₹5 करोड़ जमा होने के बावजूद अपराध की प्रकृति नहीं बदलती, लेकिन जमानत रद्द करने के आधार भी नहीं -राजस्थान हाईकोर्ट
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने जीएसटी चोरी से जुड़े एक बहुचर्चित मामले में प्रवर्तन एजेंसियों को बड़ी राहत देने से इनकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई जमानत को बरकरार रखा है।
जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकल पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से दायर जमानत रद्द करने की याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केवल धनराशि जमा कराने के आधार पर जमानत देना या रद्द करना, दोनों ही अपने-आप में कानून का मशीनी उपयोग नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों, अभियुक्त के आचरण, सह-आरोपियों की स्थिति, हिरासत अवधि और जमानत के दुरुपयोग की संभावना जैसे पहलुओं को निर्णायक माना।
₹9.39 करोड़ जीएसटी चोरी का मामला
यह मामला केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर यानी CGST अधिनियम, 2017 की धारा 132 से संबंधित है।
प्रवर्तन निदेशालय के जीएसटी इंटेलिजेंस के अनुसार, आरोपी अरुण जिंदल पर आरोप है कि उसने कथित रूप से 1.49 करोड़ किलोग्राम से अधिक लोहे के इंगट्स का गुप्त रूप से व्यापार करते हुए फर्जी इनवॉइस और ई-वे बिल का सहारा लिया।
विभाग का दावा है कि इस कथित गतिविधि से लगभग ₹9.39 करोड़ का जीएसटी नुकसान हुआ, जिससे राजकोष को भारी क्षति पहुंची।
ट्रायल कोर्ट ने 11 मार्च 2025 को आरोपी को जमानत देते समय यह शर्त रखी थी कि वह ₹5 करोड़ की राशि जमा कराए।
इस आदेश को केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी और कहा कि ट्रायल कोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या की है, क्योंकि धारा 132 के तहत ₹5 करोड़ से अधिक की कर-चोरी के मामलों में अपराध गैर-जमानती और संज्ञेय हो जाता है।
केंद्र सरकार की आपत्तियां
केंद्र की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने धारा 132 को धारा 138 (कम्पाउंडिंग) से जोड़ते हुए यह मान लिया कि आंशिक राशि जमा कराने से अपराध की प्रकृति बदल सकती है।
विभाग का तर्क था कि ₹9.39 करोड़ की कथित कर-चोरी में ₹5 करोड़ जमा कराने से न तो अपराध जमानती बनता है और न ही कम्पाउंडेबल।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले गजानन दत्तात्रेय गोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य का हवाला देते हुए कहा गया कि जमानत को किसी शर्तिया धनराशि से जोड़ना विधि-सम्मत नहीं है।
सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि आर्थिक अपराध अलग श्रेणी के होते हैं और इनका समाज व अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है, इसलिए ऐसे मामलों में सख्ती आवश्यक है।
बचाव पक्ष का पक्ष
वहीं, आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने सभी तथ्यों पर विचार कर जमानत दी थी।
आरोपी पहले ही ₹5 करोड़ की राशि जमा कर चुका है, जांच में सहयोग कर रहा है और जमानत का कोई दुरुपयोग नहीं किया गया है।
बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि आरोपी की हिरासत अवधि सीमित रही, अधिकतम सजा पांच वर्ष है, और अधिकांश गवाह सरकारी अधिकारी हैं—ऐसे में साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका नगण्य है।
इसके साथ ही, सह-आरोपियों में से कुछ को पहले ही हाईकोर्ट से राहत मिल चुकी है, जिससे समानता (Parity) का सिद्धांत लागू होता है।
हाईकोर्ट का आदेश
हाईकोर्ट ने धारा 132 और 138 का विस्तृत विश्लेषण करते हुए कहा कि ₹5 करोड़ से अधिक की कर-चोरी के मामलों में अपराध की प्रकृति गैर-जमानती होती है और केवल आंशिक भुगतान से यह स्थिति नहीं बदलती।
अदालत ने यह भी माना कि ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 138 (कम्पाउंडिंग) के संदर्भ में दी गई व्याख्या त्रुटिपूर्ण थी।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत निरस्तीकरण का प्रश्न केवल इसी त्रुटि पर निर्भर नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि जमानत रद्द करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है, जांच को प्रभावित किया है, या समाज के लिए खतरा उत्पन्न किया है—जो इस मामले में सामने नहीं आया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने महिपाल बनाम राजेश कुमार, वाई.एस. जगनमोहन रेड्डी बनाम सीबीआई और सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि आर्थिक अपराध गंभीर अवश्य हैं, लेकिन जमानत का निर्णय मेरिट्स, सजा की अवधि, हिरासत और आचरण के समग्र आकलन पर होना चाहिए।
साथ ही, गजानन दत्तात्रेय गोरे मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को इस संदर्भ में देखा गया कि वे जमानत दिए जाने के बाद की परिस्थितियों से संबंधित थीं, न कि इस प्रकरण की तरह जहां जमानत पहले ही दी जा चुकी है और उसका दुरुपयोग नहीं हुआ।
सह-आरोपियों की स्थिति और ‘Parity’
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ सह-आरोपियों को हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी है।
जब समान आरोप और परिस्थितियां हों, तो समानता के सिद्धांत के तहत अलग-अलग मापदंड अपनाना न्यायोचित नहीं होगा—खासकर तब, जब आरोपी ने कोई आपराधिक इतिहास न दिखाया हो।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की जमानत रद्द करने की याचिका को खारिज करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की त्रुटिपूर्ण व्याख्या के बावजूद, जमानत रद्द करने के लिए आवश्यक आधार मौजूद नहीं हैं। आरोपी द्वारा राशि जमा करना एकमात्र आधार नहीं था, बल्कि यह कई सहायक तथ्यों में से एक था।