14 साल पुराने तुलसानी ग्रुप पर छापे के मामले में हाईकोर्ट ने खारिज की कारोबारियों की याचिकाएं, कोर्ट ने कहा कार्रवाई के लिए विभाग के पास पर्याप्त आधार और “विश्वास करने का कारण” होना चाहिए
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने करोड़ों रुपए की कथित टैक्स चोरी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि विभाग के पास पर्याप्त आधार और “विश्वास करने का कारण” हो, तो केवल व्यापारिक प्रतिष्ठानों ही नहीं, बल्कि कारोबारियों के आवासीय परिसरों और घरों की तलाशी भी कानूनन वैध मानी जाएगी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने बीकानेर की चीनी कैंडी और खाद्य उत्पाद बनाने वाली फर्मों द्वारा दायर याचिकाएं खारिज करते हुए वाणिज्यिक कर विभाग की कार्रवाई को सही ठहराया।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने बीकानेर के तुलसानी ग्रुप की तीन फर्मों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया है।
रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए सुनाए गए फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि विभाग के पास ऐसी पर्याप्त सामग्री मौजूद थी, जिससे टैक्स चोरी की आशंका बनती थी और इसी आधार पर तलाशी व दस्तावेज जब्ती की कार्रवाई की गई।
इस फैसले को टैक्स चोरी और आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों में विभागीय जांच एजेंसियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।
क्या था मामला?
मामला बीकानेर की तीन फर्मों — मैसर्स अनिल शुगर कैंडी वर्क्स, मैसर्स तुलसानी फूड इंडस्ट्रीज और मैसर्स नागद नारायण एग्रो फूड — से जुड़ा था।
इसके साथ ही तीन अन्य फर्मों सहित छह फर्में “तुलसानी ग्रुप” से जुड़ी थीं और सभी एक ही परिवार द्वारा संचालित थीं।
नारायण दास तुलसानी, अनिल तुलसानी और कोमल तुलसानी, जो कि पिता, पुत्र और पुत्रवधू थे, अलग-अलग फर्मों के प्रोपराइटर थे।
9 सितंबर 2011 को वित्त विभाग को एक गुमनाम शिकायत प्राप्त हुई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि बीकानेर की छह फर्में करोड़ों रुपए की टैक्स चोरी कर रही हैं।
इन फर्मों ने 2012 में दायर याचिकाओं में वाणिज्यिक कर विभाग द्वारा की गई तलाशी और दस्तावेज जब्ती की कार्रवाई को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि विभाग ने बिना पर्याप्त आधार के उनके घरों पर छापेमारी की और यह कार्रवाई राजस्थान वैट एक्ट, 2003 की धारा 75 के प्रावधानों के विपरीत थी।
उनका तर्क था कि न तो घरों से व्यापार संचालित होने का कोई प्रमाण था और न ही वहां लेखा-जोखा रखे जाने का कोई रिकॉर्ड।
गुमनाम शिकायत से शुरू हुई जांच
9 सितंबर 2011 को वित्त विभाग को एक गुमनाम शिकायत मिली थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि बीकानेर की छह फर्में करोड़ों रुपए की टैक्स चोरी कर रही हैं।
शिकायत में कहा गया कि ये फर्में टैक्स फ्री या कम टैक्स वाली वस्तुओं के नाम पर दूसरे उत्पाद बेच रही हैं और फर्जी बिलिंग व बेनामी कारोबार के जरिए राजस्व को नुकसान पहुंचा रही हैं।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि फर्में “सी-फॉर्म” का दुरुपयोग कर रही थीं और वास्तविक कारोबार को छिपाने के लिए अलग-अलग नामों से कंपनियां संचालित की जा रही थीं।
विभागीय रिपोर्टों में भी उल्लेख किया गया था कि इन फर्मों के खिलाफ पहले से कई कर विवाद और भारी टैक्स डिमांड लंबित थीं।
शिकायत के आधार पर वाणिज्यिक कर विभाग ने 3 नवंबर 2012 को कंपनी के छह ठिकानों के साथ सभी मालिकों के आवास पर भी तलाशी ली और छापे की कार्रवाई करते हुए कई दस्तावेज जब्त किए।
याचिकाकर्ता फर्मों ने इसी कार्रवाई को अवैध बताते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया कि वाणिज्यिक कर विभाग ने उनके खिलाफ जो तलाशी और दस्तावेज जब्ती की कार्रवाई की, वह पूरी तरह अवैध, अधिकार क्षेत्र से बाहर और राजस्थान वैट एक्ट, 2003 के प्रावधानों के विपरीत थी।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उनकी फर्में बीकानेर के बीछवाल औद्योगिक क्षेत्र में पंजीकृत थीं और वहीं से व्यापार संचालित होता था।
