हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला-चार्जशीट दाखिल करने से पहले SHO को स्वयं जांच, साक्ष्य और कानूनी धाराओं का करना होगा परीक्षण; पुनरीक्षण अदालत का आदेश रद्द।
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस थानों में आए मुकदमों की जांच और थाना प्रभारियों (SHO) की जिम्मेदारियों को लेकर रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेशभर में पुलिस द्वारा अदालतों में पेश की जाने वाली चार्जशीट में थाना प्रभारी की भूमिका और जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि पुलिस थाने का सर्वोच्च अधिकारी होने के कारण SHO प्रत्येक चार्जशीट की वैधानिक गुणवत्ता के लिए उत्तरदायी होगा।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि न्याय की शुरुआत तथ्यों से होती है और तथ्य निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच से सामने आते हैं।
SHO केवल ‘पोस्ट ऑफिस’ नहीं…
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि जांच पक्षपातपूर्ण, लापरवाह या कानून के अनुरूप नहीं होगी तो न्याय की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रत्येक SHO और जांच अधिकारी का संवैधानिक तथा वैधानिक दायित्व है कि वह बिना किसी भय, पक्षपात या दबाव के केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच करे।
इतना ही नहीं, हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि थाना प्रभारी (SHO) केवल एक ‘पोस्ट ऑफिस’ नहीं है, जिसका काम विवेचना अधिकारी द्वारा तैयार की गई चार्जशीट को यांत्रिक रूप से अदालत को भेज देना हो।
कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट दाखिल करने से पहले SHO को स्वयं उपलब्ध साक्ष्यों, लागू कानून तथा जांच की गुणवत्ता का स्वतंत्र परीक्षण करना अनिवार्य है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो उसके विरुद्ध भी विधिक उत्तरदायित्व तय हो सकता है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने यह फैसला राजेन्द्र प्रसाद की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
दुर्घटना से शुरू हुआ विवाद
वर्ष 2013 में याचिकाकर्ता राजेन्द्र प्रसाद एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
दुर्घटना में उनके बाएं पैर में फ्रैक्चर हुआ, जो भारतीय दंड संहिता के अनुसार गंभीर चोट (Grievous Hurt) की श्रेणी में आता है।
घटना के बाद मुंडावर थाने में एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन पुलिस ने जांच पूरी होने के बाद चालक के विरुद्ध केवल धारा 279 और 337 आईपीसी के तहत चार्जशीट पेश की।
जबकि एक्स-रे रिपोर्ट और मेडिकल दस्तावेज स्पष्ट रूप से दर्शाते थे कि पीड़ित को फ्रैक्चर हुआ था, जिसके कारण धारा 338 आईपीसी भी लागू होती थी।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि पुलिस ने जानबूझकर धारा 338 आईपीसी को चार्जशीट में शामिल नहीं किया, जिससे उन्हें उचित मुआवजा प्राप्त करने के अधिकार से वंचित होना पड़ा।
यह भी कहा गया कि यह केवल जांच अधिकारी की गलती नहीं थी, बल्कि SHO भी इसके लिए समान रूप से जिम्मेदार था क्योंकि उसने बिना जांच की समीक्षा किए चार्जशीट अदालत में प्रस्तुत कर दी।
पुनरीक्षण अदालत ने SHO को दी थी राहत
मामले में ट्रायल कोर्ट ने SHO धर्म सिंह मीणा और हेड कांस्टेबल राजेन्द्र प्रसाद दोनों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 166 एवं 167 के तहत संज्ञान लिया था।
बाद में पुनरीक्षण अदालत ने यह कहते हुए SHO के विरुद्ध संज्ञान निरस्त कर दिया कि वास्तविक जांच हेड कांस्टेबल ने की थी और SHO केवल चार्जशीट पेश करने वाला अधिकारी था।
इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता राजेन्द्र प्रसाद की ओर से दलील दी गई कि सड़क दुर्घटना में उसे गंभीर चोटें आई थीं और बाएं पैर में फ्रैक्चर हुआ था।
