जयपुर। दहेज मृत्यु के मामलों की जांच और पुलिस अधिकारियों की शक्तियों को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी गंभीर आपराधिक मामले में चार्जशीट दाखिल होने से पहले जांच संतोषजनक नहीं पाई जाती, तो पुलिस अधीक्षक (SP) आगे की जांच (Further Investigation) के आदेश दे सकता है और ऐसा आदेश पूरी तरह वैधानिक माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने विस्तृत फैसले में कहा है कि निष्पक्ष जांच संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी ही नहीं बल्कि पीड़ित और समाज-तीनों का अधिकार है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि
“फेयर इन्वेस्टिगेशन” न्याय व्यवस्था की आत्मा है और यदि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को जांच में कमी नजर आती है, तो वह जांच दोबारा या आगे बढ़ाने के निर्देश दे सकता है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने अलवर निवासी तैमूर की ओर से दायर आपराधिक याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला दिया है।
कोर्ट ने कहा कि एसपी अलवर द्वारा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) को आगे की जांच के निर्देश देना कानूनन वैध था। अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता जरूर दी कि वह एडिशनल एसपी के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए निष्पक्ष जांच की मांग कर सकता है।
अलवर जिले का मामला
यह मामला अलवर जिले के मालाखेड़ा थाना क्षेत्र में 14 जनवरी 2019 को दर्ज हुई FIR नंबर 30/2019 का है।रिपोर्ट मृतका रिहाना के भाई रफी मोहम्मद ने दर्ज कराई थी।
FIR में IPC की धारा 498A और 304B के तहत पति, सास और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना और दहेज मृत्यु के आरोप लगाए गए।
रिपोर्ट में आरोप था कि विवाह के बाद से ही मृतका को दहेज के लिए परेशान किया जाता था और लगातार मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना दी जा रही थी।
बाद में उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। चूंकि मौत विवाह के सात वर्ष के भीतर हुई थी, इसलिए मामला दहेज मृत्यु की श्रेणी में दर्ज किया गया।
शुरुआती जांच के दौरान पुलिस ने मृतका के परिजनों और गांव के कई लोगों के बयान दर्ज किए।
इन बयानों में मुख्य रूप से मृतका के पति शाहरुख खान और उसकी मां अलीमन के खिलाफ गंभीर आरोप सामने आए।
इसके बाद जांच अधिकारी ने प्रथम दृष्टया इन्हीं दो आरोपियों की भूमिका को प्रमुख माना।
प्रारंभिक जांच के दौरान दर्ज 12 गवाहों के बयानों में तैमूर के खिलाफ कोई ठोस आरोप सामने नहीं आए थे।
गवाहों ने मुख्य रूप से मृतका के पति शाहरुख खान और सास अलीमन पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने के आरोप लगाए थे।
इसी आधार पर जांच अधिकारी ने प्रथम दृष्टया केवल दो आरोपियों के खिलाफ मामला पाया था और बाकी आरोपियों, जिनमें तैमूर भी शामिल था, के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं पाए गए।
21 फरवरी 2019 को एसपी अलवर ने एडिशनल एसपी को “Further Investigation” का आदेश दिया।
इसी आदेश के खिलाफ मृतका के देवर तैमूर की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।
पक्षकार का कहना था कि ऐसी जांच का आदेश केवल अदालत दे सकती है, पुलिस अधीक्षक नहीं।
देवर तैमूर पहुंचा हाईकोर्ट
मामले में आरोपी बनाए गए तैमूर ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर FIR और उसके खिलाफ चल रही पूरी कार्रवाई को रद्द करने की मांग की।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि FIR में उसका नाम जरूर शामिल किया गया था, लेकिन जांच के दौरान दर्ज 12 गवाहों के बयानों में उसके खिलाफ कोई विशिष्ट आरोप नहीं था।
सभी गवाहों ने केवल पति शाहरुख खान और सास अलीमन का नाम लिया था।
तैमूर की ओर से कहा गया कि—
प्रारंभिक जांच में उसके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला। पुलिस ने पहले उसे निर्दोष माना। बाद में राजनीतिक और दबावपूर्ण परिस्थितियों में उसे फंसाने की कोशिश की गई। एसपी द्वारा आगे की जांच के आदेश देना कानूनन गलत था।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि 21 फरवरी 2019 को एसपी अलवर ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) को “Further Investigation” के आदेश दिए, लेकिन वास्तव में यह “Re-Investigation” थी, क्योंकि उन्हीं गवाहों के दोबारा बयान लिए गए।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि CrPC के तहत पुनः जांच का अधिकार केवल अदालत को है, पुलिस अधीक्षक को नहीं।
सरकार का विरोध और परिवादी परिवार की दलीलें
मृतका के देवर की ओर से दायर याचिका का राज्य सरकार के साथ-साथ मृतका के परिजनों यानी परिवादी पक्ष की ओर से कड़ा विरोध किया गया।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में कहा कि मृतका की मौत बेहद संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी और मामला गंभीर प्रकृति का है।
FIR में सभी आरोपियों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना के आरोप लगाए गए थे।
राज्य सरकार ने कहा कि प्रारंभिक जांच निष्पक्ष और संतोषजनक तरीके से नहीं हुई थी।
इसी कारण एसपी अलवर ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को जांच सौंपते हुए आगे की जांच के निर्देश दिए।
सरकार ने अदालत को बताया कि—
जांच अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। सभी आरोपियों के खिलाफ अंतिम रिपोर्ट दाखिल नहीं हुई थी। धारा 173(8) CrPC के तहत आगे की जांच जारी थी।वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को ऐसी जांच कराने का अधिकार है।
सरकार ने यह भी कहा कि तैमूर लंबे समय तक जांच में शामिल नहीं हुआ और केवल FIR रद्द करवाने के उद्देश्य से हाईकोर्ट पहुंचा है।
