हाईकोर्ट ने सरकार को लगाई कड़ी फटकार, कहा ऐसे आवेदन से पहले ले उचित कानूनी सलाह
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने NDPS एक्ट से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और जांच में हेरफेर के मामले में आरोपी महिला SHO सीमा जाखड़ की जमानत रद्द करने से इनकार कर दिया।
जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने राज्य सरकार द्वारा दायर जमानत निरस्तीकरण आवेदन को खारिज करते हुए कहा कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर पहले से दी गई जमानत रद्द नहीं की जा सकती।
बहुचर्चित सीमा जाखड़ मामला
मामला सिरोही जिले के बरलूट थाना क्षेत्र में दर्ज FIR नंबर 143/2021 से जुड़ा है।
राज्य सरकार की ओर से आरोप लगाया गया था कि तत्कालीन SHO सीमा जाखड़ ने 141 किलो डोडा पोस्त के साथ पकड़े गए आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई को ₹10 लाख की रिश्वत लेकर कमजोर किया और पुलिस रिकॉर्ड में हेरफेर किया।
अभियोजन के अनुसार, आरोपियों को बचाने के लिए राजनामचा में झूठी एंट्री की गई कि आरोपी मौके से फरार हो गए।
इस मामले में सीमा जाखड़ को राजस्थान हाईकोर्ट से 20 जुलाई 2022 को जमानत मिल गई थी।
इस जमानत के खिलाफ राज्य सरकार ने अपील दायर कर हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता राज्य सरकार की दलील
राजस्थान सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने हाईकोर्ट में दायर जमानत निरस्तीकरण आवेदन में कहा कि आरोपी सीमा जाखड़ उस समय सिरोही जिले के बरलूट थाने में SHO के पद पर कार्यरत थीं।
अभियोजन के अनुसार, 14 नवंबर 2021 को पुलिस ने कार में जा रहे रमेश कुमार और दिनेश कुमार को पकड़ा था, जिनके कब्जे से 141 किलो डोडा पोस्त बरामद हुआ था।
आरोप है कि इसके बाद सह-आरोपी हेमाराम और अशोक से ₹10 लाख की अवैध रिश्वत लेकर SHO सीमा जाखड़ ने पूरे मामले को कमजोर कर दिया और आरोपियों को बचाने के लिए पुलिस रिकॉर्ड में हेरफेर किया।
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि पूर्व में 20 जुलाई 2022 को हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत में मामले की गंभीरता पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।
सरकार का कहना था कि अदालत ने केवल IPC की धारा 221 को ध्यान में रखा, जिसकी सजा अधिकतम तीन वर्ष है, जबकि आरोपी के खिलाफ NDPS एक्ट की धारा 8/15, 29, 27A और 59 जैसे गंभीर अपराध भी बनते हैं।
अभियोजन ने तर्क दिया कि इतनी गंभीर धाराओं वाले मामले में आरोपी को जमानत देना उचित नहीं था और इसलिए पूर्व में पारित जमानत आदेश को वापस लेकर जमानत रद्द की जानी चाहिए।
राज्य सरकार ने यह भी कहा कि मामले में पुलिस जांच को जानबूझकर प्रभावित किया गया और रिकॉर्ड में झूठी प्रविष्टियां कर यह दर्शाया गया कि डोडा पोस्त ले जा रहे आरोपी मौके से फरार हो गए थे।
अभियोजन का कहना था कि इस प्रकार का कृत्य NDPS जैसे गंभीर अपराध में कानून व्यवस्था और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला है, इसलिए आरोपी को जमानत पर बने रहने का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
प्रतिवादी सीमा जाखड़ की दलील
सीमा जाखड़ की ओर से अधिवक्ता धीरेन्द्रसिंह और प्रियंका बोराणा ने राज्य सरकार की जमानत निरस्तीकरण अर्जी का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी एक महिला हैं और उन्हें 20 जुलाई 2022 को विधिवत जमानत दी गई थी।
अधिवक्ता ने कहा कि पिछले लगभग चार वर्षों से वह लगातार जमानत पर हैं और इस दौरान उन्होंने न तो जमानत की किसी शर्त का उल्लंघन किया और न ही ट्रायल को प्रभावित करने या गवाहों को धमकाने जैसी कोई हरकत की।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी एक सरकारी कर्मचारी हैं और उनके फरार होने की कोई संभावना नहीं है। पूर्व जमानत सुनवाई के दौरान भी यह दलील दी गई थी कि आरोपी के पास से कोई रिश्वत राशि बरामद नहीं हुई है तथा जांच और ट्रायल पूरा होने में लंबा समय लग सकता है।
