सरकारी भर्ती और कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, जांच रिपोर्ट कर्मचारियों को दिए बिना नियुक्तियां रद्द करना प्राकृतिक न्याय का घोर उल्लंघन, बकाया वेतन-भत्ते 100 दिन में देने के आदेश
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने सूचना सहायक भर्ती 2013 से जुड़े करीब 11 साल पुराने विवाद में 6 कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसके जरिए उनकी चयन प्रक्रिया और नियुक्तियों को रद्द कर दिया गया था।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इन सभी याचिकाकर्ताओं को नौकरी से हटाने के आदेश को रद्द करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियां करते हुए कहा कि
कई वर्षों तक सफलतापूर्वक सरकारी सेवा देने वाले कर्मचारियों को अचानक नौकरी से बाहर करना उनके जीवन को तबाह करने जैसा है, विशेषकर तब, जब वे अब दूसरी सरकारी नौकरियों के लिए निर्धारित आयु सीमा भी पार कर चुके हों।
जस्टिस गणेश राम मीणा की एकलपीठ ने राजाराम मीणा और पांच अन्य की ओर से दायर याचिका स्वीकार करते हुए सरकार के 27 मई 2015 के विवादित आदेश को निरस्त कर दिया।
हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित कर्मचारियों का चयन और नियुक्ति दस्तावेजों के सत्यापन के बाद हुई थी, लेकिन बाद में सरकार ने एक आंतरिक जांच रिपोर्ट के आधार पर उनकी नियुक्तियां रद्द कर दीं।
महत्वपूर्ण बात यह रही कि जिस जांच रिपोर्ट को कार्रवाई का आधार बनाया गया, उसकी प्रति याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध नहीं कराई गई थी।
हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध माना और आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से निरंतर सेवा में माना जाए।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के वेतन निर्धारण, बकाया वेतन, भत्तों और अन्य परिणामी सेवा लाभों का भुगतान किया जाए।
हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को आदेश की तारीख से 100 दिनों के भीतर इन लाभों की गणना कर भुगतान सुनिश्चित करने का भी आदेश दिया हैं.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियुक्ति के बाद यदि किसी कर्मचारी की योग्यता या दस्तावेजों पर सवाल उठते हैं, तो संबंधित प्राधिकारी को कानूनी प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना होगा।
2013 की भर्ती से शुरू हुआ विवाद, 2015 में रद्द कर दिया गया था चयन
मामला राजस्थान में सूचना सहायक के पद पर सीधी भर्ती से संबंधित है।
विभाग ने 25 अप्रैल 2013 को राजस्थान अधीनस्थ कार्यालय लिपिकवर्गीय सेवा नियम, 1992 के तहत सूचना सहायक पदों पर भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किया था.
याचिकाकर्ताओं ने मेघालय स्थित महात्मा गांधी विश्वविद्यालय से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से कंप्यूटर एप्लीकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा (PGDCA) प्राप्त किया था और इसी योग्यता के आधार पर भर्ती प्रक्रिया में भाग लिया।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता विभूतिभूषण शर्मा के अनुसार याचिकाकर्ताओं ने निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन किया, चयन प्रक्रिया में हिस्सा लिया और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए।
इसके बाद विभाग ने 14 सितंबर 2013 के आदेश से उन्हें विभिन्न स्थानों पर नियुक्त किया।
नियुक्ति आदेशों के तहत दस्तावेजों के सत्यापन के बाद उन्हें कार्यभार ग्रहण करने की अनुमति दी गई थी। उन्हें दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि पर नियुक्त किया गया।
इसके बाद 24 सितंबर 2013, 25 सितंबर 2013 और 11 दिसंबर 2013 के आदेशों के तहत संबंधित नियुक्तियां की गईं।
अधिवक्ता के अनुसार नियुक्ति के समय दस्तावेजों का सत्यापन किया गया था, हालांकि दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से प्राप्त PGDCA की वैधता का विस्तृत परीक्षण उस समय नहीं किया गया था।
कुछ समय बाद विश्वविद्यालय की ओर से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से डिग्री और डिप्लोमा जारी करने की वैधता पर सवाल उठने लगे।
राज्य सरकार ने इस आधार पर नियुक्तियों की दोबारा समीक्षा की और अंततः 27 मई 2015 को याचिकाकर्ताओं का अंतिम चयन रद्द कर दिया।
इस आदेश के खिलाफ कर्मचारियों ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
आखिरकार 11 साल बाद हाईकोर्ट ने चयन रद्द करने के आदेश को निरस्त करते हुए कर्मचारियों को सेवा संबंधी लाभ देने के आदेश दिए हैं।
महात्मा गांधी विश्वविद्यालय की PGDCA डिग्री पर क्यों उठे सवाल?
