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जमीन से जुड़े हित का ठोस सबूत जरूरी, सिर्फ आशंका से नहीं बन सकते मामले में पक्षकार; राजस्व अपील में पक्षकार बनाने से हाईकोर्ट का इनकार, कहा- दस्तावेज पेश नहीं कर सके याचिकाकर्ता

Rajasthan High Court Rejects Plea to Restore Two Names in Panchayat Voter List After Election Schedule

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने भीलवाड़ा जिले में कृषि भूमि के आवंटन से जुड़े विवाद में कुछ लोगों को लंबित अपील में पक्षकार बनाने की मांग खारिज कर दी है।

फैसला सुनाते हुए जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी ने कहा कि केवल यह आशंका जताना पर्याप्त नहीं है कि किसी अपील के फैसले से उनके हित प्रभावित हो सकते हैं। संबंधित जमीन पर कानूनी अधिकार या वैध हित साबित करने के लिए ठोस दस्तावेज पेश करना जरूरी है।

हाईकोर्ट ने राजस्व मंडल के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ताओं को लंबित राजस्व अपील में पक्षकार बनाने की मांग खारिज कर दी गई थी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मनोहर सिंह राठौड़ ने पैरवी की।

भीलवाड़ा की जमीन से जुड़ा है मामला

मामला भीलवाड़ा जिले की बिजौलिया तहसील के केशुविलास गांव की कृषि भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, खसरा नंबर 422/177 की 3 बीघा जमीन 20 दिसंबर 1985 को शंभू सिंह को आवंटित की गई थी। बाद में याचिकाकर्ताओं के पिता ने यह जमीन खरीद ली और खातेदार बन गए।

वहीं, खसरा नंबर 462/177 की 3 बीघा जमीन सोहन तेली को आवंटित हुई थी। बाद में उसके नाम खातेदारी अधिकार दर्ज हुए और उसने यह जमीन पार्वती देवी को बेच दी।

हाईकोर्ट में विवाद इसी दूसरे खसरा नंबर की जमीन से जुड़ी राजस्व अपील में याचिकाकर्ताओं को पक्षकार बनाने की मांग को लेकर था।

याचिकाकर्ताओं की जमीन का आवंटन रद्द होने से शुरू हुआ विवाद

तहसीलदार बिजौलिया की अर्जी पर अतिरिक्त जिला कलेक्टर, भीलवाड़ा ने 26 अप्रैल 2008 को संबंधित आवंटन रद्द कर दिया। साथ ही, याचिकाकर्ताओं की जमीन का आवंटन रद्द करने की कार्यवाही शुरू करने के निर्देश भी दिए।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनके जमीन संबंधी अधिकार प्रभावित होने के बावजूद उन्हें उस समय की कार्यवाही में पक्षकार नहीं बनाया गया और न ही सुनवाई का अवसर दिया गया।

इसके बाद राजस्व अपीलीय प्राधिकरण, भीलवाड़ा ने 21 मई 2008 को अतिरिक्त जिला कलेक्टर का आदेश रद्द कर दिया। राज्य सरकार ने इस फैसले को राजस्थान राजस्व मंडल, अजमेर में चुनौती देते हुए दूसरी अपील दायर कर दी।

जमीन पर हक प्रभावित होने की दलील देकर पक्षकार बनाने की मांग

राज्य सरकार ने जब राजस्व अपीलीय प्राधिकरण के फैसले को राजस्थान राजस्व मंडल, अजमेर में चुनौती दी, तो याचिकाकर्ताओं ने भी इस अपील में पक्षकार बनने की मांग की।

उनका कहना था कि अतिरिक्त जिला कलेक्टर के आदेश में उनकी जमीन का आवंटन रद्द करने की कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन उस कार्यवाही में उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं मिला।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मनोहर सिंह राठौड़ ने दलील दी कि राजस्व मंडल में लंबित अपील का फैसला उनके जमीन संबंधी अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए उन्होंने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 1 नियम 10 और धारा 151 के तहत आवेदन देकर मांग की कि उन्हें भी अपील में पक्षकार बनाया जाए, ताकि वे अपना पक्ष रख सकें।

हालांकि, राजस्व मंडल ने 4 फरवरी 2026 को उनकी अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस आदेश को चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने माना- जमीन पर हक का सबूत नहीं दे सके याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मनोहर सिंह राठौड़ ने दलील दी कि अतिरिक्त जिला कलेक्टर के आदेश में उनकी जमीन का आवंटन रद्द करने की कार्यवाही शुरू करने के निर्देश भी दिए गए थे।

इसके बावजूद उन्हें संबंधित कार्यवाही में पक्षकार नहीं बनाया गया और न ही अपना पक्ष रखने का मौका मिला। उनका कहना था कि राजस्थान राजस्व मंडल में लंबित अपील का फैसला उनके जमीन संबंधी अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए उन्हें भी इस मामले में पक्षकार बनाया जाना चाहिए था।

जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि याचिकाकर्ता विवादित खसरा नंबर 462/177 की 3 बीघा जमीन पर अपना कानूनी हक या हित साबित करने के लिए कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर सके। कोर्ट ने माना कि राजस्व मंडल ने उनकी अर्जी खारिज करके सही किया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि लंबित अपील के फैसले से उनके हित प्रभावित हो सकते हैं। मामले में पक्षकार बनने के लिए विवादित जमीन से जुड़ा कानूनी हित साबित करना जरूरी है।

इसी तरह, जमीन से जुड़े अलग राजस्व मामले लंबित होने भर से भी किसी व्यक्ति को अपील में पक्षकार बनाने का आधार नहीं मिल जाता।

हाईकोर्ट ने राजस्व अपील में पक्षकार बनाने से किया इनकार

हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्थान राजस्व मंडल ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार किया था। पक्षकार बनाने के नियमों को समझने के लिए उसने सुप्रीम कोर्ट के ‘कस्तूरी बनाम इय्यामपेरुमल और सुमतिबाई बनाम पारस फाइनेंस कंपनी’ मामलों में दिए गए फैसलों का भी सहारा लिया था।

जस्टिस नूपुर भाटी ने कहा कि हाईकोर्ट के सामने केवल राजस्व मंडल के 4 फरवरी 2026 के आदेश की वैधता और उचित होने का सवाल था।

रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं मिला, जिससे साबित हो कि राजस्व मंडल ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया या उसके आदेश में ऐसी गंभीर कानूनी गलती थी, जिसके कारण हाईकोर्ट का हस्तक्षेप जरूरी होता।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

हाईकोर्ट ने राजस्व मंडल के 4 फरवरी 2026 के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं पाया और याचिका खारिज कर दी। इससे याचिकाकर्ताओं को लंबित दूसरी अपील में पक्षकार बनाए जाने की मांग पर राहत नहीं मिली।

हालांकि, हाईकोर्ट ने जमीन के मालिकाना हक पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया। कोर्ट के सामने केवल यह तय करने का सवाल था कि याचिकाकर्ताओं को राजस्व अपील में पक्षकार बनाने से इनकार करने वाले राजस्व मंडल के आदेश में हस्तक्षेप किया जाना चाहिए या नहीं।

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