अधिवक्ता धीरेन्द्रसिंह और प्रियंका बोराणा ने कहा कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर जमानत रद्द नहीं की जा सकती, खासकर तब जब जमानत मिलने के बाद आरोपी के खिलाफ किसी प्रकार के दुरुपयोग या अवैध गतिविधि का आरोप सामने नहीं आया हो।
प्रतिवादी की ओर से यह भी कहा गया कि राज्य सरकार वास्तव में जमानत रद्द कराने के बजाय पुराने जमानत आदेश की समीक्षा चाहती है, जबकि हाईकोर्ट किसी समन्वय पीठ द्वारा दिए गए आदेश पर अपीलीय अदालत की तरह पुनर्विचार नहीं कर सकता।
बचाव पक्ष ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437(1) का हवाला देते हुए कहा कि महिलाओं को जमानत मामलों में विशेष रियायत और उदार दृष्टिकोण दिया जाता है।
हाईकोर्ट का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि “जमानत रद्द करना” और “गलत अथवा अवैध जमानत आदेश को निरस्त करना” दोनों अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एक बार जमानत दिए जाने के बाद उसे केवल असाधारण परिस्थितियों में ही रद्द किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि जमानत निरस्तीकरण के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि आरोपी ने जमानत का दुरुपयोग किया हो, गवाहों को प्रभावित किया हो, साक्ष्यों से छेड़छाड़ की हो, जांच में बाधा डाली हो, फरार होने की कोशिश की हो या किसी नई प्रतिकूल परिस्थिति का उद्भव हुआ हो।
जमानत रद्द करना एक “कठोर कदम”
केवल यह कहना कि पहले की अदालत ने अपराध की गंभीरता का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं किया, जमानत रद्द करने का वैध आधार नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Abhimanyu vs State of Kerala, Ranjit Singh vs State of M.P. और Abdul Basit vs Mohd. Abdul Kadir Chaudhary मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई जमानत आदेश “अवैध” या “विकृत” हो, तो उसे उच्चतर अदालत द्वारा चुनौती दी जा सकती है,
लेकिन उसी अदालत द्वारा केवल पुनर्मूल्यांकन के आधार पर जमानत रद्द नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत रद्द करना एक “कठोर कदम” है, जिसके लिए मजबूत और ठोस आधार होना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने दोहराया कि भारतीय न्यायशास्त्र में “बेल नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत लागू होता है। इसलिए केवल अपराध की गंभीरता या अभियोजन की असहमति के आधार पर किसी आरोपी को दोबारा जेल भेजना उचित नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार की ओर से दाखिल आवेदन मुख्य रूप से इस आधार पर था कि पूर्व समन्वय पीठ ने अपराध की गंभीरता को सही तरीके से नहीं समझा।
अदालत ने कहा कि वह किसी अन्य समन्वय पीठ द्वारा पारित जमानत आदेश पर अपीलीय अदालत की तरह पुनर्विचार नहीं कर सकती।
महिला के प्रति उदार दृष्टिकोण
महिला आरोपी के संदर्भ में अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437(1) का उल्लेख करते हुए कहा कि महिलाओं को जमानत मामलों में उदार दृष्टिकोण देने का विधिक प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट के Kalvakuntla Kavitha और Saumya Chaurasia मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि कई बार महिलाएं ऐसे अपराधों में दूसरों द्वारा उपयोग की जाती हैं और इसलिए न्यायालयों को उनके मामलों में संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
अंत में जस्टिस अशोक कुमार जैन ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार को जमानत निरस्तीकरण आवेदन दाखिल करने से पहले उचित कानूनी सलाह लेनी चाहिए थी।
कोर्ट ने आवेदन को “भ्रामक”, “गलत अवधारणा पर आधारित” और “मेरिट रहित” बताते हुए खारिज कर दिया।