श्रीगंगानगर के 4 पुलिस अधिकारियों को हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत, FIR के आदेश पर रोक, निचली अदालत को फिर से सुनवाई के निर्देश
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ दर्ज की जाने वाली एफआईआर के आदेश को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने से पहले कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
हाईकोर्ट ने कहा कि बिना पर्याप्त जांच और सुनवाई का अवसर दिए किसी भी सार्वजनिक सेवक के खिलाफ सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश देना न्यायसंगत नहीं है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले अदालतों को अत्यधिक सावधानी, कानूनी प्रक्रिया और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने प्रशांत कौशिक व 3 अन्य पुलिस अधिकारियों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।
पुलिस अधिकारियों ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए गए थे।
क्या था पूरा मामला?
श्रीगंगानगर के अनूपगढ़ पुलिस थाने में 20 अगस्त 2025 को संजय कुमार नाम के व्यक्ति ने टेकचंद और अन्य के खिलाफ BNS की गंभीर धाराओं और SC/ST एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराई।
पुलिस ने इस मामले में जांच पूर्ण होने के बाद चार्जशीट दायर की।
25 सितंबर 2025 को अनूपगढ़ पुलिस थाने में दूसरी FIR पहले मामले के आरोपी टेकचंद ने पलटवार करते हुए दर्ज करवाई।
इस एफआईआर में टेकचंद ने संजय कुमार व अन्य पर हत्या के प्रयास सहित कई गंभीर अपराधों में आरोप लगाए।
लेकिन पुलिस जांच में यह FIR झूठी और बदले के तहत दर्ज कराना साबित हुई, जिसके आधार पर 25 नवंबर 2025 को नेगेटिव फाइनल रिपोर्ट पेश की गई।
नाराज आरोपी ने कोर्ट में दी शिकायत
पुलिस की नेगेटिव फाइनल रिपोर्ट पर टेकचंद ने 1 नवंबर 2025 को जांच कर रहे पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एक निजी शिकायत दायर की।
टेकचंद ने पुलिस अधिकारियों पर आरोप लगाया कि जांच में जानबूझकर गड़बड़ी की गई और अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया।
यह भी आरोप लगाए गए कि पुलिस अधिकारियों ने टेकचंद के साथ मारपीट की।
टेकचंद द्वारा ट्रायल कोर्ट में दी गई निजी शिकायत पर एससी/एसटी एक्ट कोर्ट, श्रीगंगानगर ने 21 नवंबर 2025 को फैसला सुनाया।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारियों डीएसपी प्रशांत कौशिक, एएसआई मनोहर सिंह, एसआई सरदार सिंह और ड्राइवर किशन सिंह के खिलाफ BNSS की धारा 175(3) के तहत एसपी को FIR दर्ज करने का आदेश दिया।
याचिकाकर्ता चारों पुलिस अधिकारियों ने इस आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारियों की दलीलें
याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारियों की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि 21 नवंबर 2025 का कोर्ट का आदेश कानून के विपरीत (illegal) है, जो मजिस्ट्रेट ने अपने अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) से बाहर जाकर पारित किया।
अधिवक्ता ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने आदेश में कोई ठोस कारण (reasoning) नहीं दिया, जिसके चलते यह “नॉन-स्पीकिंग और मैकेनिकल ऑर्डर” है।
अधिवक्ता ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने आदेश देने से पहले उन्हें अपनी बात रखने का कोई अवसर नहीं दिया, जबकि वे सरकारी कर्मचारी (public servants) हैं।
अधिवक्ता ने कहा कि ऐसे मामलों में BNSS की धारा 223 के तहत सुनवाई का मौका देना जरूरी था और वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट लेना जरूरी था, लेकिन यह प्रक्रिया पूरी तरह नजरअंदाज की गई।
ड्यूटी के दायरे में
याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारियों की ओर से दलील दी गई कि आरोप आधिकारिक कार्य (Official Duty) से जुड़े हैं। उनके खिलाफ लगाए गए आरोप FIR की जांच और पुलिस कार्यवाही से जुड़े हैं, यानी उन्होंने जो किया, वह ड्यूटी के तहत किया।
अधिवक्ता ने दलील दी कि उनके खिलाफ सीधे FIR दर्ज करना गलत है, पहले यह जांच होना चाहिए कि कार्य “ड्यूटी के दायरे में” था या नहीं।
याचिका में यह भी कहा गया कि शिकायतकर्ता ने बदले और प्रतिशोधात्मक रुख के चलते एफआईआर दर्ज कराई (Retaliatory)।
अधिवक्ता ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में सीधे FIR दर्ज होने लगे तो पुलिस और प्रशासनिक कार्य ठप हो जाएगा और हर आरोपी व्यक्ति पुलिस पर उल्टा केस कर सकता है।
प्रतिवादी शिकायतकर्ता का पक्ष
प्रतिवादी शिकायतकर्ता टेकचंद की ओर से याचिका का विरोध किया गया।
विरोध में दलीलें दी गईं कि पुलिस ने मामले में जांच सही तरीके से नहीं की, जानबूझकर मामले को कमजोर किया।
दलील दी गई कि मामले में जानबूझकर साक्ष्यों को नजरअंदाज किया गया।
उसके साथ पुलिस द्वारा दुर्व्यवहार और मारपीट की गई और पुलिस अधिकारियों ने उसके साथ गाली-गलौज और जबरदस्ती की। यह आरोप SC/ST एक्ट और अन्य धाराओं के तहत लगाए गए।
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि उच्च अधिकारियों से शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं की गई। उसने पहले DGP (विजिलेंस), जयपुर को शिकायत दी थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में कहा कि याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आदेश जल्दबाजी में दिया गया और कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में धारा 223 की अनदेखी हुई।
हाईकोर्ट ने कहा कि “सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई संभव है, लेकिन प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि आदेश बिना सुनवाई के पारित हुआ और कोई कारण दर्ज नहीं किया गया, जो कि अधिकार क्षेत्र से बाहर और मनमाना है।
अंतिम आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ता श्रीगंगानगर के 4 पुलिस अधिकारियों को राहत देते हुए FIR के आदेश पर रोक लगा दी है, लेकिन प्रतिवादी को भी मौका देते हुए इस मामले में निचली अदालत को फिर से सुनवाई के आदेश दिए हैं।
