण प्रभाव का आरोप
शिकायतकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि गणेश राज बंसल के विधायक होने के कारण उनके प्रभाव से साक्ष्यों और गवाहों को प्रभावित किए जाने की आशंका थी।
FIR क्वैश न करने की मांग
शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि इस स्तर पर अदालत को तथ्यों की मिनी-ट्रायल जैसी जांच नहीं करनी चाहिए और जांच एजेंसी को अपना काम करने देना चाहिए।
हाईकोर्ट की एकलपीठ का विस्तृत आदेश
दोनो पक्षों की बहस सुनने के बाद मामले में हाईकोर्ट ने कई अहम टिप्पणियां की है।.
2003 के तथ्य पहले से प्रशासन के संज्ञान में थे
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का विश्लेषण करते हुए कहा कि संबंधित जमीन और विवाद से जुड़े तथ्य वर्ष 2003 में ही जिला प्रशासन के संज्ञान में थे। तत्कालीन अधिकारियों की रिपोर्ट और जिला कलेक्टर के निर्देशों का भी रिकॉर्ड में उल्लेख था।
2003 में किसी नगरपालिका पद पर नहीं थे
अदालत ने स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड किया कि वर्ष 2003 में गणेश राज बंसल न तो नगर परिषद के सदस्य थे और न ही किसी पद पर थे। अदालत ने यह भी कहा कि FIR में उनके द्वारा किसी आधिकारिक पद के दुरुपयोग का एक शब्द भी नहीं था।
23 साल की देरी को कोर्ट ने महत्वपूर्ण माना
कोर्ट ने पाया कि शिकायत में बताए गए तथ्य अचानक 17 या 18 सितंबर 2026 को सामने नहीं आए थे। वे लंबे समय से प्रशासन के संज्ञान में थे, लेकिन वर्ष 2003 से 2026 तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
कार्रवाई की टाइमिंग पर कोर्ट ने सवाल उठाए
अदालत ने रिकॉर्ड में यह भी नोट किया कि FIR दर्ज होने के तुरंत बाद गणेश राज बंसल को गिरफ्तार किया गया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस का हर मामले में तत्पर रहना अपेक्षित है, लेकिन अचानक इस तरह की कार्रवाई कई सवालों को जन्म देती है।
कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग पर कोर्ट का निष्कर्ष
अदालत ने सभी परिस्थितियों, FIR की सामग्री और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि दोनों FIR कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग की श्रेणी में आती हैं।
अदालत ने 23 साल बाद की गई कार्रवाई की परिस्थितियों और शिकायतकर्ता की पूर्व कार्यवाहियों को भी अपने विश्लेषण में शामिल किया।
पुलिस और CID (CB) को लेकर कड़ी टिप्पणी
फैसले में कोर्ट ने कहा कि पुलिस और CID (CB) से अपेक्षा है कि वे कानून के अनुसार सख्ती से काम करें।
अदालत ने कहा कि पुलिस किसी व्यक्ति के आदेश पर कानून के खिलाफ काम करने वाली “कठपुतली” नहीं है और कानून से ऊपर कोई नहीं है।
दोनों FIR रद्द, विधायक की तत्काल रिहाई का आदेश
हाईकोर्ट ने Miscellaneous Petition Nos. 9089/2026 और 9090/2026 को मंजूर करते हुए FIR संख्या 624/2026 दिनांक 17.09.2026 और 625/2026 दिनांक 18.09.2026 को रद्द कर दिया। इनसे जुड़ी सभी परिणामी कार्यवाहियां भी समाप्त कर दी गईं।
अदालत ने विशेष रूप से आदेश दिया कि यदि गणेश राज बंसल FIR संख्या 624/2026 में हिरासत में हैं, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।