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किराऐदारी को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पिता के साथ कारोबार करने से खत्म नहीं होती बेटे की स्वतंत्र व्यवसाय स्थापित करने की जरूरत, मुकदमे के फैसले तक बेरोजगार बैठा नहीं रह सकता मकान मालिक

Rajasthan High Court Rejects Plea to Amend 26-Year-Old Shop Dispute, Upholds Trial Court Order
हाईकोर्ट ने दो दशक पुराने मामले में मकान मालिक को राहत, किरायेदार के कब्जे वाली दुकान की आवश्यकता को माना वैध आधार, कोर्ट ने कहा-जीवन और आजीविका न्यायिक कार्यवाही के दौरान ठहर नहीं जाते।

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने किरायेदारी और दुकान खाली कराने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति अपने पिता या भाई के साथ पारिवारिक कारोबार में काम कर रहा है, तो केवल इस आधार पर उसकी स्वतंत्र व्यवसाय स्थापित करने की वास्तविक और सद्भाविक आवश्यकता को खारिज नहीं किया जा सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के पास आजीविका का मौजूदा साधन होना और उसके पास अपना स्वतंत्र व्यावसायिक प्रतिष्ठान उपलब्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। मुकदमे के लंबित रहने के दौरान व्यक्ति से बेरोजगार रहने की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि पारिवारिक कारोबार में काम करना स्वतंत्र व्यवसाय स्थापित करने की वास्तविक आवश्यकता के रास्ते में स्वतः बाधा नहीं है।

न्यायिक कार्यवाही में होने वाली देरी के कारण किसी मकान मालिक को अपनी आजीविका और व्यावसायिक आकांक्षाओं को अनिश्चितकाल तक रोककर रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने भारत कुमार की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए किराया अधिकरण, जोधपुर मेट्रो के 27 मई 2011 के आदेश और अपीलीय किराया अधिकरण के 22 मई 2015 के आदेश को निरस्त करने का आदेश दिया।

दोनों अधीनस्थ अधिकरणों ने मकान मालिकों की बेदखली याचिका खारिज कर दी थी।

क्या है पूरा मामला?

मामला जोधपुर के रेलवे स्टेशन रोड स्थित एक किराये की दुकान से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता भारत कुमार और उनकी पत्नी चंद्रा दुकान के मालिक एवं मकान मालिक थे।

उन्होंने राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 की धारा 9 के तहत किरायेदारों को बेदखल करने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।

मकान मालिकों का कहना था कि उन्हें सिलाई मशीनों, इलेक्ट्रॉनिक सामान, उपहार सामग्री और संबंधित वस्तुओं का अपना कारोबार शुरू करने के लिए विवादित दुकान की वास्तविक एवं सद्भाविक आवश्यकता है।

उनका यह भी कहना था कि किरायेदार अन्य परिसरों से अपना कारोबार संचालित कर रहे हैं।

हालांकि, किराया अधिकरण ने 27 मई 2011 को बेदखली याचिका खारिज कर दी।

इसके बाद मकान मालिकों ने अपील दायर की, लेकिन अपीलीय किराया अधिकरण ने भी 22 मई 2015 को अपील खारिज करते हुए पूर्व आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद दोनों आदेशों को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

पिता के साथ कारोबार करना स्वतंत्र दुकान की जरूरत को खत्म नहीं करता

हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि निचले अधिकरण ने इस तथ्य को प्रमुख आधार बनाया था कि भारत कुमार याचिका दायर करने से पहले और मुकदमे के लंबित रहने के दौरान अपने पिता के साथ दूसरी दुकान में कारोबार कर रहे थे।

इसी आधार पर उनकी स्वतंत्र दुकान की आवश्यकता को वास्तविक नहीं माना गया था।

जस्टिस फरजंद अली ने इस दृष्टिकोण से असहमति जताते हुए कहा कि पिता के साथ काम करना इस बात का प्रमाण नहीं है कि संबंधित व्यक्ति के पास अपना स्वतंत्र और उपयुक्त व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी उपलब्ध है।

