14 साल में भी MBBS पूरा नहीं करने वाले छात्र को हाईकोर्ट का राहत देने से इनकार
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने 14 वर्ष में एमबीबीएस पूर्ण नहीं करने वाले स्टूडेंट के एक मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल सहानुभूति के आधार पर ऐसे छात्र को चिकित्सक बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जो वर्षों तक लगातार अवसर मिलने के बावजूद न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता प्राप्त करने में असफल रहा हो।
राजस्थान हाईकोर्ट ने एमबीबीएस को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि एमबीबीएस की डिग्री केवल एक अकादमिक प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि मरीजों का उपचार करने का लाइसेंस है, इसलिए ऐसे मामलों में सार्वजनिक हित सर्वोपरि है।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस मनीष शर्मा की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता स्टूडेंट शेख तौरीक की ओर से दायर विशेष अपील को खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला दिया है।
याचिकाकर्ता ने वर्ष 2010 में एमबीबीएस में प्रवेश लिया था और 2024 में आयोजित अंतिम सेमेस्टर की परीक्षा भी पास नहीं कर सका था। जिसके बाद याचिकाकर्ता ने अंतिम सेमेस्टर की परीक्षा के शेष विषयों में बैठने की अनुमति मांगी थी।
2010 में लिया था प्रवेश, 14 वर्ष बाद भी MBBS नहीं हुआ पूरा
अपीलकर्ता ने वर्ष 2010 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (NIMS) यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस में प्रवेश लिया था।
इसके बाद उसने प्रथम वर्ष से लेकर अंतिम प्रोफेशनल परीक्षा तक अनेक बार परीक्षा दी, लेकिन विभिन्न विषयों में लगातार असफल होता रहा।
वर्ष 2020 तक भी वह मेडिसिन और प्रसूति एवं स्त्री रोग (Obstetrics & Gynaecology) विषयों में उत्तीर्ण नहीं हो सका।
हाईकोर्ट ने कहा कि लगभग 14 वर्षों में भी छात्र एमबीबीएस कोर्स पूरा नहीं कर पाया, जबकि उसे कई अवसर मिल चुके थे।
2019 से पहले समय-सीमा नहीं थी
अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि जब उसने वर्ष 2010 में प्रवेश लिया था, उस समय एमबीबीएस कोर्स पूरा करने की कोई अधिकतम समय-सीमा निर्धारित नहीं थी।
इसलिए 2019 के संशोधित मेडिकल शिक्षा विनियम, जिनमें 10 वर्ष की अधिकतम अवधि तय की गई, उसे पूर्व प्रभाव (Retrospective Effect) से लागू नहीं किया जा सकता।
पहले भी मिला था एक अतिरिक्त अवसर
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि छात्र के भविष्य को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने 30 जनवरी 2024 को अंतरिम आदेश पारित कर उसे एक और अवसर दिया था और एमबीबीएस तृतीय प्रोफेशनल (भाग-2) परीक्षा में बैठने की अनुमति दी थी।
हालांकि, परीक्षा परिणाम सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत किया गया, जिसमें वह पुनः असफल पाया गया।
सहानुभूति के आधार पर डॉक्टर नहीं बनाया जा सकता
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में एमबीबीएस स्टूडेंट को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि अपीलकर्ता को अतिरिक्त अवसर मिलने के बावजूद वह न्यूनतम योग्यता प्राप्त नहीं कर सका।
ऐसे में केवल इस आधार पर कि उसने फीस पर भारी खर्च किया है या उसे आर्थिक नुकसान होगा, न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि एमबीबीएस की डिग्री मरीजों के उपचार का अधिकार प्रदान करती है।
यदि कोई अभ्यर्थी 14 वर्षों तक बार-बार अवसर मिलने के बाद भी न्यूनतम दक्षता सिद्ध नहीं कर पाता, तो न्यायालय सार्वजनिक हित की अनदेखी नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यदि किसी मरीज को ऐसे छात्र का शैक्षणिक रिकॉर्ड बताया जाए, तो वह स्वाभाविक रूप से उसके उपचार को लेकर आशंकित होगा।
विशेष अपील खारिज
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की बहस सुनते हुए कहा कि मामले के तथ्यों, एकलपीठ के निर्णय तथा अपीलकर्ता के शैक्षणिक रिकॉर्ड को देखते हुए किसी भी प्रकार की और राहत देने का कोई औचित्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही विशेष अपील को खारिज करने का आदेश दिया।