विवाद की मुख्य वजह मेघालय की महात्मा गांधी विश्वविद्यालय से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से प्राप्त PGDCA डिप्लोमा की वैधता थी।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि नियुक्तियां होने के बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने पंचायती राज विभाग को पत्र लिखकर विश्वविद्यालयों की क्षेत्रीय अधिकारिता और दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से पाठ्यक्रम संचालित करने से जुड़े नियमों की जानकारी दी थी।
सरकार के अनुसार, राज्य के कानून के तहत स्थापित विश्वविद्यालयों को दूसरे राज्यों में अपने अध्ययन केंद्रों के माध्यम से दूरस्थ शिक्षा के जरिए डिग्री या डिप्लोमा जारी करने का अधिकार संबंधित नियमों और मान्यता की शर्तों के अधीन होता है।
सरकार का कहना था कि मेघालय की महात्मा गांधी विश्वविद्यालय से राजस्थान के अध्ययन केंद्र के माध्यम से प्राप्त PGDCA डिप्लोमा की वैधता संदिग्ध थी।
पंचायती राज विभाग ने इस संबंध में आंतरिक जांच कराई। जांच में महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, मेघालय सहित कुछ अन्य विश्वविद्यालयों की ओर से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से डिग्री और प्रमाणपत्र जारी करने की गतिविधियों पर सवाल उठाए गए।
इसके बाद विभाग ने सूचना सहायक पद पर नियुक्त अभ्यर्थियों की पात्रता की दोबारा जांच करने का निर्णय लिया।
सरकार ने इसी आधार पर संबंधित कर्मचारियों से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे और बाद में उनकी नियुक्तियां रद्द कर दीं।
हालांकि, हाईकोर्ट के समक्ष केवल डिप्लोमा की वैधता का प्रश्न ही नहीं था।
अदालत को यह भी देखना था कि चयन रद्द करने से पहले विभाग ने संबंधित कर्मचारियों को पर्याप्त अवसर दिया या नहीं और क्या कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप की गई थी।
दस्तावेज सत्यापित कर नियुक्ति दी, फिर वर्षों बाद कैसे रद्द कर सकते हैं?
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विभूति भूषण शर्मा ने अदालत के समक्ष पक्ष रखते हुए कहा कि अभ्यर्थियों ने महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, मेघालय से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से PGDCA का पाठ्यक्रम पूरा किया था।
इसी योग्यता के आधार पर उन्होंने वर्ष 2013 की भर्ती में आवेदन किया और चयन प्रक्रिया में सफल होने के बाद नियुक्ति प्राप्त की।
उनकी ओर से यह भी दलील दी गई कि उस समय विश्वविद्यालय को दूरस्थ शिक्षा परिषद (DEC) और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से संबंधित मान्यता और अनुमोदन के दस्तावेज उपलब्ध थे।
याचिकाकर्ताओं ने विश्वविद्यालय की मान्यता से जुड़े पत्रों तथा अन्य रिकॉर्ड का हवाला देते हुए अपनी शैक्षणिक योग्यता का बचाव किया।
अभ्यर्थियों का कहना था कि नियुक्ति से पहले विभाग ने उनके दस्तावेजों का सत्यापन किया था।
विभागीय सत्यापन के बाद ही उन्हें सरकारी सेवा में नियुक्त किया गया। ऐसे में वर्षों बाद उन्हीं दस्तावेजों को लेकर उनके चयन को रद्द करना अनुचित था।
आंतरिक जांच रिपोर्ट
याचिकाकर्ताओं ने एक महत्वपूर्ण प्रक्रियागत आपत्ति भी उठाई।
उन्होंने कहा कि सरकार ने जिस आंतरिक जांच रिपोर्ट के आधार पर उनकी नियुक्तियां रद्द कीं, उसकी प्रति उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई।
जब उन्हें रिपोर्ट की सामग्री ही नहीं बताई गई, तो वे अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों का प्रभावी जवाब कैसे दे सकते थे?