इसके बावजूद पुलिस ने आरोपी चालक के विरुद्ध केवल भारतीय दंड संहिता की धारा 279 एवं 337 के तहत ही चार्जशीट पेश की, जबकि उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड, चोट रिपोर्ट और एक्स-रे रिपोर्ट के आधार पर धारा 338 आईपीसी का अपराध स्पष्ट रूप से बनता था।
अधिवक्ता ने कहा कि धारा 338 को जानबूझकर शामिल नहीं करने के कारण उन्हें उचित मुआवजा प्राप्त करने के अधिकार से वंचित होना पड़ा।
याचिकाकर्ता ने कहा कि इसी कारण ट्रायल कोर्ट ने तत्कालीन SHO धर्म सिंह मीणा और हेड कांस्टेबल राजेन्द्र प्रसाद के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 166 एवं 167 के तहत संज्ञान लिया था।
याचिकाकर्ता का कहना था कि थाना प्रभारी होने के नाते SHO का वैधानिक दायित्व था कि वह जांच की निगरानी करता, जांच की समीक्षा करता और यह सुनिश्चित करता कि चार्जशीट सही धाराओं के साथ अदालत में पेश की जाए।
ऐसा न करके SHO ने अपनी कानूनी जिम्मेदारी का पालन नहीं किया, इसलिए SHO और जांच अधिकारी दोनों समान रूप से उत्तरदायी हैं।
सरकार का जवाब
राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक तथा प्रतिवादी संख्या-2 धर्म सिंह मीणा की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि संबंधित मामले की जांच SHO ने नहीं बल्कि हेड कांस्टेबल राजेन्द्र प्रसाद ने की थी।
SHO ने केवल विवेचना अधिकारी द्वारा तैयार की गई चार्जशीट अदालत में पेश की थी। इसलिए उनके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 166 एवं 167 के तहत कोई अपराध नहीं बनता। उनका कहना था कि SHO की ओर से किसी प्रकार की दुर्भावना (Mens Rea) या जानबूझकर कानून का उल्लंघन करने का कोई प्रमाण नहीं है।
सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई कि पुनरीक्षण न्यायालय ने उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन करते हुए एक तर्कसंगत एवं विधिसम्मत आदेश पारित किया था, जिसके माध्यम से SHO के विरुद्ध संज्ञान निरस्त किया गया।
सरकार ने कहा कि इसलिए उस आदेश में हाईकोर्ट द्वारा हस्तक्षेप किए जाने की आवश्यकता नहीं है और याचिका को खारिज किया जाना चाहिए।
“निष्पक्ष जांच” संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि निष्पक्ष जांच और निष्पक्ष सुनवाई संविधान के अनुच्छेद 20 और 21 के तहत संरक्षित मौलिक अधिकारों का हिस्सा हैं। इसलिए किसी भी जांच एजेंसी को ऐसी जांच करने की अनुमति नहीं दी जा सकती जो पक्षपातपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण या अपारदर्शी हो।
हाईकोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष जांच केवल आरोपी का ही अधिकार नहीं है बल्कि पीड़ित का भी समान अधिकार है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Nirmal Singh Kahlon बनाम State of Punjab (2009) 1 SCC 441 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि दोषपूर्ण जांच न्याय व्यवस्था में समाज के विश्वास को कमजोर करती है।
इससे आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होती है और पीड़ित के अधिकारों का भी हनन होता है। इसलिए न्याय व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने का एकमात्र उपाय निष्पक्ष और ईमानदार जांच है।
SHO पुलिस थाने का कप्तान
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में SHO की भूमिका पर विशेष टिप्पणी करते हुए कहा कि थाना प्रभारी केवल एक प्रशासनिक अधिकारी नहीं बल्कि पूरे पुलिस थाने का कप्तान होता है।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस स्टेशन के संचालन, अनुशासन, कानून-व्यवस्था और प्रत्येक विवेचना की निगरानी की अंतिम जिम्मेदारी उसी की होती है।
