जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने अवैध खनन से जुड़े मामलों में जब्त वाहनों को छुड़ाने के लिए जुर्माना, कंपाउंडिंग फीस और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की ओर से निर्धारित मुआवजे से जुड़ी शर्तों को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दी हैं।
जस्टिस सुनील बेनीवाल ने याचिकाएं खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि खनन कानूनों के तहत कुर्की की प्रक्रिया शुरू होने के बाद वाहन को केवल सुपुर्दगी बॉन्ड या जमानत देकर नहीं छुड़ाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि वाहन की कुर्की का अंतिम आदेश पारित होने से पहले भी कानूनी प्रक्रिया शुरू हो सकती है। ऐसे में सिर्फ यह दलील देना पर्याप्त नहीं है कि अभी कुर्की का अंतिम आदेश नहीं आया है। यदि संबंधित विभाग ने वैधानिक देनदारी तय कर मांग और जरूरी नोटिस जारी कर दिए हैं, तो वाहन की रिहाई के लिए लागू कानूनी शर्तों का पालन करना होगा।
हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के उन आदेशों को सही ठहराया, जिनमें जब्त वाहनों को छोड़ने के लिए सुपुर्दगी बॉन्ड के साथ जुर्माना, मुआवजा और अपराध के शमन के लिए निर्धारित शुल्क जमा कराने की शर्तें लगाई गई थीं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से कई वकीलों ने पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता महावीर बिश्नोई के साथ देवेंद्र प्रजापत और नव्या शर्मा तथा लोक अभियोजक श्रीराम चौधरी ने पक्ष रखा।
अवैध रेत परिवहन के संदेह में जब्त किए गए थे वाहन
हाईकोर्ट में अलग-अलग जिलों के वाहन मालिकों की ओर से कई याचिकाएं दायर की गई थीं। इनमें बालोतरा, जोधपुर, भीलवाड़ा, पाली, डूंगरपुर, टोंक, सीकर और अन्य क्षेत्रों से जुड़े मामले शामिल थे। सभी याचिकाओं में मुख्य विवाद जब्त वाहनों को छोड़ने के लिए मजिस्ट्रेट की ओर से लगाई गई शर्तों को लेकर था।
एक प्रमुख मामले में वाहन संख्या RJ-39-GA-6293 को 19 अक्टूबर 2025 को समदड़ी पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर के सिलसिले में जब्त किया गया था। आरोप था कि वाहन का इस्तेमाल अवैध रूप से रेत ले जाने में किया गया।
वाहन मालिक ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 503 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष वाहन छोड़ने का आवेदन दिया।
मजिस्ट्रेट ने 7 अप्रैल 2026 को वाहन छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन इसके साथ कुछ शर्तें भी लगाईं। इनमें सुपुर्दगी बॉन्ड के अलावा पेनल्टी और अन्य निर्धारित देनदारियों से जुड़ी शर्तें शामिल थीं। वाहन मालिकों ने इन्हीं शर्तों को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
वाहन मालिकों ने मजिस्ट्रेट की शर्तों पर उठाए सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि वाहनों की जब्ती पुलिस की ओर से दर्ज एफआईआर के आधार पर हुई थी, जबकि खनन विभाग की ओर से औपचारिक शिकायत नहीं की गई थी। ऐसे में उनका कहना था कि खनन कानूनों के नियम 56 और 57 के तहत शर्तें लागू नहीं की जा सकतीं।
उन्होंने यह भी कहा कि जब्ती के बाद अंतिम रूप से वाहन जब्त करने का आदेश पारित नहीं हुआ था। इसलिए वाहन को केवल सुपुर्दगी बॉन्ड पर छोड़ा जाना चाहिए था। पेनल्टी, कंपाउंडिंग फीस या NGT से संबंधित मुआवजा जमा कराने की शर्त लगाना उनके अनुसार उचित नहीं था।
कुछ याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि जब वाहन पकड़े गए, तब उनमें रेत या अन्य खनिज मौजूद नहीं थे। कुछ मामलों में खनन में इस्तेमाल होने वाले उपकरण या बजरी के कण मिलने की बात कही गई।
याचिकाकर्ताओं ने पहले के न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वाहन छोड़ने के लिए इतनी कठोर शर्तें नहीं लगाई जानी चाहिए थीं।
राज्य सरकार ने पुराने फैसले का दिया हवाला
वहीं राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि इन कानूनी सवालों पर हाईकोर्ट पहले ही ‘फुसाराम बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य मामला’ में 21 अगस्त 2026 को फैसला दे चुका है।
उस निर्णय में अवैध खनन से जुड़े वाहनों की रिहाई, जब्ती की प्रक्रिया और पेनल्टी संबंधी शर्तों पर विस्तार से विचार किया गया था।
सरकार ने कहा कि खनन कानूनों के तहत निर्धारित प्रक्रिया का उद्देश्य अवैध खनिज परिवहन पर रोक लगाना और संबंधित देनदारियों की वसूली सुनिश्चित करना है।
यदि वाहन की रिहाई केवल निजी मुचलके पर कर दी जाए, जबकि देनदारी तय हो चुकी हो और जब्ती की प्रक्रिया शुरू हो गई हो, तो कानून के उद्देश्य प्रभावित होंगे।
सरकार ने यह भी बताया कि राज्य ने हाईकोर्ट के पहले के निर्देशों के बाद 5 मार्च 2021 को दिशा-निर्देश जारी किए थे। वाहनों को छोड़ने की शर्तें इन्हीं कानूनी प्रावधानों और दिशा-निर्देशों के अनुरूप तय की जाती हैं।
हाईकोर्ट ने कहा- पुलिस की FIR और खनन विभाग की कार्रवाई अलग
