नई दिल्ली: रेलवे के जरिए सामान की बुकिंग और माल भेजने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि ‘ओनर्स रिस्क’ पर भेजे गए सामान में कमी होने पर हर मामले में रेलवे जिम्मेदार नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर किसी माल की बुकिंग ‘ओनर्स रिस्क’ पर हुई है, तो सिर्फ सामान कम मिलने के आधार पर रेलवे से मुआवजा नहीं मांगा जा सकता। पहले यह साबित करना होगा कि माल की कमी रेलवे या उसके कर्मचारियों की लापरवाही या गलत आचरण की वजह से हुई।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि रेलवे एक्ट में ‘ओनर्स रिस्क’ पर भेजे गए माल के लिए अलग व्यवस्था है। ऐसे मामलों में रेलवे की जिम्मेदारी अपने आप तय नहीं हो जाती। जब तक भेजने वाला यह साबित नहीं कर देता कि रेलवे ने अपनी जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही की, तब तक मुआवजे का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर बजाज ट्रेडिंग कंपनी की अपील खारिज कर दी और गौहाटी हाईकोर्ट व रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के फैसलों को बरकरार रखा। मामला गुजरात से असम भेजी गई नमक की खेप में 1,742 बोरियां कम मिलने से जुड़ा था।
कैसे पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट?
यह मामला वर्ष 2009 का है। गुजरात के चिराई जंक्शन से बजाज ट्रेडिंग कंपनी ने असम के धर्मनगर के लिए 40,444 बोरियां नमक रेलवे के जरिए भेजी थीं। लेकिन जब माल गंतव्य स्टेशन पहुंचा तो 38,702 बोरियां ही मिलीं। यानी कुल 1,742 बोरियां कम थीं।
रेलवे ने इसकी कमी का प्रमाणपत्र भी जारी किया, जिसके बाद कंपनी ने करीब 3.48 लाख रुपये का मुआवजा मांगा।
रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने दावा खारिज कर दिया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि वास्तव में शुरुआत में जितनी बोरियां भेजे जाने का दावा किया गया, उतनी ही मालगाड़ियों में लोड हुई थीं।
बाद में गौहाटी हाईकोर्ट ने भी यही माना कि रेलवे की ओर से माल की गिनती या वजन की पुष्टि नहीं की गई थी और रेलवे रसीद पर ‘सेड टू कंटेन’ की टिप्पणी भी दर्ज थी। इसके बाद कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
‘ओनर्स रिस्क’ का मतलब क्या?- सुप्रीम कोर्ट ने समझाया
सुनवाई के दौरान कंपनी का कहना था कि माल भले ही ‘ओनर्स रिस्क’ पर भेजा गया हो, लेकिन रेलवे अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकती। उसका तर्क था कि रेलवे कर्मचारियों को माल की लोडिंग पर निगरानी रखनी चाहिए थी और ऐसा नहीं करने का नुकसान कारोबारी पर नहीं डाला जा सकता।
दूसरी ओर रेलवे ने कहा कि इस मामले में माल की गिनती या वजन रेलवे कर्मचारियों ने नहीं किया था। ऐसे में कानून के मुताबिक यह साबित करने की जिम्मेदारी माल भेजने वाले की थी कि वास्तव में उतनी ही बोरियां रेलवे को सौंपी गई थीं। रेलवे का यह भी कहना था कि सिर्फ कमी का प्रमाणपत्र जारी होना मुआवजे की जिम्मेदारी स्वीकार करना नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे एक्ट में ‘ओनर्स रिस्क’ के तहत भेजे गए माल के लिए अलग नियम बनाए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि :
‘ओनर रिस्क’ कैटेगरी का मतलब ही यह है कि जोखिम का बड़ा हिस्सा माल भेजने वाले पर होता है। ऐसे में रेलवे को जिम्मेदार ठहराने के लिए सामान्य से ज्यादा ठोस सबूत की जरूरत होती है।
ऐसे मामलों में रेलवे तभी जिम्मेदार होगी, जब यह साबित हो कि उसके कर्मचारियों की लापरवाही या कदाचार के कारण नुकसान हुआ। सिर्फ यह कहना कि माल कम मिला, पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट के मुताबिक, अगर हर मामले में सिर्फ नुकसान के आधार पर रेलवे को जिम्मेदार ठहराया जाने लगे, तो ‘ओनर रिस्क’ जैसी व्यवस्था का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। इसलिए कानून ने इसमें एक संतुलन बनाया है, जिसे बनाए रखना जरूरी है।