इसके बावजूद विभाग ने उनके आवासीय परिसरों पर भी छापेमारी की, जबकि विभाग के पास ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं था, जिससे यह साबित हो कि घरों से व्यापार चल रहा था या वहां खाताबही और व्यवसायिक रिकॉर्ड रखे गए थे।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि राजस्थान वैट एक्ट की धारा 75(1)(a) के अनुसार तलाशी या निरीक्षण केवल व्यापारिक परिसर या उस स्थान पर किया जा सकता है, जहां अधिकारी को यह “विश्वास” हो कि व्यापार संचालित हो रहा है या खाताबही रखी गई है।
लेकिन इस मामले में विभाग ने केवल संदेह और गुमनाम शिकायत के आधार पर कार्रवाई की।
अधिवक्ता ने दलील दी कि विभाग ने कानून के तहत अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
राजस्थान वैट नियम, 2006 के नियम 51(1)(a) के अनुसार तलाशी से पहले अधिकारी को लिखित रूप में कारण दर्ज करना आवश्यक था कि तलाशी क्यों जरूरी है। लेकिन तलाशी मेमो और जब्ती मेमो में ऐसे कारणों का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि जब्ती मेमो में केवल इतना लिखा गया कि दस्तावेजों का सत्यापन नहीं हो पाया, जबकि घरों से कोई खाताबही मिली ही नहीं थी।
इसलिए यह कार्रवाई “Reason to Believe” पर आधारित नहीं, बल्कि केवल “mere suspicion” यानी साधारण संदेह पर आधारित थी।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “विश्वास” (Belief) और “आशा” (Hope) में अंतर होता है। केवल संभावना या अनुमान के आधार पर किसी नागरिक के घर में घुसकर तलाशी नहीं ली जा सकती।
अधिवक्ता ने कहा कि पूरी कार्रवाई एक गुमनाम शिकायत से शुरू हुई थी, जिसमें केवल टैक्स दरों और व्यापारिक वर्गीकरण को लेकर विवाद उठाए गए थे। शिकायत में कहीं यह आरोप नहीं था कि घरों से कारोबार चलाया जा रहा है या वहां दस्तावेज रखे गए हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि विभागीय रिपोर्टों में भी यह स्वीकार किया गया था कि टैक्स वर्गीकरण और टैक्स दरों से जुड़े विवाद पहले से विभिन्न मंचों पर लंबित थे और शिकायत में कोई ठोस या सत्यापित सामग्री नहीं थी। इसके बावजूद विभाग ने एक साथ व्यापारिक और आवासीय परिसरों की तलाशी का आदेश जारी कर दिया।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि विभाग को वास्तव में संदेह था, तो पहले व्यापारिक परिसरों की जांच की जानी चाहिए थी।
वहां से यदि कोई ठोस सामग्री मिलती, तभी घरों की तलाशी का निर्णय लिया जा सकता था। लेकिन विभाग ने बिना किसी अतिरिक्त सामग्री के सीधे घरों की तलाशी लेकर अपने अधिकारों का मनमाना इस्तेमाल किया।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि जिन आवासीय परिसरों में तलाशी हुई, उनमें से एक परिसर पहले ही किराए पर दिया जा चुका था। इसके बावजूद विभाग ने कथित किरायेदार की उपस्थिति सुनिश्चित किए बिना तलाशी कर ली। उन्होंने कहा कि उस परिसर से कोई खाताबही या वैध व्यवसायिक रिकॉर्ड बरामद नहीं हुआ।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया कि 3 नवंबर 2012 की तलाशी कार्रवाई करते हुए तलाशी और जब्ती मेमो जारी किए गए। विभाग ने मौके से कई दस्तावेज जब्त किए।
कर विभाग का जवाब
वाणिज्यिक कर विभाग की ओर से अदालत में कहा गया कि पूरी कार्रवाई कानून के तहत और पर्याप्त सामग्री के आधार पर की गई थी।
विभाग ने कहा कि 9 सितंबर 2011 को वित्त विभाग को एक गुमनाम शिकायत प्राप्त हुई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि बीकानेर की छह फर्में करोड़ों रुपए की टैक्स चोरी कर रही हैं।
विभाग ने बताया कि शिकायत को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू की गई और विभागीय रिपोर्टों में पाया गया कि संबंधित फर्मों के खिलाफ पहले से कई टैक्स विवाद और भारी टैक्स डिमांड लंबित थीं।
