Rajasthan High court ने पूछा- क्या गंभीर अपराधों में जारी गिरफ्तारी वारंट को आरोपी के अधिकार के रूप में जमानती वारंट में परिवर्तित किया जा सकता है?, 10 करोड़ से अधिक के फर्जी ITC मामले में आरोपी की याचिका पर महत्वपूर्ण आदेश
जयपुर, 27 नवंबर
Rajasthan High court में JUSTICE ANOOP KUMAR DHAND की एकलपीठ ने आर्थिक अपराधों में गिरफ्तारी वारंट को जमानती वारंट में बदलने संबंधी एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न को बड़ी पीठ (Larger Bench) को भेजते हुए विस्तृत आदेश पारित किया है।
मामला 10 करोड़ रुपये से अधिक के कथित फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) घोटाले से जुड़ा है, जिसमें आरोपी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 70(2) और BNSS की धारा 72(2) के तहत गिरफ्तारी वारंट रद्द कराने और समन या जमानती वारंट जारी करने की मांग की थी।
JUSTICE ANOOP KUMAR DHAND की एकलपीठ ने कानून बिंदु पर प्रश्न किया कि—
“क्या आर्थिक अपराध या हत्या/दुष्कर्म/दहेज हत्या/डकैती जैसे जघन्य और गंभीर अपराधों में जारी किए गए गिरफ्तारी वारंट को, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 70(2) और BNSS की धारा 72(2) के तहत, आरोपी के अधिकार के रूप में जमानती वारंट में परिवर्तित किया जा सकता है?”
10.65 करोड़ की टैक्स चोरी
याचिकाकर्ता निर्मल कुमार शर्मा पर आरोप है कि उसने फर्जी फर्मों के माध्यम से ₹10,65,23,833/- (10.65 करोड़ रुपये) का ITC क्लेम कर सरकार को नुकसान पहुँचाया।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि जांच एजेंसी ने जांच के दौरान कभी उसके लिए गिरफ्तारी आवश्यक नहीं समझी गई।
लेकिन मजिस्ट्रेट ने 11 मार्च 2025 को संज्ञान लेते ही सीधे गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया, जो प्रक्रिया का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने करोड़ों की जगह कथित कर चोरी की राशि केवल 6 लाख रुपये बताई और कहा कि आरोपी स्वयं कोर्ट में पेश होने को तैयार था, इसलिए समन या जमानती वारंट ही पर्याप्त थे।
अधिवक्ता ने इस मामले में P.C. Purohit बनाम Union of India (2025) के फैसले का हवाला भी दिया।
सरकार ने किया कड़ा विरोध
मामले की सुनवाई के दौरान यूनियन ऑफ इंडिया की ओर से पेश अधिवक्ता अक्षय भारद्वाज ने कड़ा विरोध जताते हुए याचिकाकर्ता पर तथ्य छुपाने का आरोप लगाया।
अधिवक्ता ने कहा कि आरोपी गलत तथ्यों के आधार पर कोर्ट को गुमराह कर रहा है।
सरकार की ओर से बताया गया कि वास्तविक कर चोरी 10.65 करोड़ रुपये है, न कि 6 लाख, और यह गंभीर एवं संगठित आर्थिक अपराध है।
सरकार ने कहा कि हाईकोर्ट ने पहले के आदेश में Girdhar Gopal Bajoria (2021) के मामले में ऐसे ही अपराध में NBW जारी करने को सही ठहराया था।
सरकार ने तर्क दिया कि P.C. Purohit का फैसला गलत तरीके से दिया गया था, क्योंकि उसमें इस पूर्व निर्णय का उल्लेख नहीं था— इसलिए वह निर्णय कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण (per incuriam) है।
हाईकोर्ट का आदेश
सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि आर्थिक अपराध अलग श्रेणी हैं, जो संपूर्ण राष्ट्र को प्रभावित करते हैं, इसलिए दृष्टिकोण कठोर होना चाहिए।
Highcourt ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में आर्थिक अपराधों पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा:
“फर्जी बिलिंग और फर्जी कंपनियों के माध्यम से करोड़ों का नुकसान पहुंचाना राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है। ऐसे अपराध पूर्व-नियोजित, संगठित और समाज के विश्वास को कमजोर करने वाले हैं।”
Highcourt ने सुप्रीम कोर्ट के Nimmagadda Prasad, Jagan Mohan Reddy, Rohit Tandon, Mohanlal Porwal का उल्लेख करते हुए आर्थिक अपराधों की गंभीरता को बताया।
लेकिन दोनों पक्षों की ओर से दिए गए दो विरोधाभासी फैसलों से सामने आए कानूनी सवाल पर कोर्ट ने कहा कि—
एक ही कानूनी बिंदू पर दो समान प्रकृति के आदेश नजीर के रूप में पेश किए गए हैं जिनके अंतिम निर्णय अलग-अलग हैं।
Rajasthan High court ने Girdhar Gopal Bajoria (2021) फैसला जिसमें गिरफ्तारी वारंट को सही बताया गया है, वहीं P.C. Purohit (2025) के फैसले में गिरफ्तारी वारंट को गलत बताया गया है।
Rajasthan High court ने कहा कि दोनों ही आदेश समान पीठों के परस्पर विरोधी निर्णय हैं, इसलिए इस कानूनी बिंदु पर लार्जर बेंच द्वारा स्पष्ट व्याख्या आवश्यक है।
लार्जर बेंच को रेफर
Rajasthan High court ने मामले को कानूनी बिंदु के साथ मुख्य न्यायाधीश को भेजते हुए लार्जर बेंच गठित करने का अनुरोध किया है।
हाईकोर्ट ने कानूनी प्रश्न प्रस्तुत करते हुए कहा:
“क्या आर्थिक अपराधों तथा हत्या, दुष्कर्म, दहेज हत्या, डकैती जैसे गंभीर अपराधों में जारी गिरफ्तारी वारंट को CrPC की धारा 70(2) / BNSS की धारा 72(2) के तहत, आरोपी के अधिकार के रूप में जमानती वारंट में परिवर्तित किया जा सकता है?”
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