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फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल पर बड़ा फैसला: ‘सिर्फ गैरहाजिर रहने से किसी को विदेशी घोषित नहीं कर सकते’, एकतरफा आदेश से पहले निष्पक्ष सुनवाई जरूरी; सुप्रीम कोर्ट ने तय किए नियम

Supreme Court Lays Down Guidelines for Foreigners Tribunals, Says Ex Parte Orders Must Follow Due Process

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में एकतरफा (एक्स-पार्टी) कार्यवाही को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि सिर्फ किसी व्यक्ति के सुनवाई में गैरहाजिर रहने के आधार पर उसे विदेशी घोषित नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एकतरफा कार्यवाही होने पर भी ट्रिब्यूनल को निष्पक्ष सुनवाई की पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी। केवल गैरहाजिरी के आधार पर किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने का आदेश कानून में टिक नहीं सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि एकतरफा (एक्स-पार्टी) कार्यवाही होने पर भी ट्रिब्यूनल का दायित्व खत्म नहीं हो जाता। उसे यह जांचना होगा कि नोटिस सही तरीके से दिया गया था या नहीं, आरोपों का आधार क्या है, सरकारी पक्ष ने पर्याप्त सबूत पेश किए हैं या नहीं और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री वास्तव में किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने के लिए पर्याप्त है या नहीं।

यदि यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो ऐसा फैसला कानून में टिक नहीं सकता।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने असम से जुड़े 30 से अधिक मामलों की एक साथ सुनवाई करते हुए फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल और गुवाहाटी हाईकोर्ट के कई आदेश रद्द कर दिए। साथ ही सभी मामलों को नए सिरे से सुनवाई के लिए संबंधित फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के पास भेज दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों को दोबारा सुनवाई के लिए संबंधित फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के पास भेजते हुए कहा कि हर मामले में निष्पक्ष सुनवाई, उपलब्ध सबूतों का स्वतंत्र मूल्यांकन और कारणयुक्त आदेश देना कानून की अनिवार्य शर्त है।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कई मामलों में एकतरफा कार्यवाही के दौरान कानून में तय निष्पक्ष प्रक्रिया का पूरा पालन नहीं किया गया। ऐसे मामलों में ट्रिब्यूनल को नोटिस की वैधता, सरकारी पक्ष के सबूत और रिकॉर्ड का स्वतंत्र मूल्यांकन करना अनिवार्य है। केवल गैरहाजिरी के आधार पर दिया गया आदेश कानून में टिक नहीं सकता।

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क्या था पूरा मामला?

यह फैसला उन अपीलों से जुड़ा था, जिनमें याचिकाकर्ताओं ने ट्रिब्यूनल के फैसलों को चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट के सामने असम के अलग-अलग मामलों से जुड़ी कई अपीलें आई थीं। अधिकांश मामलों में लोगों को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने विदेशी घोषित कर दिया था, क्योंकि वे किसी चरण पर सुनवाई में उपस्थित नहीं हुए, समय पर लिखित जवाब दाखिल नहीं कर सके या बाद में सबूत पेश नहीं कर पाए।

कई मामलों में हाईकोर्ट ने भी ट्रिब्यूनल के फैसलों को बरकरार रखा। इसके बाद प्रभावित लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का पूरा अवसर नहीं मिला तथा ट्रिब्यूनल ने केवल गैरहाजिरी के आधार पर उनके खिलाफ फैसला दे दिया।

इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर कहा कि उन्हें अपना पक्ष रखने का प्रभावी और निष्पक्ष अवसर नहीं मिला।

उनका तर्क था कि फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने केवल उनकी गैरहाजिरी को आधार बनाकर फैसला दे दिया, जबकि कानून के मुताबिक उपलब्ध सबूतों और रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच करना भी जरूरी था।

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सिर्फ गैरहाजिरी से नहीं होगा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति सुनवाई में उपस्थित नहीं होता, तब भी ट्रिब्यूनल का काम केवल एकतरफा आदेश पारित करना नहीं है।

उसे स्वतंत्र रूप से यह देखना होगा कि संबंधित व्यक्ति को कानून के मुताबिक नोटिस मिला था या नहीं, उसे आरोपों की जानकारी दी गई थी या नहीं और सरकारी पक्ष ने अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त सामग्री पेश की है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की गैरहाजिरी अपने आप यह साबित नहीं करती कि वह विदेशी है। ट्रिब्यूनल को हर मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड और सबूतों का मूल्यांकन करना ही होगा।

‘सिर्फ आरोप नहीं, ठोस आधार भी बताना होगा’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल यह बता देना पर्याप्त नहीं है कि उस पर विदेशी होने का संदेह है। नोटिस में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उसके खिलाफ आरोप किस आधार पर लगाए गए हैं। तभी वह प्रभावी तरीके से अपना जवाब दे सकेगा और अपने पक्ष में दस्तावेज तथा सबूत पेश कर पाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि आरोपों का आधार ही स्पष्ट नहीं होगा, तो व्यक्ति को अपनी बेगुनाही साबित करने का सही अवसर नहीं मिल पाएगा। ऐसी स्थिति में निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को यह ही नहीं बताया जाएगा कि उस पर विदेशी होने का आरोप किस आधार पर लगाया गया है, तो वह अपना पक्ष ठीक से कैसे रखेगा। ऐसी स्थिति में उसे निष्पक्ष सुनवाई का मौका नहीं मिल पाएगा और निष्पक्ष सुनवाई का
अधिकार केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।

