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चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद वोटर लिस्ट में बदलाव से राजस्थान हाईकोर्ट का इनकार, पंचायत चुनाव से पहले नाम जुड़वाने पहुंचे दंपती की याचिका खारिज, कहा- दखल से प्रभावित हो सकती है चुनाव प्रक्रिया

Rajasthan High Court Rejects Plea to Restore Two Names in Panchayat Voter List After Election Schedule

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव से पहले मतदाता सूची में दो लोगों के नाम दोबारा शामिल करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है।

जस्टिस नूपुर भाटी ने संविधान के अनुच्छेद 243-O और चुनाव प्रक्रिया में न्यायिक दखल की सीमाओं का हवाला देते हुए मनोज कुमार गोदारा और उनकी पत्नी किरण चौधरी की याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि पंचायत चुनाव का कार्यक्रम घोषित होने के बाद वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने का आदेश चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। ऐसे समय में कोर्ट को इस बात का ध्यान रखना होगा कि उसके आदेश से चुनाव में देरी या रुकावट न आए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मृगराज सिंह राठौड़ ने अधिवक्ता कुणाल उपाध्याय के साथ पैरवी की। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राजेश पंवार की ओर से अधिवक्ता मोनल चुग वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए। वहीं, अतिरिक्त महाधिवक्ता एस.एस. लाद्रेचा की ओर से अधिवक्ता रवींद्र जाला ने भी पक्ष रखा।

बालोतरा की ग्राम पंचायत मोतीनगर का मामला

मामला बालोतरा जिले की ग्राम पंचायत मोतीनगर के वार्ड नंबर 2 का है। मनोज कुमार गोदारा और उनकी पत्नी किरण चौधरी के नाम 29 जनवरी 2026 को जारी प्रारंभिक पंचायत मतदाता सूची में क्रम संख्या 130 और 131 पर दर्ज थे।

बाद में उनके सामान्य निवास को लेकर आपत्ति उठाई गई, जिसके बाद चुनाव पंजीकरण अधिकारी ने 20 फरवरी 2026 को दोनों के नाम सूची से हटाने का आदेश दिया।

दंपती ने इस आदेश को बालोतरा जिला कलेक्टर के सामने चुनौती दी। कलेक्टर ने 18 मई 2026 को नाम हटाने का आदेश रद्द कर दिया और दोनों पक्षों को सुनने तथा दस्तावेजों समेत जांच सामग्री पर विचार करने के बाद नए सिरे से फैसला लेने के लिए मामला चुनाव पंजीकरण अधिकारी को भेज दिया।

दोबारा जांच के बाद फिर हटाए गए दोनों के नाम

मामले पर दोबारा विचार के दौरान दोनों पक्षों ने अपने दस्तावेज और जवाब पेश किए। इसके बाद 7 अक्टूबर को नए सिरे से स्थानीय जांच के निर्देश दिए गए।

8 अक्टूबर की जांच रिपोर्ट में दर्ज किया गया कि खसरा नंबर 151 में याचिकाकर्ताओं की आवासीय ढाणी नहीं मिली। रिपोर्ट में उनके निवास को राजस्व गांव सिंधरी चौसीरा के खसरा नंबर 150/103 से संबंधित बताया गया।

चुनाव पंजीकरण अधिकारी ने 9 अक्टूबर को इसी रिपोर्ट के आधार पर दंपती का दावा खारिज कर दिया। इसके बाद जिला कलेक्टर ने 15 अक्टूबर को उनकी अपील भी खारिज कर दी।

दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए दंपती ने 17 अक्टूबर को हाईकोर्ट में याचिका दायर की और मतदाता सूची में अपने नाम दोबारा शामिल करने की मांग की।

याचिकाकर्ताओं ने जांच और सुनवाई पर उठाए सवाल

दंपती की ओर से दलील दी गई कि 8 अक्टूबर की जांच उनके सामने नहीं हुई और उन्हें रिपोर्ट में दर्ज तथ्यों का जवाब देने का पूरा मौका नहीं मिला।

उन्होंने कहा कि संबंधित पटवारी ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए समिति से जांच कराने का सुझाव दिया था, लेकिन इस मांग पर सही तरीके से विचार नहीं किया गया।

याचिकाकर्ताओं ने जांच रिपोर्ट में दर्ज लोकेशन और उसके नंबरों पर भी सवाल उठाए।उनका कहना था कि उनके पास मौजूद तस्वीरों और लोकेशन से जुड़े दस्तावेजों का सही तरीके से आकलन नहीं किया गया।

