हाईकोर्ट ने कहा-सत्य ही न्याय का आधार है, झूठे दस्तावेज़ों से न्यायिक प्रणाली को दूषित करने वालों के साथ सख्ती ज़रूरी
जयपुर, 21 नवंबर
Rajasthan Highcourt की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी न्यायिक प्रक्रिया में झूठे, फर्जी या मनगढ़ंत दस्तावेज़ों का सहारा लेकर अदालत को गुमराह करने की कोई भी कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकलपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में डीग एडीजे कोर्ट संख्या 1 के उस आदेश पर सहमति जताई है, जिसमें एक ऐसे एग्रीमेंट की जांच का आदेश दिया था जिसमें एग्रीमेंट होने की तारीख से पहले ही एग्रीमेंट करने वाले लोगों का निधन हो चुका था।
डीग एडीजे कोर्ट ने एग्रीमेंट पर संदेह होने के आधार पर एसडीएम से मामले की जांच के आदेश दिए थे। इस आदेश को स्टाम्प वेंडर सहित याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
कोर्ट के साथ धोखाधड़ी
Rajasthan Highcourt ने कहा कि यदि कोई भी पक्षकार कोर्ट के समक्ष झूठे या मनगढ़ंत दस्तावेज़ प्रस्तुत करता है, तो सत्य का पता लगाने के लिए विस्तृत और गहन जांच आवश्यक होती है।
Rajasthan Highcourt ने कहा कि अदालत में फर्जी दस्तावेज़ जमा करना एक गंभीर विषय है, जिसे अदालत के साथ धोखाधड़ी के रूप में भी देखा जा सकता है।
Rajasthan Highcourt ने कहा कि ऐसी हरकतें संबंधित पक्षकारों के लिए कानूनी परिणाम उत्पन्न कर सकती हैं और कोर्ट ऐसे मामलों में जांच के आदेश दे सकती है।
Rajasthan Highcourt ने एडीजे कोर्ट के खिलाफ दायर की गई इस याचिका को सारहीन मानते हुए कहा कि न ही निचली अदालत के आदेश में कोई ऐसी त्रुटि है जिसमें इस अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।
सत्य ही संसार का आधार
जस्टिस अनुप कुमार ढंड ने अपने फैसले की शुरुआत चाणक्य के उस उद्धरण से की, जिसमें कहा गया है—
“धरती सत्य के बल पर टिकी है; सत्य की शक्ति ही सूर्य को चमकने और पवन को बहने देती है; वास्तव में समस्त संसार सत्य पर ही आधारित है।”
Highcourt ने कहा कि अदालत में झूठे या फर्जी दस्तावेज़ देकर किसी को भी न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ करने का अधिकार नहीं है।
Highcourt ने कहा कि न्याय हमेशा सत्य पर आधारित होता है, और अदालत का पहला काम है सच्चाई का पता लगाना।
जांच रोकने से इनकार
Highcourt ने याचिकाकर्ताओं की उस मांग को खारिज करते हुए यह आदेश दिया है जिसमें याचिकाकर्ताओं ने डीग एडीजे कोर्ट द्वारा कराई जा रही एग्रीमेंट की जांच को रोकने की मांग की थी।
मृत व्यक्ति कैसे कर सकता है समझौता?
डीग एडीजे कोर्ट एक जमीन के बिक्री के समझौते की सुनवाई कर रहा था, जिसमें दावा किया गया कि यह समझौता वर्ष 2000 में हुआ था।
साल 2011 में किए गए इस दावे में याचिकाकर्ता सुंदर सिंह ने दावा किया कि यह समझौता 4 अप्रैल 2000 को हुआ था।
सुनवाई के दौरान दूसरे पक्ष ने एग्रीमेंट पर सवाल खड़े किए और गंभीर आरोप लगाया कि समझौता करने वाले दोनों व्यक्तियों की मृत्यु समझौते की तारीख से कई साल पहले ही हो चुकी थी।
सुनवाई के दौरान गवाह दुल्हेराम ने कोर्ट को बताया कि एग्रीमेंट करने वाले ओमप्रकाश की मृत्यु वर्ष 1995 में और चंद्रप्रकाश की मृत्यु 1990 में हो चुकी थी।
जिस पर डीग एडीजे कोर्ट ने 4 अप्रैल 2000 को हुए समझौते को संदिग्ध मानते हुए SDO डीग को जांच करने का आदेश दिया।
संदिग्ध तथ्य के लिए जांच जरूरी
डीग एडीजे कोर्ट द्वारा एग्रीमेंट के असली या नकली होने की जांच करने के आदेश को याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।
Highcourt ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि संदिग्ध तथ्य सामने हों तो जांच ज़रूरी है।
Highcourt ने कहा कि अगर किसी दस्तावेज़ पर संदेह हो, तो उसकी पूरी जांच होना आवश्यक है।
Highcourt ने कहा कि अदालतें फर्जी दस्तावेज़ों के आधार पर किसी को लाभ नहीं दे सकतीं और ऐसा करना न्याय की प्रक्रिया के साथ धोखा माना जाएगा।
हर मुकदमा खोज की यात्रा, झूठ ‘फ्रॉड’
जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकलपीठ ने कहा कि अदालत के समक्ष आने वाला “हर मुकदमा सत्य की खोज की यात्रा है। अदालत का दायित्व है कि वह सभी उपलब्ध तरीकों से सत्य सामने लाए।”
Highcourt ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि फर्जी दस्तावेज़ देना अपराध के बराबर है और अदालत में गलत या झूठे दस्तावेज़ देना न्याय व्यवस्था को नुकसान पहुँचाता है।
Highcourt ने कहा कि सच्चाई छिपाकर राहत नहीं मिल सकती और जो लोग अदालत को गुमराह करते हैं, वे किसी भी तरह की राहत पाने के पात्र नहीं हैं।
Highcourt ने कहा कि अदालत के सामने झूठ बोलना ‘फ्रॉड’ है और अगर कोई पक्षकार सच छिपाता है या गलत जानकारी देता है, तो यह धोखाधड़ी (Fraud) माना जाता है।
जांच में देरी पर फटकार
राजस्थान Highcourt ने इस मामले में एग्रीमेंट की जांच में 7 साल की देरी पर नाराज़गी जताई है।
Highcourt ने कहा कि निचली अदालत ने अगस्त 2018 में जांच का आदेश दिया था, लेकिन अब तक—यानी 7 साल बाद भी—रिपोर्ट नहीं आई।
Highcourt ने संबंधित अधिकारी को आदेश दिया कि “जांच जल्दी पूरी करके रिपोर्ट अदालत में पेश करें।”