उनकी दलील थी कि केवल किसी दूसरे शहर में आवेदन जमा करने, फीस भरने या काउंसलिंग कराने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उन्होंने किसी अवैध अध्ययन केंद्र से पाठ्यक्रम पूरा किया था।
उनका कहना था कि अध्ययन सामग्री और परीक्षा विश्वविद्यालय की ओर से उपलब्ध कराई गई थी।
अभ्यर्थियों ने यह भी बताया कि नियुक्ति रद्द किए जाने के समय तक वे सरकारी सेवा में काम कर रहे थे और उनके भविष्य पर इस कार्रवाई का गंभीर प्रभाव पड़ा।
दूसरे राज्य में अध्ययन केंद्र से प्राप्त डिप्लोमा मान्य नहीं
राज्य सरकार की ओर से नियुक्तियों को रद्द करने के निर्णय का बचाव किया गया। सरकार ने दलील दी कि महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, मेघालय को राजस्थान में स्थित अध्ययन केंद्रों के माध्यम से दूरस्थ शिक्षा के पाठ्यक्रम संचालित करने और डिग्री या डिप्लोमा जारी करने की आवश्यक अनुमति प्राप्त नहीं थी।
सरकार ने पंचायती राज विभाग की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि संबंधित विश्वविद्यालयों की ओर से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से जारी किए गए प्रमाणपत्रों की वैधता पर सवाल थे।
इसी कारण सूचना सहायक पद पर नियुक्त अभ्यर्थियों की शैक्षणिक योग्यता की दोबारा जांच की गई।
विभाग ने 26 नवंबर 2014 को संबंधित अभ्यर्थियों को नोटिस जारी कर पात्रता के समर्थन में अतिरिक्त दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा था।
इसके बाद 9 फरवरी 2015 को एक और नोटिस जारी कर यह जानकारी मांगी गई कि उन्होंने PGDCA पाठ्यक्रम किस प्रकार पूरा किया था।
सरकार का कहना था कि जांच में प्राप्त सामग्री के आधार पर नियुक्तियां रद्द करने का निर्णय लिया गया।
इस प्रकार विवाद के दो पक्ष थे। एक ओर सरकार शैक्षणिक योग्यता और विश्वविद्यालय के अध्ययन केंद्र की वैधता पर सवाल उठा रही थी, जबकि दूसरी ओर कर्मचारी नियुक्ति के समय किए गए दस्तावेज सत्यापन और जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराने की प्रक्रिया को चुनौती दे रहे थे।
जांच रिपोर्ट दिए बिना प्रतिकूल आदेश कैसे?
मामले में हाईकोर्ट के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया जाना रहा।
जस्टिस गणेशराम मीणा की एकलपीठ ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि याचिकाकर्ताओं का अंतिम चयन रद्द करने का आदेश पंचायती राज विभाग की ओर से तैयार की गई जांच रिपोर्ट पर आधारित था।
लेकिन याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट रूप से कहा था कि रिपोर्ट की प्रति उन्हें कभी उपलब्ध नहीं कराई गई।
कोर्ट ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि किसी कर्मचारी के विरुद्ध प्रतिकूल निर्णय लेने के लिए यदि कोई जांच रिपोर्ट या अन्य सामग्री आधार बनाई जाती है, तो प्रभावित व्यक्ति को उस सामग्री से अवगत कराना आवश्यक है।
ऐसा किए बिना कर्मचारी को अपने पक्ष में प्रभावी दलील देने का पूरा अवसर नहीं मिल सकता।
प्राकृतिक न्याय का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति के अधिकारों या रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला निर्णय निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाकर लिया जाए।
यदि प्राधिकारी किसी रिपोर्ट के आधार पर कर्मचारी की नियुक्ति रद्द करता है, तो संबंधित कर्मचारी को रिपोर्ट की सामग्री जानने और उस पर अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में चयन रद्द करने की कार्रवाई करते समय इस आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध कराए बिना और प्रभावित कर्मचारियों को पर्याप्त अवसर दिए बिना नियुक्तियां रद्द करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन था।
यही कारण रहा कि विभागीय कार्रवाई को केवल प्रशासनिक निर्णय मानकर स्वीकार नहीं किया गया।
