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गवाह की मौत का फायदा नहीं उठा सकेगा फरार आरोपी: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- गवाह का पुराना बयान भी आरोपी के खिलाफ बन सकता है सबूत, कोर्ट ने जरूरी शर्तें भी बताईं

Supreme Court Grants Relief on Promotion Benefits After Punishment Is Reduced in Departmental Proceedings

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए साफ कहा है कि आपराधिक मामले में आरोपी के लंबे समय तक फरार रहने के दौरान अगर किसी गवाह की मौत हो जाती है, तो उसका पहले दर्ज बयान बेकार नहीं होगा।

कोर्ट ने कहा है कि कानून की शर्तें पूरी होने पर ऐसे बयान का इस्तेमाल बाद में आरोपी के खिलाफ भी किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में अगर आरोपी जानबूझकर फरार रहता है, तो बाद में गिरफ्तार होने पर वह सिर्फ इस आधार पर मुकदमे से राहत नहीं मांग सकता कि गवाह की मौत हो चुकी है और उसे उससे जिरह करने का मौका नहीं मिला। कोर्ट ने कहा है कि ऐसे मामलों में मृत गवाह का पहले दर्ज बयान भी उसके खिलाफ सबूत माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून किसी आरोपी को अपनी ही गलती का फायदा उठाने की इजाजत नहीं देता।

अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक जानबूझकर फरार रहता है और इसी दौरान किसी अहम गवाह की मौत हो जाती है, तो वह बाद में यह नहीं कह सकता कि पुराने बयान को रिकॉर्ड से हटाया जाए।

कोर्ट ने कहा कि कानून का मकसद न्याय सुनिश्चित करना है। अगर फरार रहने वाले आरोपी को हर बार यह फायदा मिलने लगे कि गवाह की मौत के बाद उसका बयान सबूत नहीं माना जाएगा, तो इससे आरोपी जानबूझकर मुकदमे से बचने की कोशिश करेंगे और न्याय व्यवस्था पर गलत असर पड़ेगा।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इसी आधार पर कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मृत पीड़िता का पहले दर्ज बयान फरार आरोपी के खिलाफ सबूत के तौर पर पढ़ा जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से साफ कर दिया है कि अगर कानून में तय शर्तें पूरी होती हैं, तो फरार आरोपी की गिरफ्तारी के बाद भी पहले दर्ज गवाही का इस्तेमाल किया जा सकता है।

सिर्फ इसलिए कि आरोपी उस समय मौजूद नहीं था, ऐसे सबूत को अपने आप अमान्य नहीं माना जाएगा।

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मामला क्या था और विवाद कहां से शुरू हुआ?

यह मामला वर्ष 2012 में कोलकाता में दर्ज एक गैंगरेप केस से जुड़ा है। पीड़िता ने शिकायत में आरोप लगाया था कि देर रात घर लौटते समय कुछ लोगों ने उसे कार में बैठाकर अगवा किया और बंदूक की नोक पर उसके साथ गैंगरेप किया। बाद में उसे चलती कार से बाहर फेंक दिया गया।

जांच के दौरान पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन दो आरोपी कई साल तक फरार रहे। कोर्ट ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट और बाद में उद्घोषणा भी जारी की, फिर भी वे पुलिस के हाथ नहीं आए।

तीनों गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ मुकदमा अलग चला। इस दौरान पीड़िता ने कोर्ट में कई तारीखों पर अपना बयान दिया और बचाव पक्ष के वकीलों ने उससे जिरह भी की।

बाद में पीड़िा की वर्ष 2015 में उसकी मौत हो गई। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराकर सजा सुनाई।

उधर, दोनों फरार आरोपी वर्ष 2016 में गिरफ्तार हुए। उनके खिलाफ अलग से पूरक चार्जशीट दाखिल हुई और ट्रायल शुरू हुआ।

तब तक पीड़िता की मौत हो चुकी थी। इसलिए सरकारी वकील (प्रॉसिक्यूशन) ने कोर्ट से मांग की कि पहले ट्रायल के दौरान दर्ज पीड़िता का बयान इस ट्रायल में भी सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जाए।

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हाईकोर्ट ने क्यों रोक दिया था बयान का इस्तेमाल?

ट्रायल कोर्ट ने प्रॉसिक्यूशन की मांग स्वीकार कर ली थी और कहा था कि पीड़िता का पहले दर्ज बयान नए ट्रायल में भी पढ़ा जा सकता है। लेकिन फरार आरोपी ने इस आदेश को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। हाईकोर्ट का कहना था कि जब पहले ट्रायल में गवाही रिकॉर्ड की जा रही थी, तब ट्रायल कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 299 के तहत कोई औपचारिक आदेश पारित नहीं किया था।

इसलिए बाद में उस बयान को फरार आरोपी के खिलाफ सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट के इसी फैसले को पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना था कि क्या केवल औपचारिक आदेश नहीं होने की वजह से पहले दर्ज गवाही को पूरी तरह खारिज किया जा सकता है, जबकि आरोपी वर्षों तक फरार रहा और इसी दौरान पीड़िता की मौत हो गई।

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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला क्यों पलटा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सबसे अहम सवाल यह नहीं था कि ट्रायल कोर्ट ने धारा 299 के तहत अलग से औपचारिक आदेश पारित किया था या नहीं।