कोई व्यक्ति अपने पिता या भाई के कारोबार में काम करते हुए अनुभव प्राप्त कर सकता है और साथ ही अपना अलग व्यवसाय स्थापित करने की वास्तविक इच्छा भी रख सकता है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित दुकान के संबंध में याचिकाकर्ता का पारिवारिक कारोबार से जुड़ाव और दुकान पर सह-स्वामित्व का दावा, अपने आप में, विवादित दुकान की स्वतंत्र व्यावसायिक आवश्यकता को समाप्त नहीं करता।

‘क्या मुकदमे के फैसले तक बेरोजगार बैठा रहता?’

फैसले में अदालत ने लंबित मुकदमे के दौरान मकान मालिक के आचरण पर की गई आपत्ति को भी महत्वपूर्ण माना।

हाईकोर्ट ने कहा कि बेदखली की कार्यवाही वर्ष 2005 में शुरू हुई थी और विवाद के निस्तारण में दो दशक से अधिक समय लग गया।

ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती थी कि वह दुकान खाली होने तक काम करना छोड़ दे और बेरोजगार बैठा रहे।

एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति विवादित दुकान का कब्जा मिलने की प्रतीक्षा करते हुए अपने पिता या भाई के साथ काम करता है, आजीविका कमाता है और प्रस्तावित कारोबार का अनुभव प्राप्त करता है, तो इस आचरण को उसकी सद्भाविक आवश्यकता के विरुद्ध नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट के अनुसार, जीवन और आजीविका न्यायिक कार्यवाही के दौरान ठहर नहीं जाते। किसी व्यक्ति का मौजूदा रोजगार या कारोबार में संलग्न रहना, अपने आप में, यह साबित नहीं करता कि उसे भविष्य में स्वतंत्र व्यवसाय के लिए दुकान की जरूरत नहीं है।

मकान मालिक तय करेगा कि उसे अपनी दुकान का उपयोग कैसे करना है

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में दोहराया कि सामान्यतः मकान मालिक अपनी व्यावसायिक जरूरत और संपत्ति के उपयोग के संबंध में बेहतर स्थिति में होता है।

किरायेदार यह निर्देश नहीं दे सकता कि मकान मालिक अपना कारोबार किस स्थान से चलाए या अपनी संपत्ति का उपयोग किस प्रकार करे।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि मकान मालिक की आवश्यकता वास्तविक और सद्भाविक है, तो केवल इस कारण उसका दावा खारिज नहीं किया जा सकता कि वह पहले से किसी अन्य दुकान पर कारोबार कर रहा है।

वह अपनी स्वतंत्र व्यावसायिक गतिविधि शुरू कर सकता है अथवा परिस्थितियों के अनुसार मौजूदा पारिवारिक कारोबार का विस्तार भी कर सकता है।

इस संदर्भ में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Anil Bajaj एवं अन्य बनाम Vinod Ahuja तथा Ramkubai (मृतक) के विधिक प्रतिनिधि एवं अन्य बनाम Hajarimal Dhokalchand Chandak एवं अन्य के फैसलों का हवाला दिया।

अदालत ने Hukum Chandra (मृतक) के विधिक प्रतिनिधि बनाम Nemi Chand Jain एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा व्यक्त सिद्धांत का भी संदर्भ दिया, जिसके अनुसार मकान मालिक के बेटे से बेदखली याचिका के निस्तारण तक निष्क्रिय या बेरोजगार बैठे रहने की अपेक्षा करना अनुचित है।