‘रेलवे की लापरवाही पहले साबित करनी होगी’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या रेलवे पूरे माल की जिम्मेदारी लेने के लिए कानूनी रूप से बाध्य था।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि रेलवे कर्मचारियों ने न तो माल की गिनती की थी और न ही उसका वजन जांचा था। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि रेलवे ने उतनी ही मात्रा में माल अपने कब्जे में लिया था, जिसकी बाद में कमी बताई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले यह साबित करना जरूरी है कि रेलवे को वास्तव में उतना ही माल सौंपा गया था, जितना दावा किया जा रहा है। जब तक यह साबित नहीं होता, तब तक रेलवे की लापरवाही नहीं मानी जा सकती। ऐसे में उस पर मुआवजे की जिम्मेदारी भी नहीं डाली जा सकती।
‘सेड टू कंटेन’ लिखे होने का क्या असर पड़ा ?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे रसीद पर ‘सेड टू कंटेन’ लिखा था। इसका मतलब है कि रेलवे ने माल की गिनती या वजन खुद जांचकर नहीं देखा था। रसीद सिर्फ माल भेजने वाले की बताई गई जानकारी के आधार पर जारी की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में यह साबित करने की जिम्मेदारी माल भेजने वाले की होती है कि उसने वास्तव में उतना ही माल रेलवे को सौंपा था।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि बजाज ट्रेडिंग कंपनी ऐसा कोई अलग सबूत पेश नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो सके कि 40,444 बोरियां नमक रेलवे को सौंपी गई थीं। कंपनी ने खरीद, पैकिंग या लोडिंग से जुड़े ऐसे दस्तावेज भी नहीं दिए, जिनसे माल की वास्तविक संख्या साबित हो सके।
इसी वजह से कोर्ट ने कहा कि सिर्फ रेलवे रसीद और माल कम मिलने का प्रमाणपत्र मुआवजा देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दावा क्यों खारिज किया?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कोई माल ‘ओनर्स रिस्क’ पर बुक होता है, तब रेलवे की जिम्मेदारी सामान्य मामलों जैसी नहीं रहती। हर कमी के लिए रेलवे को अपने आप जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पहले यह साबित करना होगा कि सामान कम होने की वजह रेलवे या उसके कर्मचारियों की लापरवाही थी।
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं था, जिससे रेलवे कर्मचारियों की लापरवाही साबित हो सके। कंपनी यह भी नहीं दिखा सकी कि जितनी बोरियां भेजने का दावा किया गया था, उतनी ही रेलवे ने अपने कब्जे में ली थीं। ऐसे में रेलवे पर मुआवजे की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने बजाज ट्रेडिंग कंपनी की अपील खारिज कर दी और रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल तथा गौहाटी हाईकोर्ट के फैसलों को सही माना।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में रेलवे एक्ट की धारा 97 लागू होगी, क्योंकि माल ‘ओनर्स रिस्क’ पर भेजा गया था।
ऐसी स्थिति में रेलवे तभी जिम्मेदार होगी, जब उसके कर्मचारियों की लापरवाही या बेइमानी साबित हो। सिर्फ सामान कम मिलने या कमी का प्रमाणपत्र जारी होने से रेलवे पर मुआवजे की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने बजाज ट्रेडिंग कंपनी की अपील खारिज कर दी और गौहाटी हाईकोर्ट व रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के फैसलों को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में रेलवे से मुआवजा दिलाने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
रेलवे से मुआवजा मांगने के नियम अब किए साफ
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में साफ कर दिया है कि रेलवे से मुआवजा कब और किन आधारों पर मिल सकता है
- ‘ओनर्स रिस्क’ पर माल बुक होने पर रेलवे हर मामले में अपने आप जिम्मेदार नहीं होगी।
- मुआवजा पाने के लिए पहले यह साबित करना होगा कि नुकसान रेलवे या उसके कर्मचारियों की लापरवाही से हुआ।
- अगर रेलवे रसीद पर ‘सेड टू कंटेन’ लिखा है, तो सिर्फ उसी रसीद के आधार पर माल की संख्या साबित नहीं मानी जाएगी।
- माल भेजने वाले को यह साबित करना होगा कि उसने वास्तव में उतना ही माल रेलवे को सौंपा था, जितना दावा किया जा रहा है।
- सिर्फ सामान कम मिलने का प्रमाणपत्र मुआवजा दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
- खरीद, पैकिंग, लोडिंग या अन्य रिकॉर्ड जैसे ठोस सबूत पेश करना जरूरी होगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से रेलवे से मुआवजा मांगने के नियम और साफ हो गए हैं।