अदालत ने उसके पीछे अपनाई गई प्रक्रिया की वैधता की भी जांच की और पाया कि प्रतिकूल आदेश पारित करने में गंभीर प्रक्रियागत खामी थी।
नियुक्ति के समय दस्तावेज सत्यापित किए, बाद में चयन रद्द करने पर कोर्ट ने उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ताओं को नियुक्ति देने से पहले उनके दस्तावेजों का सत्यापन किया गया था।
सत्यापन के बाद विभाग ने उन्हें नियुक्त किया और उन्होंने सरकारी सेवा में काम करना शुरू किया।
ऐसी स्थिति में जब विभाग बाद में उसी शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाते हुए नियुक्ति रद्द करता है, तो उसे कानून के अनुसार उचित प्रक्रिया अपनानी होती है।
अदालत के सामने यह तथ्य भी था कि नियुक्ति के बाद विश्वविद्यालय की मान्यता और दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से डिग्री जारी करने के अधिकार से संबंधित जानकारी सामने आई थी।
लेकिन किसी नई जानकारी के सामने आने से प्रभावित कर्मचारियों के प्रक्रियागत अधिकार समाप्त नहीं हो जाते।
कोर्ट की टिप्पणी का सार यह रहा कि विभाग किसी कर्मचारी की योग्यता की जांच कर सकता है, लेकिन जांच और उसके आधार पर कार्रवाई निष्पक्ष तथा कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए।
किसी जांच रिपोर्ट को आधार बनाकर कर्मचारी का चयन रद्द करना और उसी रिपोर्ट को कर्मचारी से साझा नहीं करना, उसे आरोपों का प्रभावी जवाब देने के अवसर से वंचित करता है।
इसी आधार पर अदालत ने विभाग की कार्रवाई को अवैध, मनमाना और अनुचित माना।
नौकरी से अचानक बाहर करना जीवन तबाह करने जैसा
फैसले में कर्मचारियों के भविष्य और उनकी आयु को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की गई।
एकलपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता कई वर्षों तक सफलतापूर्वक सरकारी सेवा दे चुके थे। ऐसे कर्मचारियों को अचानक नौकरी से बाहर करना उनके जीवन को तबाह करने जैसा है।
कोर्ट ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि नियुक्ति के समय याचिकाकर्ताओं की उम्र लगभग 28 से 30 वर्ष थी।
विवाद और न्यायिक प्रक्रिया के लंबे समय तक चलने के दौरान उनमें से कई कर्मचारी 40 वर्ष से अधिक उम्र के हो चुके थे।
इसका सीधा प्रभाव उनके रोजगार के भविष्य पर पड़ सकता था, क्योंकि वे अन्य सरकारी नौकरियों के लिए निर्धारित आयु सीमा पार कर चुके थे।
अदालत ने इस परिस्थिति को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि वर्षों तक सेवा देने के बाद अचानक नौकरी समाप्त कर देने का असर केवल वर्तमान रोजगार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यक्ति के भविष्य और दूसरी नौकरी पाने की संभावनाओं पर भी पड़ता है।
हालांकि, अदालत की राहत केवल कर्मचारियों की आयु या उनकी सेवा अवधि पर आधारित नहीं थी।
फैसले में मुख्य रूप से चयन रद्द करने की कार्रवाई को अवैध, मनमाना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध पाए जाने के आधार पर निरस्त किया गया।
लंबे समय तक काम करने का अनुभव
हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि नियुक्ति मिलने के बाद याचिकाकर्ताओं ने सूचना सहायक के पद पर लंबे समय तक काम किया था। इस अवधि में उन्होंने संबंधित पद का अनुभव अर्जित किया।
अदालत ने माना कि लंबे समय तक सेवा में रहने के दौरान प्राप्त कार्य अनुभव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस मामले में कर्मचारियों को नियुक्ति मिलने के बाद वर्षों तक सेवा में रखा गया।
इसके बाद उनकी नियुक्तियों को रद्द करने से उनके रोजगार, सेवा की निरंतरता और भविष्य की संभावनाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता था।
फैसले में यह पहलू भी सामने आया कि चयन रद्द करने के समय विभाग को न केवल योग्यता से संबंधित सवालों पर विचार करना था, बल्कि ऐसी कार्रवाई के लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रिया का पालन भी करना था।
