कॉन्स्टेबल की बर्खास्तगी को हाईकोर्ट ने बताया “आर्थिक मौत”, तीन माह में पुन: बहाल पर विचार करने के आदेश
जोधपुर, 6 दिसंबर 2025
राज्य के पुलिस विभाग द्वारा एक कांस्टेबल के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही के तहत कि गयी बर्खास्तगी की प्रक्रिया पर सख्त रूख अपनाते हुए रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है.
राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग द्वारा बर्खास्त किए गए कांस्टेबल की पुन: बहाली का आदेश देते हुए किसी कर्मचारी को सेवा से हटाने को उसकी आर्थिक मृत्यु के समान बताया हैं.
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने नागौर निवासी याचिकाकर्ता शंकरराम की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया हैं.
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पुलिस जैसे अनुशासित विभाग में नैतिकता और ईमानदारी के मानक जरूर ऊँचे होने चाहिए, परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि किसी कर्मचारी को केवल अनुमान या प्रारंभिक जांच के आधार पर बर्खास्त कर दिया जाए.
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुशासनिक कार्रवाई का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि दंड देने की प्रवृत्ति को संतुष्ट करना.
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी कठोर कार्रवाई तभी की जा सकती है जब ठोस, विश्वसनीय और नियमित विभागीय जांच में आरोप प्रमाणित पाया गया हो.
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता शंकरराम की बर्खास्तगी को गैरकानूनी बताते हुए कहा कि यह आदेश साक्ष्यों के विपरीत और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
ठगी का आरोप
नागौर जिले की मेड़ता सिटी तहसील के सिराधना निवासी शंकरराम को वर्ष 2008 में बतौर कांस्टेबल पुलिस विभाग में नियुक्ति दी गई।
नियुक्ति के एक वर्ष बाद ही याचिकाकर्ता पर आरोप लगा कि उसने प्रशिक्षण के दौरान वर्ष 2009-10 में पुलिस प्रशिक्षण केंद्र की कैंटीन चलाने वाले ठेकेदार से उसके बेटे को कांस्टेबल की नौकरी दिलाने का झांसा देकर ठगी की।
आरोप में कहा गया कि ठेकेदार के बेटे ने याचिकाकर्ता को 50,000 अग्रिम के तौर पर दिए, जो शंकरराम और उनके चचेरे भाई के खातों में जमा हुए।
पुलिस विभाग ने इस लेन-देन को “नौकरी के नाम पर ठगी” माना, जबकि शंकरराम ने पूरे मामले को गलत ठहराते हुए कहा कि यह राशि एक मित्रवत उधार थी जिसे उन्होंने बाद में चुका दिया था।
विभाग की कार्रवाई
आरोपों के बाद 4 मई 2015 को शंकरराम के खिलाफ चार्जशीट जारी की गई।
जांच पूरी होने के बाद 29 नवंबर 2016 को अनुशासनिक अधिकारी ने उन्हें दो वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने की सजा दी।
शंकरराम ने इस आदेश को अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष चुनौती दी, लेकिन अपीलीय अधिकारी ने इसे “अपर्याप्त सजा” बताते हुए मामला पुनर्विचार हेतु लौटा दिया।
अपीलीय अधिकारी के आदेश के बाद विभाग ने सजा बढ़ाकर चार वेतन वृद्धि रोकने का आदेश दिया।
लेकिन इसके बाद, जोधपुर रेंज के आईजी ने स्वप्रेरणा से कार्रवाई करते हुए पुराने सभी आदेश रद्द कर दिए और 15 मई 2018 को शंकरराम को बर्खास्त करने का आदेश दिया।
एफआर के बावजूद सख्त कार्रवाई
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विवेक फिरोड़ा, जयराम सारण और निखिल बिश्नोई ने तर्क दिया कि विभागीय जांच में अभियोजन अपना आरोप सिद्ध नहीं कर सका।
इस मामले में मुख्य गवाह और शिकायतकर्ता और उसके बेटे ने नियमित जांच के दौरान अपने बयान बदल दिए और स्पष्ट कहा कि ₹50,000 की राशि नौकरी के नाम पर नहीं बल्कि निजी जरूरतों के लिए ली गई थी, जिसे बाद में लौटा दिया गया।
