32 वर्ष पुराने ठगी मामले में सजा बढ़ाने से इनकार, राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने 32 वर्ष पुराने एक आपराधिक मामले में राज्य सरकार और परिवादी द्वारा दायर सजा बढ़ाने की मांग को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण रिपोर्टेबल फैसला सुनाया है।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने इस मामले में दायर राज्य सरकार की आपराधिक अपील और परिवादी द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका—दोनों को रद्द करते हुए अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, नागौर द्वारा वर्ष 1988 में दिए गए फैसले को बरकरार रखा है।
ट्रायल कोर्ट का व्यापक विवेकाधिकार
जस्टिस फरजंद अली ने अपने फैसले में कहा कि जिन अपराधों में कानून द्वारा कोई न्यूनतम अनिवार्य सजा निर्धारित नहीं है, ऐसे में ट्रायल कोर्ट के पास न्यूनतम से लेकर अधिकतम सजा तक देने का अधिकार है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में ट्रायल कोर्ट को सजा देने का व्यापक विवेकाधिकार प्राप्त होता है।
कोर्ट ने कहा कि यदि यह विवेकाधिकार संतुलित और तार्किक ढंग से प्रयोग किया गया हो, तो अपीलीय अदालत को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया दोषसिद्धि एवं सजा का आदेश पूरी तरह कानूनसम्मत है और उसमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि अपीलीय अदालत का दायित्व केवल यह देखना होता है कि ट्रायल कोर्ट ने सजा तय करते समय कोई गंभीर कानूनी त्रुटि या गलती तो नहीं की है।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि सजा कम प्रतीत हो रही है, सजा में वृद्धि नहीं की जा सकती।
ये है मामला
वर्ष 1985 में परिवादी अजीज अली ने आरोप लगाया था कि अभियुक्त चंद्र अवतार और अब्दुल सलीम ने उसे विदेश भेजने का झांसा दिया।
आरोपियों ने दावा किया था कि वे उसके पासपोर्ट, वीजा और अन्य आवश्यक दस्तावेज आसानी से तैयार करवा देंगे और एक “आसान प्रोसेस” के जरिए उसे विदेश पहुंचा देंगे।
इन आश्वासनों पर विश्वास कर परिवादी ने अभियुक्तों को 13 हजार रुपये दिए। शिकायत के अनुसार न तो उसे विदेश भेजा गया और न ही दी गई राशि वापस की गई। इतना ही नहीं, परिवाद में यह भी आरोप लगाया गया कि अभियुक्तों ने इसी प्रकार 13 अन्य व्यक्तियों को भी ठगी का शिकार बनाया, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
मामले में बाद में यह आरोप भी लगाया गया कि कुछ रकम और सामान जबरन भी लिया गया, जिससे आरोपों की गंभीरता और बढ़ गई।
पुलिस जांच और ट्रायल
परिवादी की शिकायत पर पुलिस ने आईपीसी की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर आरोपियों को जांच के बाद गिरफ्तार कर चालान पेश किया।
कोर्ट ने धारा 420 (धोखाधड़ी), 392 (लूट), 120-बी (आपराधिक साजिश) सहित जालसाजी से जुड़ी धाराओं में आरोप तय किए।
ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने 26 गवाहों और बचाव पक्ष ने 2 गवाहों के बयान दर्ज कराए।
ट्रायल के बाद अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, नागौर ने 8 नवंबर 1988 को फैसला सुनाते हुए अब्दुल सलीम और चंद्र अवतार को 3—3 साल की सजा सुनाई।
सजा बढ़ाने की मांग
ट्रायल कोर्ट के इस फैसले से असंतुष्ट होकर परिवादी ने वर्ष 1989 में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर कर सजा को बढ़ाने की मांग की।
राज्य सरकार ने वर्ष 1993 में राजस्थान हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर कर सजा को बढ़ाने की मांग की।
दोनों याचिकाएं एक ही घटना और एक ही ट्रायल कोर्ट के फैसले से जुड़ी थीं, इसलिए हाईकोर्ट ने सहमति से दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई की।
सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने यह माना कि सजा तय करना एक न्यायिक विवेक का विषय है, जिसमें अपराध की प्रकृति, उसके तरीके, परिस्थितियां, अभियुक्त की उम्र, सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि, पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि न तो राज्य सरकार और न ही परिवादी कोई ऐसा ठोस आधार प्रस्तुत कर सके, जिससे यह साबित हो सके कि दी गई सजा इतनी कम है कि वह न्याय की अंतरात्मा को झकझोर दे।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए राज्य सरकार और परिवादी की याचिकाओं को खारिज करने का फैसला सुनाया।