विभाग ने कहा कि छहों फर्में “तुलसानी ग्रुप” से जुड़ी थीं और सभी एक ही परिवार द्वारा संचालित थीं।
नारायण दास तुलसानी, अनिल तुलसानी और कोमल तुलसानी, जो कि पिता, पुत्र और पुत्रवधू थे, अलग-अलग फर्मों के प्रोपराइटर थे।
विभाग के अनुसार सभी फर्में लगभग समान प्रकार का कारोबार कर रही थीं और उनके खिलाफ पहले से टैक्स चोरी, टैक्स वर्गीकरण और कर देनदारी से जुड़े विवाद लंबित थे।
इससे विभाग के पास यह विश्वास करने का पर्याप्त आधार था कि बड़े स्तर पर टैक्स चोरी हो सकती है।
विभाग ने अदालत को बताया कि राजस्थान वैट एक्ट की धारा 75 के तहत अधिकृत अधिकारी को केवल व्यापारिक परिसर ही नहीं, बल्कि “किसी अन्य स्थान” की भी तलाशी का अधिकार है, यदि उसे यह विश्वास हो कि वहां व्यवसायिक रिकॉर्ड या कर चोरी से जुड़ी सामग्री हो सकती है।
विभाग ने कहा कि जिन घरों की तलाशी ली गई, वे संबंधित कारोबारियों के पते के रूप में विभागीय रिकॉर्ड और रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्रों में दर्ज थे। इसलिए उन परिसरों की जांच करना पूरी तरह वैध था।
जहां तक किराए पर दिए गए घर का सवाल है, विभाग ने कहा कि तलाशी के दौरान कारोबारियों को कई अवसर दिए गए कि वे किरायानामा प्रस्तुत करें या कथित किरायेदार को बुलाएं, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
विभाग ने यह भी बताया कि तलाशी के दौरान संबंधित परिसर से “नागद नारायण” नाम से जुड़े दस्तावेज और फाइलें दिखाई दीं तथा बाद में कई दस्तावेज बरामद भी हुए। इससे यह संदेह मजबूत हुआ कि परिसर का उपयोग व्यवसायिक गतिविधियों और दस्तावेज रखने के लिए किया जा रहा था।
विभाग ने कहा कि तलाशी और जब्ती की कार्रवाई पूरी तरह वैधानिक प्रक्रिया के तहत की गई, जिसमें तलाशी टीम गठित की गई, पंचनामा तैयार किया गया, जब्ती मेमो बनाया गया और कारण रिकॉर्ड किए गए।
विभाग ने अदालत से कहा कि टैक्स चोरी और आर्थिक अपराधों की जांच के लिए ऐसे अधिकार आवश्यक हैं और यदि हर मामले में अंतिम प्रमाण मिलने तक इंतजार किया जाए, तो कर चोरी की जांच असंभव हो जाएगी।
हाईकोर्ट का फैसला
रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए दिए इस फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विशेष रूप से उल्लेख किया कि छह फर्में एक ही “तुलसानी परिवार” से जुड़ी थीं।
पिता, पुत्र और पुत्रवधू अलग-अलग फर्मों के प्रोपराइटर थे, जबकि व्यवसाय लगभग समान प्रकृति का था। कोर्ट ने कहा कि यह तथ्य विभाग के संदेह को मजबूत करने के लिए पर्याप्त था।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जिन आवासीय परिसरों पर तलाशी हुई, वे इन्हीं कारोबारियों के नाम से पंजीकृत थे और विभाग के रिकॉर्ड में उनके पते के रूप में दर्ज थे।
तलाशी के दौरान संबंधित परिसरों से व्यापारिक दस्तावेज और फाइलें भी मिलीं, जिससे विभाग की कार्रवाई को बल मिला।
“सिर्फ शक नहीं, पर्याप्त आधार था”
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि विभाग ने केवल “संदेह” के आधार पर कार्रवाई की, लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि विभाग के पास शिकायत, पूर्व लंबित विवादों, समान व्यवसायिक गतिविधियों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध अन्य सामग्रियों के आधार पर “reason to believe” मौजूद था।
कोर्ट ने कहा कि तलाशी और जब्ती जैसी कार्रवाई भले कठोर हो, लेकिन यदि कानून के तहत आवश्यक प्रक्रिया का पालन किया गया हो और अधिकारी के पास पर्याप्त सामग्री हो, तो ऐसी कार्रवाई को अवैध नहीं कहा जा सकता।
विभागीय कार्रवाई को मिली बड़ी राहत
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में माना कि वाणिज्यिक कर विभाग ने राजस्थान वैट एक्ट की धारा 75 और नियम 51 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया था।
इसलिए तलाशी, दस्तावेज जब्ती और उसके बाद की कार्रवाई को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।