सद्भाविक आवश्यकता का आकलन केवल वर्तमान परिस्थितियों से नहीं होगा

फैसले में जस्टिस फरजंद अली ने स्पष्ट किया कि सद्भाविक आवश्यकता का वास्तविक परीक्षण इस बात से होना चाहिए कि क्या मकान मालिक ईमानदारी से विवादित परिसर का उपयोग उस उद्देश्य के लिए करना चाहता है, जिसे उसने बेदखली याचिका में बताया है।

केवल यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि मकान मालिक पहले से कहीं और काम कर रहा है, इसलिए उसे किरायेदार के कब्जे वाली दुकान की जरूरत नहीं है। इसी तरह, बिना ठोस साक्ष्य के यह आशंका भी नहीं मानी जा सकती कि कब्जा मिलने के बाद मकान मालिक दुकान किसी तीसरे व्यक्ति को किराये पर दे देगा।

अदालत ने कहा कि वास्तविक आवश्यकता और केवल किरायेदार को हटाने के लिए पेश किए गए दिखावटी दावे के बीच अंतर करना आवश्यक है। यदि आवश्यकता वास्तविक है, तो मौजूदा रोजगार या पारिवारिक कारोबार को उसके विरुद्ध निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता।

तीन साल तक दुकान दोबारा किराये पर देने पर कानूनी रोक

हाईकोर्ट ने राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 की धारा 9(i) में दिए गए वैधानिक संरक्षण का भी उल्लेख किया।

इस प्रावधान के अनुसार, सद्भाविक आवश्यकता के आधार पर बेदखली की डिक्री प्राप्त करने वाला मकान मालिक निर्धारित तीन वर्ष की अवधि के भीतर परिसर किसी अन्य व्यक्ति को किराये पर नहीं दे सकता।

यदि ऐसा किया जाता है, तो वैधानिक शर्तों के अधीन पूर्व किरायेदार किराया अधिकरण के समक्ष कब्जा वापस दिलाने की मांग कर सकता है।

अदालत ने कहा कि कानून में दुरुपयोग रोकने के लिए सुरक्षा मौजूद होने के बावजूद, केवल भविष्य में संभावित दुरुपयोग की आशंका के आधार पर वास्तविक आवश्यकता के दावे को पहले ही खारिज नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट ने क्यों किया हस्तक्षेप?

किरायेदारों की ओर से यह तर्क दिया गया था कि दोनों अधीनस्थ अधिकरणों ने साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद एक जैसे निष्कर्ष दिए हैं और संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट को उनमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

उनका यह भी कहना था कि वैकल्पिक परिसर से संबंधित आधार मूल कार्यवाही में उचित रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 227 के तहत उसका अधिकार क्षेत्र सामान्य अपीलीय अधिकार क्षेत्र नहीं है, लेकिन यदि अधीनस्थ अधिकरण ने महत्वपूर्ण साक्ष्यों का उचित परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन नहीं किया हो, गलत कानूनी आधार अपनाया हो या ऐसा निष्कर्ष निकाला हो जो स्पष्ट रूप से अनुचित हो, तो हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।

इस मामले में अदालत ने पाया कि पारिवारिक कारोबार में काम करने को स्वतंत्र व्यावसायिक प्रतिष्ठान की उपलब्धता के बराबर मान लेने से सद्भाविक आवश्यकता के प्रश्न का मूल्यांकन प्रभावित हुआ। इसलिए यह हस्तक्षेप का उपयुक्त मामला था।

हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता की अपने पिता के साथ कारोबार में संलग्नता मात्र के आधार पर उसकी स्वतंत्र दुकान की सद्भाविक आवश्यकता को नकारना उचित नहीं था।

अदालत ने भारत कुमार एवं अन्य की रिट याचिका स्वीकार करते हुए अपीलीय किराया अधिकरण का 22 मई 2015 का आदेश और किराया अधिकरण का 27 मई 2011 का आदेश निरस्त कर दिया।

इसके साथ ही लंबित स्थगन याचिका और अन्य आवेदन निस्तारित कर रिकॉर्ड वापस भेजने का आदेश दिया।

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