असली सवाल यह था कि क्या उस समय आरोपी फरार था और क्या उसकी जल्द गिरफ्तारी की कोई संभावना नहीं थी।

अगर ये दोनों बातें रिकॉर्ड से साबित होती हैं, तो गवाह का बयान बाद में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि कानून में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि गवाह का बयान रिकॉर्ड करने से पहले ट्रायल कोर्ट को हर हाल में अलग से औपचारिक आदेश देना ही होगा।

जरूरी यह है कि रिकॉर्ड से साफ दिखाई दे कि आरोपी फरार था और उसके जल्द गिरफ्तार होने की उम्मीद नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में आरोपी के खिलाफ पहले गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ, फिर उद्घोषणा की गई और चार्जशीट में भी उसे फरार बताया गया।

इसके बावजूद वह कई साल तक पुलिस की पकड़ में नहीं आया। इसलिए यह साफ था कि उसकी जल्द गिरफ्तारी की कोई संभावना नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़िता का बयान वर्ष 2013 में दर्ज हुआ था, जबकि आरोपी की गिरफ्तारी वर्ष 2016 में हुई। इस बीच वर्ष 2015 में पीड़िता की मौत हो गई। ऐसे में धारा 299 की सभी जरूरी शर्तें पूरी होती हैं और उसका पहले दर्ज बयान आरोपी के खिलाफ पढ़ा जा सकता है।

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‘फरार आरोपी अपनी ही गलती का फायदा नहीं उठा सकता’

प्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसे मामलों में पुराने बयान को सबूत नहीं माना जाएगा, तो सबसे ज्यादा फायदा उसी आरोपी को होगा, जो जानबूझकर कई साल तक फरार रहता है। कानून का मकसद ऐसे लोगों को फायदा पहुंचाना नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि अगर आरोपी कई साल तक पुलिस से बचता रहे और इस दौरान अहम गवाह की मौत हो जाए, तो बाद में वह यह नहीं कह सकता कि उसे गवाह से जिरह करने का मौका नहीं मिला।

कानून किसी व्यक्ति को अपनी ही गलती या जानबूझकर किए गए आचरण का फायदा उठाने की अनुमति नहीं देता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर हाईकोर्ट की बात मान ली जाए, तो गंभीर मामलों में आरोपी जानबूझकर कई साल तक फरार रहेंगे। उन्हें पता होगा कि समय बीतने के साथ गवाह की मौत हो सकती है या वह उपलब्ध नहीं रहेगा।

फिर वे यह कहकर पुराने बयान को हटाने की मांग करेंगे कि उन्हें जिरह का मौका नहीं मिला। कानून ऐसी स्थिति की इजाजत नहीं देता।

पुराना बयान कब बनेगा सबूत? सुप्रीम कोर्ट ने बताईं शर्तें

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि पहले दर्ज बयान हर मामले में अपने आप सबूत नहीं बन जाएगा। उसका इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब कानून में तय शर्तें पूरी हों।

कोर्ट ने कहा कि सबसे पहले यह साबित होना चाहिए कि आरोपी फरार था और उसकी जल्द गिरफ्तारी की कोई संभावना नहीं थी।

अगर आरोपी जानबूझकर कानून से बचता रहा, तो बाद में वह इस बात का फायदा नहीं उठा सकता कि वह गवाही के समय कोर्ट में मौजूद नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर बाद में गवाह की मौत हो जाए, वह गवाही देने की स्थिति में न रहे या किसी वजह से उसे कोर्ट में पेश करना संभव न हो, तो उसका पहले दर्ज बयान आरोपी की गिरफ्तारी के बाद चलने वाले ट्रायल में भी सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह सामान्य नियम नहीं है। आम तौर पर गवाह की गवाही आरोपी की मौजूदगी में होती है और उसे जिरह का पूरा मौका मिलता है।

लेकिन जब आरोपी खुद फरार रहकर इस प्रक्रिया को असंभव बना देता है, तब कानून ऐसी विशेष व्यवस्था की अनुमति देता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 299 का उद्देश्य किसी आरोपी का अधिकार छीनना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि जानबूझकर फरार रहने की वजह से न्याय की प्रक्रिया प्रभावित न हो।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट का आदेश बहाल कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मृत पीड़िता का पहले दर्ज बयान फरार आरोपी के खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है, क्योंकि कानून में तय सभी शर्तें पूरी होती हैं।

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि आरोपी कई साल तक फरार रहा और उसकी जल्द गिरफ्तारी की कोई संभावना नहीं थी।

इसी दौरान पीड़िता का बयान कोर्ट में दर्ज हुआ और बाद में उसकी मौत हो गई। ऐसे में धारा 299 के तहत उस बयान को बाद के ट्रायल में पढ़ने से कानून नहीं रोकता।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया है कि कोई आरोपी सिर्फ इसलिए राहत नहीं पा सकता कि वह लंबे समय तक फरार रहा और इसी दौरान किसी अहम गवाह की मौत हो गई।

अगर कानून में तय शर्तें पूरी होती हैं, तो पहले दर्ज गवाही बाद के ट्रायल में भी इस्तेमाल की जा सकती है।

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