हाईकोर्ट का फैसला
सभी पक्षों की दलीलें और बहस सुनने के बाद जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने मामले से जुड़े दस्तावेज, गवाहों के बयान और जांच रिपोर्ट का विस्तृत परीक्षण किया।
हाईकोर्ट ने माना कि प्रारंभिक बयानों में याचिकाकर्ता का नाम था, लेकिन प्रत्यक्ष आरोप पति शाहरुख खान और अलीमन के खिलाफ अधिक थे।
हालांकि अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि उस समय तक न तो याचिकाकर्ता के पक्ष में अंतिम रिपोर्ट दाखिल हुई थी और न ही सभी आरोपियों के खिलाफ जांच समाप्त हुई थी।
कोर्ट ने कहा कि यदि जांच अधूरी है और वरिष्ठ अधिकारी को लगता है कि निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो वह आगे की जांच के आदेश दे सकता है।
“निष्पक्ष जांच आरोपी ही नहीं, पीड़ित का भी अधिकार”
राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट में निष्पक्ष जांच के सिद्धांत को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए टिप्पणी की।
हाईकोर्ट ने कहा कि—
निष्पक्ष जांच और निष्पक्ष सुनवाई संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 39-A में निहित अधिकार हैं।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने कहा कि—
न्याय केवल आरोपी को बचाने के लिए नहीं है। पीड़ित पक्ष और समाज को भी निष्पक्ष जांच का अधिकार है। यदि जांच पक्षपातपूर्ण होगी, तो न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास खत्म हो जाएगा।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Nirmal Singh Kahlon vs State of Punjab फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी को निष्पक्ष जांच का मौलिक अधिकार प्राप्त है।
वहीं Subramanian Swamy vs CBI मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हर आपराधिक जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और बिना पूर्वाग्रह के होनी चाहिए।
SP की शक्तियों पर हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पुलिस अधीक्षक की शक्तियों को लेकर रहा।
हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 36, 173(2), 173(3) और 173(8) का विस्तृत विश्लेषण करते हुए कहा कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को थाना प्रभारी के समान शक्तियां प्राप्त हैं।
कोर्ट ने कहा कि SP जांच की निगरानी कर सकता है। यदि जांच संतोषजनक नहीं लगे तो आगे की जांच के आदेश दे सकता है। जरूरत पड़ने पर वरिष्ठ अधिकारी खुद भी जांच संभाल सकता है और ऐसी कार्रवाई को अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं माना जा सकता।
अदालत ने टिप्पणी की कि कानून का उद्देश्य केवल औपचारिक जांच नहीं बल्कि “सच्चाई तक पहुंचना” है।
चार्जशीट से पहले कोर्ट की अनुमति जरूरी नहीं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक और महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया।
कोर्ट ने कहा कि यदि मूल चार्जशीट अभी तक न्यायालय में दाखिल नहीं हुई है, तो आगे की जांच के लिए अदालत की अनुमति लेना आवश्यक नहीं है।
अदालत ने कहा कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के पास आगे की जांच कराने का अधिकार है।
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एक बार चार्जशीट दाखिल हो जाने के बाद आगे की जांच के लिए न्यायालय की अनुमति जरूरी हो सकती है।
पटना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों का हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने Abdul Sattar vs State of Bihar मामले का हवाला देते हुए कहा कि नया जांच अधिकारी पुराने गवाहों के बयान दोबारा लेकर अपनी संतुष्टि बना सकता है और यह प्रक्रिया कानून के तहत वैध है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि जांच में कोई नई सामग्री सामने आती है, तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि—
न्याय का उद्देश्य सच्चाई तक पहुंचना है, न कि तकनीकी आधार पर जांच को रोक देना।
आखिर में क्या बोला हाईकोर्ट?
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि एसपी अलवर द्वारा 21 फरवरी 2019 को जारी आदेश वैध था।
आगे की जांच कराने में कोई अवैधता नहीं थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि FIR रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता और याचिका में merit नहीं है।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने तैमूर की याचिका खारिज कर दी।
हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वह अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण), अलवर के समक्ष अपना प्रतिनिधित्व पेश कर सकता है, जिसे निष्पक्ष और कानून के अनुरूप विचार किया जाएगा।
क्यों अहम है यह फैसला?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला कई कारणों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है—
- यह निर्णय स्पष्ट करता है कि SP को आगे की जांच के आदेश देने का अधिकार है।
- दहेज मृत्यु जैसे गंभीर मामलों में निष्पक्ष जांच को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।
- अदालत ने आरोपी और पीड़ित—दोनों के अधिकारों के संतुलन पर जोर दिया है।
- यह फैसला भविष्य के आपराधिक मामलों में पुलिस जांच की वैधता तय करने में मिसाल बन सकता है।
राजस्थान हाईकोर्ट का यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब देशभर में दहेज मृत्यु और महिलाओं के खिलाफ अपराधों की जांच को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले से स्पष्ट संकेत दिया है कि गंभीर अपराधों में जांच को तकनीकी आधार पर रोका नहीं जा सकता और सच्चाई तक पहुंचना ही न्याय का मूल उद्देश्य है।