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महिला हेल्थ वर्कर से यौन उत्पीड़न के आरोपी BCMO का सस्पेंशन बहाल, हाईकोर्ट ने कहा- 3 महीने में चार्जशीट नहीं देने पर निलंबन रद्द करना गलत; ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द, 6 महीने में जांच पूरी करने के आदेश

Rajasthan High Court Restores BCMO's Suspension, Says Delay in Charge Sheet Does Not Automatically Invalidate It

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने महिला हेल्थ वर्कर से कार्यस्थल पर कथित यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना कर रहे अलवर के ब्लॉक मुख्य चिकित्सा अधिकारी (BCMO) डॉ. रूपेंद्र कुमार शर्मा का निलंबन फिर से बहाल कर दिया है।

हाईकोर्ट ने राजस्थान सिविल सर्विसेज अपीलेट ट्रिब्यूनल का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें 3 महीने के भीतर चार्जशीट जारी नहीं होने के आधार पर डॉक्टर का निलंबन निरस्त किया गया था।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने राज्य सरकार की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि चार्जशीट जारी होने में देरी मात्र से निलंबन अपने आप अवैध नहीं हो जाता।

हाईकोर्ट ने विभाग को चार्जशीट की तामील से 6 महीने के भीतर विभागीय जांच पूरी करने के लिए हरसंभव प्रयास करने का निर्देश दिया।

मामले में राज्य सरकार की ओर से एडिशनल गवर्नमेंट काउंसिल (Addl. GC) आर्चित बोहरा ने पैरवी की। वहीं, डॉ. रूपेंद्र कुमार शर्मा की ओर से अधिवक्ता प्रखर जैन, यशवंत सिंह, अश्विनी जेमन, आर.पी. सैनी, मोइन खान और आमिर खान ने पक्ष रखा।

यौन उत्पीड़न के आरोप के बाद विभाग ने किया था निलंबित

डॉ. रूपेंद्र कुमार शर्मा राजस्थान के अलवर जिले में ब्लॉक मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। उनके खिलाफ एक महिला हेल्थ वर्कर ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत की थी।

शिकायत की गंभीरता को देखते हुए विभाग ने 16 जनवरी 2026 को राजस्थान सिविल सर्विसेज (क्लासिफिकेशन, कंट्रोल एंड अपील) रूल्स, 1958 के नियम 13 के तहत उन्हें निलंबित कर दिया था।

राज्य सरकार का कहना था कि अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच प्रस्तावित थी और निलंबन आदेश में चार्जशीट जारी करने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश भी दिया गया था।

सरकार ने दलील दी कि जांच निष्पक्ष रखने और शिकायतकर्ता सहित गवाहों पर किसी तरह का प्रभाव पड़ने से रोकने के लिए निलंबन जरूरी था।

ट्रिब्यूनल ने रद्द किया था निलंबन, सरकार ने हाईकोर्ट में दी चुनौती

डॉ. रूपेंद्र कुमार शर्मा ने अपने निलंबन आदेश को राजस्थान सिविल सर्विसेज अपीलेट ट्रिब्यूनल में चुनौती दी थी। ट्रिब्यूनल ने 19 मार्च 2026 को यह कहते हुए निलंबन रद्द कर दिया कि 3 महीने के भीतर चार्जशीट जारी नहीं की गई थी।

राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सरकार का तर्क था कि नियम 13 के तहत विभागीय जांच प्रस्तावित होने पर भी कर्मचारी को निलंबित किया जा सकता है। निलंबन से पहले चार्जशीट जारी करना जरूरी नहीं है और चार्जशीट देने में देरी मात्र से निलंबन अपने आप अवैध नहीं हो जाता।

सरकार ने यह भी कहा कि निलंबन आदेश के साथ ही विभागीय कार्यवाही शुरू करने के लिए आरोपपत्र तैयार करने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद चार्जशीट तैयार करने, सक्षम अधिकारी से मंजूरी लेने और संबंधित दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया चल रही थी।