शिकायतकर्ता ने अपने जवाब में कहा कि शिकायत दबाव में दी गई थी और अब मामला आपसी सहमति से सुलझ चुका है।
इस मामले में जांच के बाद पुलिस ने एफआर लगाते हुए कहा कि यह एक सिविल प्रकृति का विवाद था, पुलिस की एफआर को कोर्ट ने भी मंजूर कर लिया।
अदालत को बताया गया कि जब आपराधिक जांच में कोई अपराध नहीं पाया गया और विभागीय जांच में भी आरोप प्रमाणित नहीं हुए, तब आईजी द्वारा केवल प्रारंभिक जांच की सामग्री के आधार पर बर्खास्तगी देना कानूनी रूप से अस्थिर और मनमाना निर्णय है।
सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से सरकारी वकील ने तर्क दिया कि पुलिस बल एक अनुशासित संस्था है, जहाँ नैतिक आचरण और ईमानदारी की सर्वोच्च अपेक्षा होती है।
उन्होंने कहा कि विभागीय जांच की प्रकृति आपराधिक जांच से भिन्न होती है। आपराधिक मामलों में “संदेह से परे प्रमाण” की आवश्यकता होती है, जबकि विभागीय मामलों में केवल “संभावनाओं की प्रबलता” (Preponderance of Probabilities) ही पर्याप्त होती है।
सरकार का पक्ष था कि गवाहों का मुकर जाना या आपसी सुलह हो जाना इस तथ्य को नहीं मिटाता कि धनराशि का लेन-देन हुआ था, और यह स्वयं एक अनुशासनहीनता का उदाहरण है।
हाईकोर्ट का आदेश
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने कहा कि आईजी ने अपने समीक्षा अधिकारों का प्रयोग मनमाने ढंग से और बिना तथ्यों का परीक्षण किए किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुशासनिक अधिकारी का आदेश 27 पृष्ठों का विस्तृत आदेश था जिसमें गवाहों और साक्ष्यों का समुचित विश्लेषण किया गया था। ऐसे में उसे “नॉन-स्पीकिंग” बताकर खारिज करना “मानसिक अनुप्रयोग की कमी” (non-application of mind) को दर्शाता है।
एकलपीठ ने कहा कि
“प्रारंभिक जांच का उद्देश्य केवल यह तय करना होता है कि क्या नियमित जांच शुरू की जाए। एक बार नियमित जांच शुरू हो जाए, तो केवल उसी जांच में प्रस्तुत साक्ष्य दंड के निर्धारण का आधार बन सकते हैं।”
हाईकोर्ट ने कहा कि आईजी ने गवाहों के पलटने, एफआर रिपोर्ट और विभागीय जांच के साक्ष्यों को दरकिनार कर केवल प्रारंभिक जांच के निष्कर्षों पर भरोसा किया, जो कि विधिसम्मत नहीं है।
आईजी का रवैया पूर्वाग्रहपूर्ण
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में आईजी का रवैया पूर्वाग्रहपूर्ण प्रतीत होता है क्योंकि उन्होंने पहले अनुशासनिक अधिकारी को सजा बढ़ाने का निर्देश दिया और बाद में स्वप्रेरणा से कार्रवाई करते हुए बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह दर्शाता है कि अधिकारी पहले से ही कठोर सजा देने के लिए मानसिक रूप से तैयार थे, जो निष्पक्ष प्रक्रिया के विपरीत है।
कोर्ट ने कहा कि “न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य साक्ष्यों की दुबारा समीक्षा करना नहीं, बल्कि प्रक्रिया की वैधानिकता और निर्णय को तर्कसंगतता पर जांच करना होता है। जब निर्णय स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण या मनमाना हो, तब अदालत का हस्तक्षेप आवश्यक है।”
आदेश रद्द
राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पुलिस कांस्टेबल को बर्खास्त करने सहित 15 मई 2018 को पारित आईजी के आदेश सहित सभी रिमांड आदेशों को निरस्त कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि शंकरराम को तत्काल सेवा में बहाल किया जाए और उनकी सेवा अवधि को निरंतर माना जाए। हालांकि, बर्खास्तगी से बहाली तक की अवधि का वेतन तुरंत नहीं मिलेगा; उसका निर्णय पुनर्विचार के बाद किया जाएगा।
हाईकोर्ट ने जोधपुर रेंज के आईजी को निर्देश दिया कि वे तीन माह के भीतर पुनः विचार कर सजा निर्धारित करें। यह पुनर्विचार केवल नियमित विभागीय जांच के साक्ष्यों पर आधारित होगा, न कि प्रारंभिक जांच रिपोर्ट पर।