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प्लीडिंग से बाहर जाकर सबूत पेश नहीं किया जा सकता, साक्ष्य से प्लीडिंग की कमी पूरी करने की कोशिश स्वीकार्य नहीं: अनुच्छेद 227 की शक्ति भी अपीलीय अदालत जैसी नहीं – राजस्थान हाईकोर्ट

Evidence Cannot Go Beyond Pleadings, Handwriting Expert Report Rejected in 2008 Civil Suit
राजस्थान हाईकोर्ट ने 2008 के स्पेसिफिक परफॉर्मेंस मुकदमे में अहम फैसला सुनाया; कहा-प्लीडिंग ही सबूत की नींव, बाद में नया तथ्य जोड़कर केस का स्वरूप नहीं बदला जा सकता

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सिविल मुकदमों में प्लीडिंग और साक्ष्य के बीच संबंध को लेकर महत्वपूर्ण और रिपोर्टेबल फैसला सुनाया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई पक्ष अपने लिखित बयान में जिस तथ्य या बचाव की नींव ही नहीं रखता, वह मुकदमे के साक्ष्य चरण में अचानक नया बचाव खड़ा करने के लिए विशेषज्ञ रिपोर्ट पेश नहीं कर सकता।

जस्टिस फरजंद अली की अदालत ने बिहारी लाल बनाम नवरतनमल बंब एवं अन्य की ओर से मामले में दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें साक्ष्य दर्ज किए जाने के चरण में पेश की गई हैंडराईटिंग विशेषज्ञ की रिपोर्ट को अभिलेख पर लेने से इनकार किया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि अभिलेख पर ऐसी कोई अधिकार-क्षेत्र संबंधी त्रुटि, विकृति या स्पष्ट अवैधता नहीं है, जिसके कारण अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप किया जाए।

2008 से चल रहा है स्पेसिफिक परफॉर्मेंस का मुकदमा

यह मामला याचिकाकर्ता बिहारी लाल और अन्य के खिलाफ अनुबंध के विशिष्ट पालन और कब्जे की वापसी के लिए दायर सिविल मुकदमे से जुड़ा हैं।

मुकदमे में प्रतिवादियों ने अदालत के समक्ष अपने-अपने लिखित बयान पेश किए।

बाद में जब मामला साक्ष्य दर्ज करने के चरण में पहुंच गया, तब याचिकाकर्ता-प्रतिवादी ने एक हैंडराईटिंग विशेषज्ञ की रिपोर्ट को अभिलेख पर लेने की अनुमति मांगी।

क्या साक्ष्य के दौरान नया बचाव जोड़ा जा सकता है?

ट्रायल कोर्ट ने अभिलेख पर मौजूद प्लीडिंग, सामग्री और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद हैंडराईटिंग विशेषज्ञ की रिपोर्ट को उस चरण में अभिलेख पर लेने से इनकार कर दिया।

साथ ही, वादी की ओर से दायर आवेदन को स्वीकार करते हुए हस्तलेखन विशेषज्ञ के शपथपत्र को अभिलेख से हटाने का आदेश भी दिया।

यही आदेश हाईकोर्ट में चुनौती का आधार बना।

याचिकाकर्ता पक्ष की दलील

याचिकाकर्ता बिहारी लाल की ओर से अधिवक्ता ऋषभ श्रीमाली ने हाईकोर्ट के समक्ष दलीलें पेश कीं।

याचिकाकर्ता की ओर से हैंडराईटिंग विशेषज्ञ की रिपोर्ट को मुकदमे से संबंधित बताते हुए उसे साक्ष्य का हिस्सा बनाने की मांग की।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि लिखित बयान में संबंधित समझौते पर मौजूद हस्ताक्षर को फर्जी या जाली होने का कोई विशिष्ट बचाव नहीं लिया गया था और न ही विशेषज्ञ की राय लेने के लिए कोई आधार तैयार किया गया था।

प्रतिवादी पक्ष की दलील

प्रतिवादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता विनय जैन, दर्शन जैन, कुलदीप पुरोहित और देव किशन उपस्थित हुए।

प्रतिवादी पक्ष की ओर से ट्रायल कोर्ट के आदेश का समर्थन किया गया।

मामले के अभिलेख के अनुसार, वादी ने हैंडराईटिंग विशेषज्ञ के शपथपत्र को अभिलेख से हटाने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था।

हाईकोर्ट का निष्कर्ष

जस्टिस फरजंद अली ने रिपोर्टेबल निर्णय के जरिए स्पष्ट किया कि साक्ष्य प्लीडिंग को साबित करने के लिए होता है, न कि प्लीडिंग में मौजूद कमी को पूरा करके नया मामला खड़ा करने के लिए।

एकलपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 227 का पर्यवेक्षणाधीन अधिकार-क्षेत्र अपीलीय अधिकार-क्षेत्र नहीं है और सामान्य तौर पर हाईकोर्ट इस अधिकार के तहत अधीनस्थ अदालत के साक्ष्य या निष्कर्षों का दोबारा मूल्यांकन नहीं करता।

हाईकोर्ट ने कहा-प्लीडिंग ही साक्ष्य की नींव है

जस्टिस फरजंद अली ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी पक्ष को अपना मामला उसकी प्लीडिंग की सीमाओं के भीतर ही साबित करना होता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि प्लीडिंग वह आधार है, जिस पर साक्ष्य की पूरी संरचना खड़ी होती है। कोई पक्ष बाद के चरण में अपनी मूल प्लीडिंग से बाहर जाकर पूरी तरह नया तथ्यात्मक आधार या ऐसा बचाव नहीं ला सकता, जिसकी नींव पहले से लिखित बयान में मौजूद ही नहीं थी।