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमे और विभागीय कुर्की की प्रक्रिया के उद्देश्य अलग हैं। दोनों अपने-अपने कानूनी प्रावधानों के तहत चल सकती हैं। यह जरूरी नहीं है कि आपराधिक मुकदमे का फैसला आने के बाद ही विभागीय कार्रवाई शुरू हो।
यानी केवल इसलिए कि खनन विभाग की ओर से औपचारिक शिकायत नहीं की गई, पुलिस की जांच या उससे जुड़ी कार्रवाई को नहीं रोका जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि खनिज कानूनों की धारा 22 के तहत कोर्ट में संज्ञान लेने के लिए अधिकृत अधिकारी की शिकायत से जुड़ी शर्त है। लेकिन यहां मामला संज्ञान लेने के चरण तक नहीं पहुंचा था।
इसलिए शिकायत की इस शर्त के आधार पर पुलिस की जांच और उससे जुड़ी कार्रवाई को अवैध नहीं कहा जा सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि मौजूदा याचिकाओं में उठाए गए प्रमुख कानूनी सवालों पर पहले के फैसले में विचार किया जा चुका है। वाहन मालिकों की ओर से पुराने फैसलों का हवाला देने और यह बताने के बावजूद कि उनके मामले अलग हैं, कोर्ट को याचिकाएं स्वीकार करने का पर्याप्त आधार नहीं मिला।
‘अंतिम कुर्की आदेश से पहले भी शुरू हो सकती है कार्रवाई’
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जब तक वाहन की कुर्की का अंतिम आदेश नहीं आता, तब तक कुर्की की कार्रवाई शुरू नहीं मानी जा सकती। हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने राजस्थान Minor Mineral Concession Rules, 2017 के नियम 54 और 60 और राज्य सरकार के 5 मार्च 2021 के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि जब्ती के बाद वाहन मालिक को अपना पक्ष रखने के लिए 15 दिन का समय दिया जा सकता है।
इसके बाद देनदारी तय कर राशि जमा कराने की मांग और जरूरी नोटिस जारी किए जा सकते हैं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियम 54 के तहत अंतिम कुर्की आदेश से पहले मिलने वाली तीन महीने की अवधि का मतलब यह नहीं है कि इस दौरान कुर्की की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकती।
यदि देनदारी तय कर मांग और जरूरी नोटिस जारी कर दिए गए हैं, तो अंतिम आदेश आने से पहले भी कुर्की की प्रक्रिया शुरू मानी जा सकती है।
‘कुर्की की प्रक्रिया शुरू होने पर राशि जमा करनी होगी‘
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि खनन विभाग ने कुर्की की प्रक्रिया शुरू कर दी है और वाहन पर देय राशि तय कर दी है, तो वाहन मालिक केवल निजी बॉन्ड या जमानत देकर वाहन नहीं छुड़ा सकते।
ऐसी स्थिति में लागू नियमों के अनुसार निर्धारित राशि जमा करनी होगी। इसमें खनिज की कीमत, अपराध के शमन का शुल्क और NGT से जुड़ा मुआवजा शामिल हो सकता है। कौन-सी राशि देनी होगी, यह संबंधित मामले और लागू नियमों पर निर्भर करेगा।
वाहन छुड़ाने के लिए क्या शर्तें होंगी?
- कुर्की की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है: यदि देनदारी तय कर दी गई है, तो वाहन छुड़ाने के लिए लागू नियमों के अनुसार निर्धारित राशि जमा करनी होगी।
- कुर्की की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है: ऐसी स्थिति में संभावित वैधानिक देनदारी के बराबर सक्रिय बैंक गारंटी देने पर वाहन छोड़ा जा सकता है, ताकि आगे कुर्की की कार्रवाई होने पर राशि सुरक्षित रहे।
यानी वाहन छोड़ने की शर्तें इस बात पर निर्भर करेंगी कि कुर्की की कानूनी प्रक्रिया किस चरण में है।
वाहन में रेत नहीं होने की दलील पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
कुछ वाहन मालिकों ने दलील दी कि जब्ती के समय उनके वाहन में खनिज नहीं था, जबकि एक मामले में वाहन में रेत के कुछ कण ही होने की बात कही गई। हाईकोर्ट ने कहा कि इन दलीलों पर जांच और ट्रायल के दौरान विचार किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि वाहन छोड़ने के स्तर पर मजिस्ट्रेट को यह देखना होता है कि उपलब्ध सामग्री से वाहन का कथित अपराध से प्रथम दृष्टया संबंध बनता है या नहीं।
केवल वाहन में रेत नहीं होने या बहुत कम मात्रा में होने की दलील के आधार पर उसे बिना शर्त छोड़ने का अधिकार नहीं मिल जाता। हालांकि, इससे वाहन मालिकों की दलीलें अंतिम रूप से खारिज नहीं होतीं। आरोपों की सच्चाई जांच और ट्रायल में तय होगी।
हाईकोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज कीं
जस्टिस सुनील बेनीवाल ने वाहन छोड़ने की शर्तों को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि खनन कानूनों के तहत कुर्की की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और देनदारी तय कर दी गई है, तो वाहन केवल सुपुर्दगी बॉन्ड पर नहीं छोड़ा जा सकता।
वहीं, कुर्की की प्रक्रिया शुरू नहीं होने पर संभावित वैधानिक देनदारी के बराबर सक्रिय बैंक गारंटी देकर वाहन छुड़ाया जा सकता है। वाहन में खनिज होने या नहीं होने से जुड़ी दलीलों पर जांच और ट्रायल के दौरान विचार किया जाएगा।