नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान अहम फैसला देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अपीलीय कोर्ट्स का काम निचली कोर्ट्स के जजों की गलतियां गिनाना या उन पर अनावश्यक प्रतिकूल टिप्पणी करना नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में केरल हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें एक प्रिंसिपल सब जज को ट्रेनिंग पर भेजने को कहा गया था। साथ ही, ट्रायल जज के कामकाज पर की गई सख्त टिप्पणियों को भी सही नहीं माना।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि :
‘अपीलीय कोर्ट्स का काम निचली कोर्ट्स के जजों की गलतियां गिनाना नहीं, बल्कि कानून की सही व्याख्या के जरिए उनका ‘दोस्त, मार्गदर्शक और दार्शनिक’ बनकर काम करना है। उन्हें अपने उच्च अधिकार का अनावश्यक प्रदर्शन करने से बचना चाहिए।’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी ट्रायल कोर्ट के फैसले में कमी है तो उसे ठोस कारणों के साथ सुधारना चाहिए, न कि जज पर टिप्पणी करते हुए उसे ट्रेनिंग पर भेज देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब कोई अपीलीय कोर्ट ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटती है, तो उसे पूरे रिकॉर्ड, सबूतों और कानून का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करना होगा। बिना ठोस कारण बताए किसी फैसले को पलटना न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने पाया कि इस मामले में केरल हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला तो पलट दिया, लेकिन यह नहीं बताया कि ट्रायल कोर्ट कानून या तथ्यों के स्तर पर कहां गलत थी। इसके बावजूद संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां कर उन्हें ट्रेनिंग पर भेजने का निर्देश दे दिया।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का पूरा फैसला और प्रिंसिपल सब जज को ट्रेनिंग पर भेजने का निर्देश रद्द कर दिया। साथ ही मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए फिर से केरल हाईकोर्ट भेजते हुए सभी पक्षों के अधिकार सुरक्षित रखे।
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क्या था पूरा मामला?
मामला केरल के एक परिवार में संपत्ति के बंटवारे और कथित वसीयत (विल) की वैधता से जुड़ा था। ट्रायल कोर्ट ने दोनों पक्षों के सबूतों की जांच के बाद माना कि वसीयत कानून के मुताबिक साबित नहीं हुई है।
इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट ने संपत्ति के बंटवारे का शुरुआती आदेश पारित किया। इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला केरल हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया। साथ ही यह टिप्पणी भी की कि प्रिंसिपल सब जज मामले को सही तरीके से समझ नहीं पाए और उन्हें केरल ज्यूडिशियल अकादमी में ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। इतना ही नहीं, हाईकोर्ट ने उस जज को केरल ज्यूडिशियल अकादमी में ट्रेनिंग के लिए भेजने का निर्देश भी दे दिया।
इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। अपील में कहा गया कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते समय न तो सबूतों का सही मूल्यांकन किया और न ही उचित कारण दर्ज किए। साथ ही न्यायिक अधिकारी के खिलाफ की गई टिप्पणियां भी न्यायिक मर्यादा के अनुरूप नहीं थीं।
अपीलीय कोर्ट की जिम्मेदारी पर सुप्रीम कोर्ट का जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रथम अपीलीय कोर्ट केवल ट्रायल कोर्ट का फैसला बदलने वाली संस्था नहीं है। वह तथ्यों और कानून, दोनों के मामले में अंतिम कोर्ट होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलीय कोर्ट की जिम्मेदारी बेहद अहम होती है। यही वह कोर्ट होती है, जहां ट्रायल कोर्ट के फैसले में दर्ज तथ्यों और कानून, दोनों की दोबारा जांच की जाती है। इसलिए यदि अपीलीय कोर्ट ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष से असहमत है, तो उसे पूरे रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और दस्तावेजों का स्वतंत्र रूप से दोबारा मूल्यांकन करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल यह लिख देना कि ट्रायल कोर्ट ने गलती की है, पर्याप्त नहीं है। फैसला पलटने से पहले यह बताना भी जरूरी है कि ट्रायल कोर्ट कहां और क्यों गलत थी। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो अपीलीय फैसला न्यायिक जांच की कसौटी पर टिक नहीं सकता।