यह भी दलील दी कि डॉ. शर्मा ने निलंबन आदेश के कुछ ही दिनों बाद ट्रिब्यूनल में अपील कर दी थी। उस समय 3 महीने की अवधि भी पूरी नहीं हुई थी। ऐसे में चार्जशीट जारी करने में देरी को आधार बनाकर निलंबन रद्द करना उचित नहीं था।

चार्जशीट नहीं मिलने से सस्पेंशन अपने आप खत्म नहीं होता: हाईकोर्ट

जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा कि निलंबन अपने आप में सजा नहीं, बल्कि निष्पक्ष विभागीय जांच सुनिश्चित करने के लिए उठाया जाने वाला अंतरिम कदम है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कर्मचारी अपने पद का इस्तेमाल कर सबूतों से छेड़छाड़ न करे और गवाहों को प्रभावित न कर सके।

हाईकोर्ट ने कहा कि डॉ. शर्मा के निलंबन आदेश के साथ एक नोट लगाया गया था, जिसमें उनके खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर विभागीय कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया था। इससे स्पष्ट था कि विभागीय जांच कराने पर विचार किया जा रहा था।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल ने निलंबन रद्द करते समय इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि डॉ. शर्मा ने निलंबन आदेश को 3 महीने की अवधि पूरी होने से पहले ही चुनौती दे दी थी। ऐसे में चार्जशीट 3 महीने के भीतर जारी नहीं होने के आधार पर निलंबन रद्द करना उचित नहीं था।

निलंबन आदेश में जांच का जिक्र नहीं, फिर भी हाईकोर्ट ने माना वैध

हाईकोर्ट ने पाया कि डॉ. शर्मा के निलंबन आदेश में विभागीय जांच प्रस्तावित होने का स्पष्ट जिक्र नहीं था। हालांकि, आदेश के साथ लगाए गए नोट में आरोपपत्र तैयार कर विभागीय कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया था।

हाईकोर्ट के कहा कि इससे सक्षम अधिकारी की मंशा स्पष्ट थी कि मामले में विभागीय जांच कराई जानी है। इसलिए आदेश में जांच प्रस्तावित होने की बात स्पष्ट रूप से नहीं लिखे होने मात्र से निलंबन को अवैध नहीं माना जा सकता।

‘यौन उत्पीड़न के मामलों में शिकायतकर्ता के हितों की रक्षा जरूरी’

हाईकोर्ट ने कहा कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों में शिकायतकर्ता के हितों और निष्पक्ष जांच का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। केवल तकनीकी आधार पर निलंबन रद्द करने से शिकायतकर्ता पर दबाव पड़ने की आशंका हो सकती है।

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने डॉ. रूपेंद्र कुमार शर्मा पर लगे आरोपों के सही या गलत होने पर कोई राय नहीं दी है। विभागीय जांच अधिकारी को हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना कानून के अनुसार जांच पूरी करनी होगी।

ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द, 6 महीने में जांच पूरी करने का आदेश

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका स्वीकार करते हुए 19 मार्च 2026 को राजस्थान सिविल सर्विसेज अपीलेट ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द कर दिया। इसके साथ ही 16 जनवरी 2026 का निलंबन आदेश फिर से प्रभावी हो गया।

विभाग को निर्देश दिया गया कि चार्जशीट की तामील की तारीख से 6 महीने के भीतर विभागीय जांच पूरी करने के लिए हरसंभव प्रयास करे। जांच कानून के अनुसार और डॉक्टर को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद पूरी की जानी चाहिए।

डॉ. रूपेंद्र कुमार शर्मा को भी जांच में सहयोग करने और अनावश्यक स्थगन नहीं मांगने का निर्देश दिया गया है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निलंबन बहाल करने का आदेश आरोपों को सही ठहराने वाला फैसला नहीं है। जांच अधिकारी हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना मामले की जांच पूरी करेगा।

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