लिखित बयान में हस्ताक्षर फर्जी होने की बात ही नहीं कही गई थी

हाईकोर्ट ने मामले के अभिलेख पर विशेष रूप से गौर किया। हाईकोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी की ओर से दाखिल लिखित बयान में समझौते पर मौजूद हस्ताक्षर को कूटरचित या जाली बताया ही नहीं गया था।

इसके अलावा, हस्ताक्षर की वास्तविकता की जांच के लिए किसी विशेषज्ञ की राय लेने का आधार भी लिखित बयान में नहीं रखा गया था। इसके विपरीत, कार्यवाही के दौरान समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने का पहलू स्वीकार किया गया था।

ऐसे में जब मुकदमा साक्ष्य दर्ज करने के चरण तक पहुंच चुका था, उस समय हैंडराईटिंग विशेषज्ञ की राय पेश करने की कोशिश को अदालत ने महज पहले से मौजूद दलील की विस्तृत व्याख्या नहीं माना।

साक्ष्य के जरिए नया मामला नहीं

हाईकोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि साक्ष्य का उद्देश्य प्लीडिंग को साबित करना है, न कि ऐसी बुनियादी कमी को पूरा करना है, जिसकी कोई नींव प्लीडिंग में रखी ही नहीं गई।

हाईकोर्ट के अनुसार, यदि साक्ष्य के माध्यम से बाद के चरण में नया तथ्यात्मक बचाव लाने की अनुमति दी जाती है, तो इससे मुकदमे का स्वरूप ही बदल सकता है और दूसरे पक्ष को गंभीर पूर्वाग्रह हो सकता है।

दूसरे पक्ष को यह पता होना चाहिए कि उसे किस मामले का सामना करना है और उसकी जानकारी प्लीडिंग से स्पष्ट होनी चाहिए।

नया तथ्य पहली बार साक्ष्य में लाने की अनुमति नहीं

अदालत ने कहा कि यह स्थापित प्रक्रियात्मक सिद्धांत है कि कोई पक्ष अपनी प्लीडिंग की सीमा से बाहर जाकर साक्ष्य पेश नहीं कर सकता। यह नियम निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों पर आधारित है।

दूसरे पक्ष को साक्ष्य के जरिए पहली बार सामने लाए गए किसी नए तथ्यात्मक दावे से अप्रत्याशित स्थिति में नहीं डाला जा सकता। इसलिए प्लीडिंग में मामले के महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख होना जरूरी है और साक्ष्य उसी प्रस्तुत मामले की सीमा में रहना चाहिए।

अनुच्छेद 227 की शक्ति अपीलीय अदालत जैसी नहीं

हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपनी पर्यवेक्षणाधीन अधिकार-क्षेत्र की सीमा को भी स्पष्ट किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र अधीनस्थ अदालतों को उनकी कानूनी सीमा में रखने और यह सुनिश्चित करने के लिए है कि वे अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कानूनी, न्यायसंगत और प्रक्रियात्मक रूप से उचित तरीके से करें।

यह अधिकार क्षेत्र किसी छिपे हुए अपीलीय अधिकार-क्षेत्र की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट सामान्य तौर पर अधीनस्थ अदालत के साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन करने या केवल इसलिए अपना दृष्टिकोण बदलने के लिए अनुच्छेद 227 का इस्तेमाल नहीं करता कि उसी सामग्री से कोई दूसरा दृष्टिकोण संभव हो सकता है।

रिपोर्ट को हटाना भी सही माना

हाईकोर्ट ने कहा कि जब ट्रायल कोर्ट ने यह तय कर दिया कि प्रस्तावित विशेषज्ञ साक्ष्य प्लीडिंग की सीमा से बाहर है और उसे अभिलेख पर लेने से इनकार कर दिया, तो उसके आधार पर हैंडराईटिंग विशेषज्ञ का शपथपत्र अभिलेख से हटाना स्वाभाविक परिणाम था।

इसलिए बाद में उस आदेश को अलग प्रक्रियात्मक अनियमितता बताकर चुनौती देने का भी आधार नहीं बनता।

रिपोर्ट प्रासंगिक हो सकती है, फिर भी स्वीकार नहीं की जा सकती

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि किसी हैंडराईटिंग विशेषज्ञ की रिपोर्ट विवाद से संबंधित हो सकती है, उसे अभिलेख पर स्वीकार करना अनिवार्य नहीं हो जाता।

कोर्ट ने कहा कि किसी साक्ष्य की प्रासंगिकता अपने आप में उस मूल आवश्यकता को खत्म नहीं करती कि उसके अनुरूप दावे की नींव प्लीडिंग में मौजूद हो। साक्ष्य की ग्राह्यता और साक्ष्यात्मक मूल्य को प्लीडिंग तथा पक्षकारों के बीच उठे मुद्दों के संदर्भ में देखा जाना होता है।

दोनों रिट याचिकाएं खारिज

सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने प्लीडिंग और लागू प्रक्रियात्मक सिद्धांतों पर सही तरीके से विचार किया था।

आदेश में ऐसी कोई विकृति, अधिकार-क्षेत्र संबंधी त्रुटि या न्याय के स्पष्ट विफल होने जैसी स्थिति नहीं मिली, जो अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट के हस्तक्षेप को उचित ठहराए।

इसके साथ ही हाईकोर्ट दोनों को खारिज कर दिया गया।

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