न्यायालय ने कहा कि SHO की जिम्मेदारियां केवल अपराध दर्ज करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने, अपराधों की जांच का नेतृत्व करने, अधीनस्थ कर्मचारियों का मार्गदर्शन करने तथा जनता और पुलिस के बीच विश्वास कायम रखने का भी दायित्व निभाता है।
चार्जशीट दाखिल करना केवल औपचारिकता नहीं
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को आंख बंद करके स्वीकार करना SHO का कर्तव्य नहीं है।
उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच निष्पक्ष, समयबद्ध और कानून के अनुरूप हुई है।
साथ ही यह भी देखना होगा कि एकत्र किए गए साक्ष्य वास्तव में किन धाराओं के तहत अपराध सिद्ध करते हैं।
चार्जशीट दाखिल करना महज औपचारिक प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह एक गंभीर वैधानिक दायित्व है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि SHO उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों का स्वतंत्र परीक्षण किए बिना चार्जशीट न्यायालय में भेज देता है तो वह अपनी कानूनी जिम्मेदारी निभाने में विफल माना जाएगा और ऐसी स्थिति में उसकी व्यक्तिगत जवाबदेही भी तय हो सकती है।
SHO ने नहीं किया दायित्व का निर्वहन
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड में उपलब्ध एक्स-रे रिपोर्ट और चिकित्सकीय दस्तावेज स्पष्ट रूप से दर्शाते थे कि पीड़ित को फ्रैक्चर हुआ था।
ऐसी स्थिति में धारा 338 आईपीसी का अपराध स्पष्ट रूप से बनता था। इसके बावजूद चार्जशीट केवल धारा 279 और 337 आईपीसी के तहत दाखिल की गई।
हाईकोर्ट ने माना कि यद्यपि वास्तविक विवेचना हेड कांस्टेबल ने की थी, लेकिन इससे SHO की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। SHO का दायित्व था कि वह जांच की समीक्षा करता, मेडिकल रिकॉर्ड का परीक्षण करता और उचित धाराओं के साथ चार्जशीट दाखिल करवाता।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा न करके उसने अपनी पर्यवेक्षण संबंधी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया। इसलिए उसके विरुद्ध भी प्रथम दृष्टया भारतीय दंड संहिता की धारा 166 एवं 167 के तहत मामला बनता है।
पुनरीक्षण अदालत का आदेश रद्द
हाईकोर्ट ने कहा कि पुनरीक्षण न्यायालय ने केवल इस आधार पर SHO को राहत दे दी कि उसने स्वयं जांच नहीं की थी।
कोर्ट ने कहा कि यह दृष्टिकोण विधिसम्मत नहीं है क्योंकि SHO का दायित्व केवल हस्ताक्षर करना नहीं बल्कि पूरी जांच का पर्यवेक्षण करना है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण न्यायालय द्वारा SHO के पक्ष में पारित आदेश को रद्द कर दिया तथा याचिका स्वीकार कर ली।
साथ ही स्पष्ट किया कि मुकदमे का अंतिम निर्णय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा और हाईकोर्ट की टिप्पणियां केवल इस याचिका के निस्तारण तक सीमित रहेंगी।
पूरे राजस्थान के SHOs के लिए जारी निर्देश
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आदेश की प्रति राजस्थान सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) तथा पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजने का निर्देश देते हुए संपूर्ण प्रदेश के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य के सभी थाना प्रभारियों को स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं कि वे “पोस्ट ऑफिस” की तरह केवल जांच रिपोर्ट न्यायालय में अग्रेषित न करें।
कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक SHO को उपलब्ध साक्ष्यों, विवेचना की गुणवत्ता और लागू कानून का स्वतंत्र परीक्षण कर अपनी स्वयं की राय बनानी होगी और उसके बाद ही दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 के तहत चार्जशीट अथवा अंतिम रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करनी होगी।