उन्होंने यह भी दलील दी कि राजस्थान पंचायती राज अधिनियम में किसी वार्ड का ‘सामान्य निवासी’ होना जरूरी है, ‘स्थायी निवासी’ होना नहीं। ऐसे में अधिकारियों ने स्थायी निवास को आधार बनाकर गलत कानूनी कसौटी अपनाई।

दंपती ने कहा कि चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया था, इसलिए उनकी याचिका पर सुनवाई की जा सकती है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के अधिकारों का हवाला देते हुए नाम बहाल करने की मांग की।

सरकार ने कहा- चुनाव प्रक्रिया में दखल से पड़ सकता है असर

राज्य सरकार और चुनाव अधिकारियों की ओर से याचिका का विरोध किया गया। उनकी दलील थी कि पंचायत चुनाव का कार्यक्रम 3 अक्टूबर 2026 को घोषित हो चुका है।

ऐसे में मतदाता सूची में नाम जोड़ने का आदेश देने पर सूची में संशोधन करना पड़ेगा, जिससे चुनाव की आगे की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 243-O का हवाला देते हुए कहा कि पंचायत चुनाव से जुड़े विवादों के निपटारे में चुनाव प्रक्रिया को बाधित होने से बचाना जरूरी है।

यह भी दलील दी गई कि किसी वार्ड में जमीन खरीद लेना अपने आप में वहां सामान्य रूप से निवास करने का प्रमाण नहीं है।

हाईकोर्ट ने पुराने फैसले से अलग माना ये मामला

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने Sampat Singh v. Election Commission, Rajasthan मामले में दिए गए पुराने फैसले पर भी विचार किया।

उस मामले में मतदाता सूची से नाम हटाने से पहले संबंधित लोगों को नोटिस नहीं दिया गया था और उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका भी नहीं मिला था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने वहां हस्तक्षेप किया था।

हालांकि, मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि मनोज कुमार गोदारा और किरण चौधरी को 17 अगस्त 2026 को नोटिस दिया गया था और सक्षम अधिकारी के सामने अपना पक्ष रखने का अवसर भी मिला था।

हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों मामलों के तथ्य अलग हैं। इसलिए पुराने फैसले को इस मामले पर लागू नहीं किया जा सकता।

चुनाव कार्यक्रम के बाद हस्तक्षेप पर हाईकोर्ट ने जताई सावधानी

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एन.पी. पोन्नुस्वामी सहित चुनाव प्रक्रिया से जुड़े कई फैसलों का जिक्र किया। इन फैसलों में कहा गया है कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद ऐसे न्यायिक हस्तक्षेप से बचना चाहिए, जिनसे चुनाव रुकने, आगे के चरण प्रभावित होने या तय समयसीमा में देरी होने की आशंका हो।

हाईकोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के हालिया फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली राहत देने से परहेज किया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि चुनाव केवल मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई चरण शामिल होते हैं। मतदाता सूची में बदलाव का आदेश देने से आगे की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 243-O के तहत हस्तक्षेप से इनकार

हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 243-O के तहत पंचायत चुनावों से जुड़े विवादों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं पर विचार किया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद कोर्ट के अधिकार हर मामले में पूरी तरह खत्म नहीं हो जाते।

हालांकि, राहत देने से पहले यह देखना जरूरी है कि याचिका किस मुद्दे से जुड़ी है, चुनाव किस चरण में है और मांगी गई राहत से चुनाव प्रक्रिया पर क्या असर पड़ेगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि दंपती के नाम मतदाता सूची में दोबारा शामिल करने से सूची में बदलाव करना पड़ता। इससे चुनाव की आगे की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती थी।

इसलिए चुनाव कार्यक्रम और तय समयसीमा को देखते हुए कोर्ट ने इस स्तर पर राहत देने से इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, निवास के दावे पर फैसला नहीं

हाईकोर्ट ने मनोज कुमार गोदारा और किरण चौधरी की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने मतदाता सूची में नाम हटाने से जुड़े सभी तथ्यों पर अंतिम निष्कर्ष देने के बजाय इस बात पर जोर दिया कि चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद हस्तक्षेप से पूरी चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिका खारिज करने का फैसला दंपती के सामान्य निवास के दावे या जांच रिपोर्ट की सत्यता पर आधारित नहीं है।

हाईकोर्ट ने केवल इस बात पर विचार किया कि चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद मतदाता सूची में बदलाव का आदेश देने से चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

इसलिए कोर्ट ने दंपती के सामान्य निवास के दावे पर कोई अंतिम राय दिए बिना याचिका खारिज कर दी।

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