निष्पक्ष सुनवाई हर व्यक्ति का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 केवल भारतीय नागरिकों तक सीमित नहीं हैं। कानून के सामने समानता और निष्पक्ष प्रक्रिया का अधिकार भारत में मौजूद हर व्यक्ति को मिलता है। इसलिए भले ही किसी व्यक्ति पर विदेशी होने का संदेह हो, फिर भी उसके खिलाफ पूरी कानूनी और निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने का फैसला उसके जीवन पर बड़ा असर डाल सकता है।

ऐसी स्थिति में उसे हिरासत में लिया जा सकता है, देश से बाहर भेजा जा सकता है, परिवार से अलग होना पड़ सकता है और कुछ मामलों में वह नागरिकता से जुड़ी गंभीर मुश्किलों में भी फंस सकता है।

इसलिए ऐसे मामलों में कानून के मुताबिक निष्पक्ष सुनवाई करना अनिवार्य है।

फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल सिर्फ औपचारिक कार्यवाही करने वाला मंच नहीं है। उस पर हर मामले में निष्पक्ष सुनवाई करने, सभी सबूतों की जांच करने और ठोस कारणों के आधार पर फैसला देने की कानूनी जिम्मेदारी है।

कोर्ट ने कहा कि एकतरफा कार्यवाही होने पर भी ट्रिब्यूनल को यह जांचना होगा कि नोटिस सही तरीके से दिया गया था या नहीं, आरोपों का आधार क्या था, सरकारी पक्ष के सबूत कितने भरोसेमंद हैं और क्या उपलब्ध सामग्री वास्तव में किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने के लिए पर्याप्त है।

बिना इन पहलुओं पर विचार किए केवल गैरहाजिरी के आधार पर विदेशी घोषित नहीं किया जा सकता।

ट्रिब्यूनल के आदेश क्यों किए गए रद्द?

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि संबंधित मामलों में ट्रिब्यूनल के आदेश प्रक्रिया की कसौटी पर पूरी तरह खरे नहीं उतरते। कुछ मामलों में आवश्यक तथ्यों और दलीलों पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया था।

इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि ऐसे आदेशों को बनाए रखना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब प्रक्रिया में कमी हो, तो उसे सुधारना ही न्याय का सही रास्ता होता है।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सभी अपीलों पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने कानून में तय प्रक्रिया अपनाए बिना या पर्याप्त कारण दर्ज किए बिना एकतरफा आदेश दिए थे, वे कानून में टिक नहीं सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने 30 से अधिक मामलों से जुड़े अपने फैसले में गुवाहाटी हाईकोर्ट और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के कई आदेश रद्द कर दिए। साथ ही संबंधित मामलों को दोबारा सुनवाई के लिए फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को भेजते हुए निर्देश दिया कि हर मामले में निष्पक्ष सुनवाई, कानून में तय प्रक्रिया और उपलब्ध सबूतों का पूरा मूल्यांकन किया जाए।

याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया गया कि वे ट्रिब्यूनल के सामने पेश हों और सुनवाई में पूरा सहयोग करें।

साथ ही ट्रिब्यूनल को भी यह निर्देश दिया गया कि वह मामलों की सुनवाई निष्पक्ष तरीके से करे और सभी पक्षों को पर्याप्त अवसर दे।

6 महीने में सुनवाई पूरी करने की कोशिश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन मामलों की दोबारा सुनवाई में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। इसलिए संबंधित फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया गया है कि मामलों का जल्द से जल्द निपटारा किया जाए।

कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता इस फैसले की तारीख से चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रिब्यूनल के सामने पेश हों। इसके बाद ट्रिब्यूनल कोशिश करे कि उनकी पहली पेशी की तारीख से छह महीने के भीतर मामलों का फैसला कर दिया जाए।

साथ ही स्पष्ट किया कि सुनवाई के दौरान किसी भी पक्ष को बिना उचित कारण के अनावश्यक स्थगन नहीं दिया जाना चाहिए।

फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के लिए सुप्रीम कोर्ट के अहम निर्देश

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल की कार्यवाही को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट कर दिए हैं।

  • सिर्फ गैरहाजिर रहने के आधार पर किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित नहीं किया जा सकता।
  • एकतरफा सुनवाई होने पर भी ट्रिब्यूनल को सरकारी पक्ष के सबूतों और रिकॉर्ड का स्वतंत्र मूल्यांकन करना होगा।
  • नोटिस में यह स्पष्ट बताना होगा कि किसी व्यक्ति को किस आधार पर विदेशी माना जा रहा है।
  • हर व्यक्ति को अपना पक्ष रखने और सबूत पेश करने का निष्पक्ष व प्रभावी अवसर देना अनिवार्य होगा।
  • फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को हर मामले में कारणों के साथ, कानून के मुताबिक और निष्पक्ष फैसला देना होगा।

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