टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

भ्रष्टाचार मामले में राजसमंद पंचायत समिति सदस्यों को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ा झटका-रिवीजन याचिकाएं खारिज, जारी रहेगा मुकदमा

Rajasthan High Court Rejects Revision Pleas of Rajsamand Panchayat Samiti Members, Corruption Trial to Continue

कोर्ट ने कहा -चार्ज के स्तर पर मिनी ट्रायल नहीं हो सकता, ग्रामीण विकास योजनाओं में सरकारी धन का गबन करने का आरोप, एसीबी की चार्जशीट में आरोपों को कोर्ट ने माना प्रथम दृष्टया सही,

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने राजसमंद जिले में ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के दौरान सरकारी धन के कथित गबन और भ्रष्टाचार से जुड़े करीब दो दशक पुराने मामले में आरोपी पंचायत समिति सदस्यों को राहत देने से इनकार कर दिया है.

राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया एसीबी की चार्जशीट में लगाए गए गंभीर आरोपों को मानते हुए स्पष्ट कहा कि इस स्तर पर वह ट्रायल कोर्ट द्वारा तय किए गए आरोप के मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा.

जस्टिस अशोक कुमार जैन की अदालत ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट तत्कालीन पंचायत समिति सदस्य रमेश चंद्र रांका और भीम राज रांका की ओर से दायर आपराधिक रिवीजन याचिकाओं को खारिज करते हुए दिया हैं.

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जाने के आदेश में किसी प्रकार की अवैधता या विकृति नहीं पाई।

गरीबी रेखा से जुड़ी योजना में भ्रष्टाचार

मामला Integrated Rural Development Schemes के क्रियान्वयन से जुड़ा है। इन योजनाओं का उद्देश्य गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों को आर्थिक रूप से ऊपर उठाना था।

रिकॉर्ड के अनुसार, योजनाओं के संचालन में District Rural Development Agency (DRDA) के जनप्रतिनिधियों और Udaipur Central Cooperative Bank Ltd. की भूमिका थी।

इस योजना के तहत मिलने वाली राशि के लिए आरोप तत्कालीन सदस्यों द्वारा फर्जी वाउचर के जरिए गबन की शिकायत एसीबी को मिली थी.

ACB ने प्रारंभिक जांच के बाद योजनाओं से संबंधित विभिन्न बैंक शाखाओं और ग्राम सेवा सहकारी समितियों के लेन-देन की जांच की थी।

फर्जी वाउचर बनाकर सरकारी धन निकालने का आरोप

हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, ACB की जांच के दौरान ऐसे साक्ष्य एकत्र किए गए, जिनमें सरकारी धन निकालने के लिए कथित तौर पर फर्जी वाउचर तैयार करने और उसके बाद सरकारी धन के गबन की बात सामने आई।

जांच में सत्यापन प्रक्रिया में कमी भी पाई गई तथा ACB ने लेन-देन में शामिल व्यक्तियों की भूमिका और संलिप्तता का उल्लेख किया।

दोनों याचिकाकर्ता संबंधित समय में पंचायत समिति के सदस्य थे, जब ये योजनाएं संचालित की जा रही थीं।

ACB की जांच के आधार पर जयपुर के एसीबी थाने में 7 दिसंबर 2006 को एफआईआर दर्ज की गई थी।

जांच पूरी होने के बाद आरोप-पत्र पेश किया गया और राजसमंद की भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मामलों की विशेष अदालत ने आरोप तय करने का आदेश दिया।

किन धाराओं में तय हुए आरोप?

ट्रायल कोर्ट यानी राजसमंद की भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मामलों की विशेष अदालत ने आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(D) और 13(2) तथा IPC की धारा 420, 467, 468, 471 और 120-B के तहत आरोप तय करने का निर्देश दिया था।

इसी आदेश को चुनौती देते हुए दोनों आरोपियों ने हाईकोर्ट में आपराधिक रिवीजन याचिकाएं दाखिल की थीं।

याचिका में दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि आरोप-पत्र में उनकी कोई विशिष्ट भूमिका या किसी विशेष कृत्य का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

रमेश चंद्र की ओर से यह भी कहा गया कि वह संबंधित समय पंचायत समिति के सदस्य थे और पेशे से अधिवक्ता हैं तथा उनके खाते में कथित राशि जमा होने का भी कोई आधार नहीं है।

भीम राज रांका की ओर से भी फर्जीवाड़ा या दस्तावेजों की जालसाजी में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होने का तर्क दिया गया।

वहीं, राज्य की ओर से इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा गया कि आरोप तय करने के चरण में आरोपों की सत्यता की विस्तृत जांच नहीं की जा सकती।

चार्ज के स्तर पर मिनी ट्रायल नहीं हो सकता

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के चरण में अदालत को यह देखना होता है कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया अपराध के आवश्यक तत्व सामने आते हैं या नहीं।

इस चरण में अदालत को साक्ष्यों की अंतिम विश्वसनीयता या उनके आधार पर दोषसिद्धि होगी अथवा नहीं, इसका फैसला नहीं करना होता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आरोप तय करने या डिस्चार्ज पर विचार करते समय मिनी ट्रायल की अनुमति नहीं है और आरोपी के बचाव के गुण-दोष पर इस चरण में विस्तार से विचार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट को अभियोजन एजेंसी द्वारा प्रस्तुत सामग्री को उसके प्रथम दृष्टया स्वरूप में देखना होता है।

उसे इस चरण पर गवाहों के बयानों या अन्य साक्ष्यों की सत्यता और विश्वसनीयता का अंतिम परीक्षण नहीं करना है।

पंचायत समिति सदस्य के रूप में भूमिका

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर आई सामग्री पर विचार करते हुए कहा कि दोनों याचिकाकर्ताओं की भूमिका और संलिप्तता की जांच के दौरान जांच की गई थी।

गवाहों के बयान दर्ज करने और सामग्री एकत्र करने के बाद ACB ने उनके खिलाफ आरोप-पत्र पेश किया था।

हाईकोर्ट के अनुसार, आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों में IPC की धारा 120-B के सहारे उनके कृत्यों को जोड़ा गया है और पंचायत समिति के सदस्य के रूप में उनकी भूमिका को देखते हुए जांच में एकत्र सामग्री के आधार पर आरोप तय किए गए।

दोनों रिवीजन याचिकाएं खारिज

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में ऐसी कोई अवैधता या विकृति नहीं है, जिसके आधार पर आपराधिक रिवीजन के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया जा सके।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने दोनों रिवीजन याचिकाएं खारिज करने का आदेश दिया.

सबसे अधिक लोकप्रिय