जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि केवल संपत्ति विवाद लंबित होने या यथास्थिति (स्टेटस-क्वो) आदेश पारित होने के आधार पर किसी व्यक्ति को बिजली कनेक्शन देने से वंचित नहीं किया जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आवेदक संबंधित संपत्ति पर कब्जे में है और उसने आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर दी हैं, तो विद्युत वितरण कंपनी पर बिजली कनेक्शन देने का दायित्व बनता है।
यह फैसला जस्टिस मुकेश राजपुरोहित की एकलपीठ ने सुरेंद्र हिंदू सिंह भाटी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
याचिकाकर्ता ने जैसलमेर स्थित विवादित मकान के लिए बिजली कनेक्शन बहाल करने की मांग की थी।
याचिका में दलीलें
याचिकाकर्ता सुरेंद्र हिंदू सिंह भाटी की ओर से अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि विवादित संपत्ति के संबंध में प्रतिवादी के खिलाफ दीवानी वाद दायर किया गया है, जिसमें कथित फर्जी विक्रय विलेख को निरस्त करने की मांग की गई है।
इस वाद में ट्रायल कोर्ट ने 17 जनवरी 2025 को दोनों पक्षों को यथास्थिति बनाए रखने का अंतरिम आदेश दिया था।
याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि वह संबंधित मकान के वास्तविक कब्जे में है तथा वैधानिक रूप से बिजली कनेक्शन प्राप्त करने का अधिकारी है।
इसके लिए उसने DISCOM के समक्ष विधिवत आवेदन प्रस्तुत किया और बिजली बिलों की बकाया राशि सहित सभी आवश्यक शुल्क भी जमा करा दिए। इसके बावजूद प्रतिवादी अधिकारियों ने 11 मार्च 2026 के आदेश द्वारा केवल स्टेटस-क्वो आदेश का हवाला देते हुए बिजली कनेक्शन देने से इनकार कर दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 43 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी परिसर का मालिक या कब्जाधारी है, तो वितरण कंपनी पर एक माह के भीतर बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराने का वैधानिक दायित्व है।
इसलिए DISCOM का आदेश कानून के विपरीत और मनमाना है। याचिकाकर्ता ने अदालत से आग्रह किया कि बिजली कनेक्शन बहाल करने के निर्देश दिए जाएं।
डिस्कॉम का विरोध
प्रतिवादी DISCOM की ओर से जवाब में कहा गया कि जिस मकान के लिए बिजली कनेक्शन मांगा गया है, वह विवादित संपत्ति है और उसके स्वामित्व को लेकर दीवानी वाद न्यायालय में लंबित है।
चूंकि ट्रायल कोर्ट ने दोनों पक्षों को यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया हुआ है, इसलिए विभाग ने सावधानी बरतते हुए बिजली कनेक्शन जारी नहीं किया।
प्रतिवादी पक्ष ने अदालत को बताया कि प्रतिवादी संख्या-4 द्वारा आपत्ति दर्ज कराई गई थी, जिसके आधार पर 11 मार्च 2026 को याचिकाकर्ता का आवेदन निरस्त किया गया।
डिस्कॉम का कहना था कि जब तक संपत्ति विवाद का अंतिम निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक बिजली कनेक्शन देने से भविष्य में कानूनी विवाद और जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं।
हाईकोर्ट ने क्या कहा…
राजस्थान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि यह तथ्य विवादित नहीं है कि याचिकाकर्ता मकान के कब्जे में है।
हाईकोर्ट ने विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 43 का हवाला देते हुए कहा कि वितरण कंपनी पर यह वैधानिक दायित्व है कि आवेदन प्राप्त होने के एक माह के भीतर बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराया जाए।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि दीवानी वाद लंबित होना और स्टेटस-क्वो आदेश पारित होना, अपने आप में बिजली कनेक्शन देने से इनकार करने का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने पूर्व में पारित “सुषिला देवी बनाम जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड” मामले के निर्णय का भी उल्लेख किया।
अंतिम आदेश
अंततः हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को पुनः आवेदन करने का निर्देश दिया तथा DISCOM को आदेश दिया कि आवेदन प्राप्त होने के एक माह के भीतर बिजली कनेक्शन प्रदान किया जाए।
साथ ही स्पष्ट किया गया कि बिजली कनेक्शन दिए जाने का अर्थ संपत्ति के स्वामित्व की पुष्टि नहीं माना जाएगा।