कोर्ट ने विभागीय आदेश को निरस्त करते हुए कर्मचारियों को सेवा में निरंतरता और परिणामी लाभ देने का आदेश आदेश दिया।
2015 में अंतरिम राहत, फिर भी जारी हुआ था चयन रद्द करने का आदेश
मामले की एक महत्वपूर्ण कड़ी जनवरी 2015 का अंतरिम आदेश भी था।सरकार ने 26 नवंबर 2014 को नोटिस जारी कर संबंधित कर्मचारियों से उनकी पात्रता के समर्थन में अतिरिक्त दस्तावेज मांगे थे।
कर्मचारियों ने इस नोटिस को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
रिकॉर्ड के अनुसार, हाईकोर्ट ने 12 जनवरी 2015 को अंतरिम आदेश पारित कर याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध किसी भी प्रकार की प्रतिकूल कार्रवाई करने पर रोक लगा दी थी।
इसके बावजूद 27 मई 2015 को सरकार ने उनका अंतिम चयन रद्द करने का आदेश जारी कर दिया। यही आदेश बाद में मुख्य विवाद का विषय बना।
याचिकाकर्ताओं ने इस आदेश को चुनौती देते हुए अदालत से राहत मांगी। लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद हाईकोर्ट ने अब 2015 के आदेश को निरस्त कर दिया है।
अंतिम आदेश: 100 दिनों में वेतन, भत्ते और सभी परिणामी लाभ
जस्टिस गणेश राम मीणा की एकलपीठ ने मामले के तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद याचिका स्वीकार कर ली।
अदालत ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि 27 मई 2015 को जारी वह आदेश, जिसके जरिए याचिकाकर्ताओं का अंतिम चयन रद्द किया गया था, अवैध, मनमाना, अनुचित और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत था। इसलिए उसे निरस्त किया जाता है।
कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से सेवा में निरंतर कार्यरत माना जाए। उन्हें उसी भर्ती प्रक्रिया में चयनित अन्य कर्मचारियों के अनुरूप वेतन निर्धारण और अन्य परिणामी लाभ दिए जाएं।
अदालत ने संबंधित अधिकारियों को बकाया वेतन और अन्य भत्तों की गणना करने तथा आदेश पारित होने की तारीख से 100 दिनों के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया।
सरकारी भर्ती और कर्मचारियों के अधिकारों के लिए क्यों अहम है फैसला?
राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी भर्ती में दस्तावेजों के सत्यापन और नियुक्ति रद्द करने की प्रक्रिया के संबंध में महत्वपूर्ण संदेश देता है।
पहला, नियुक्ति के बाद किसी अभ्यर्थी की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठने पर संबंधित विभाग जांच कर सकता है, लेकिन उस जांच के आधार पर प्रतिकूल आदेश पारित करते समय कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक है।
दूसरा, यदि कोई जांच रिपोर्ट कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई का आधार है, तो उसे रिपोर्ट की सामग्री से अवगत कराने और अपना पक्ष रखने का प्रभावी अवसर देने का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
तीसरा, नियुक्ति के समय दस्तावेज सत्यापित किए जाने और कर्मचारी के वर्षों तक सेवा में रहने के तथ्य को नजरअंदाज कर बिना उचित प्रक्रिया के नियुक्ति समाप्त करना न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है।
चौथा, रोजगार समाप्त करने वाले निर्णयों के व्यापक प्रभाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस मामले में अदालत ने कर्मचारियों की बढ़ती उम्र, लंबे समय तक सेवा देने और अन्य सरकारी नौकरी पाने की सीमित संभावनाओं पर ध्यान दिया।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि प्रशासनिक निर्णय केवल अधिकार का प्रयोग करके नहीं लिए जा सकते। जहां किसी व्यक्ति की नौकरी और भविष्य प्रभावित होता है, वहां निष्पक्ष प्रक्रिया, पारदर्शिता और कानून का पालन अनिवार्य है।
महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, मेघालय से PGDCA डिप्लोमा प्राप्त करने वाले छह सूचना सहायकों की नियुक्ति रद्द किए जाने का विवाद लगभग 11 साल तक चला।