न्यायिक अधिकारियों पर टिप्पणी में बरतें संयम: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी या उसकी पेशेवर क्षमता पर सवाल तभी उठाया जाना चाहिए, जब वह मामले के फैसले के लिए अनिवार्य हो। केवल असहमति के आधार पर ऐसी टिप्पणियां करना उचित नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी टिप्पणी करने से पहले यह देखना जरूरी है कि रिकॉर्ड में उसके पर्याप्त आधार हैं या नहीं। साथ ही जिस न्यायिक अधिकारी पर टिप्पणी की जा रही है, उसे अपना पक्ष रखने का मौका भी मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक आदेशों की भाषा हमेशा संयमित, संतुलित और मामले की जरूरत तक सीमित होनी चाहिए। प्रतिकूल टिप्पणियां तभी की जानी चाहिए, जब वे मामले के निपटारे के लिए वास्तव में जरूरी हों। अनावश्यक टिप्पणियां न्यायिक व्यवस्था और अधिकारियों के मनोबल, दोनों पर असर डाल सकती हैं।
‘दोस्त, मार्गदर्शक और दार्शनिक’ बनें अपीलीय कोर्ट्स
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलीय कोर्ट्स की भूमिका पर भी अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जब कोई अपीलीय कोर्ट ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा करती है, तो उसका उद्देश्य केवल गलतियां निकालना नहीं होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलीय कोर्ट्स का रवैया निचली कोर्ट्स के प्रति ‘दोस्त, मार्गदर्शक और दार्शनिक’ जैसा होना चाहिए। कानून की सही व्याख्या और कारणयुक्त फैसलों के जरिए उन्हें निचली कोर्ट्स का मार्गदर्शन करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलीय कोर्ट्स को अपने अधिकार का इस्तेमाल इस तरह नहीं करना चाहिए कि ऐसा संदेश जाए कि ट्रायल कोर्ट का फैसला बिना पूरे विचार और ठोस कारण बताए भी पलटा जा सकता है। अपीलीय कोर्ट को हर मामले में स्वतंत्र रूप से रिकॉर्ड और सबूतों का मूल्यांकन कर कारणों के साथ फैसला देना चाहिए।
किसी भी फैसले को पलटने से पहले अपीलीय कोर्ट को अपने कारण स्पष्ट रूप से दर्ज करने होंगे।
केरल हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि हाईकोर्ट का तरीका न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट का फैसला बहुत छोटा था और उसमें ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए जरूरी विश्लेषण नहीं किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केरल हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला तो पलट दिया, लेकिन यह नहीं बताया कि ट्रायल कोर्ट कानून या तथ्यों के स्तर पर कहां गलत थी। और न ही यह बताया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला किन कारणों से गलत था।
कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और सबूतों का स्वतंत्र रूप से दोबारा मूल्यांकन नहीं किया। साथ ही ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों से असहमति के ठोस कारण भी दर्ज नहीं किए।
सुप्रीम ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटने के लिए सिर्फ छोटा आदेश देना काफी नहीं है। अपीलीय कोर्ट को पूरे रिकॉर्ड की जांच कर स्पष्ट कारण भी बताने होंगे यानी यह बताना होगा कि ट्रायल कोर्ट कहां और क्यों गलत थी।
इसके बावजूद हाईकोर्ट ने ट्रायल जज की कार्यशैली पर प्रतिकूल टिप्पणी की और उन्हें ट्रेनिंग पर भेजने का निर्देश दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना जरूरी आधार और कारणों के ऐसी टिप्पणी करना न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
जज को ट्रेनिंग भेजने के आदेश पर क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश पर भी आपत्ति जताई, जिसमें संबंधित जज को ट्रेनिंग के लिए भेजने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसा आदेश देने से पहले कानून में तय सिद्धांतों का पालन करना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी जज के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करने या उसके कामकाज पर सवाल उठाने से पहले यह देखना होगा कि उसकी वास्तव में जरूरत है या नहीं। साथ ही रिकॉर्ड में उसके ठोस आधार भी होने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस मामले में हाईकोर्ट ने बिना ठोस कारण बताए जज पर टिप्पणी की और उन्हें ट्रेनिंग पर भेजने का आदेश दे दिया। इसलिए कोर्ट ने इस निर्देश को भी रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट का पूरा फैसला रद्द कर दिया। कोर्ट ने मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए फिर से केरल हाईकोर्ट भेज दिया।
इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने जज को ट्रेनिंग के लिए भेजने के आदेश को भी खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि इस तरह के निर्देश बिना ठोस आधार के नहीं दिए जा सकते।
साथ ही स्पष्ट किया कि अपील पर दोबारा सुनवाई करते समय सभी तथ्यों, सबूतों और कानून का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन किया जाए। सभी पक्षों के लिए अपने-अपने तर्क रखने का अधिकार भी खुला रखा गया।
