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आबकारी विभाग के पुनर्गठन पर राजस्थान हाईकोर्ट की रोक, सरकार के 1 जून के आदेशों की क्रियान्विति स्थगित

Rajasthan High Court Stays Excise Department Restructuring, Suspends State Government’s June 1 Orders
राजस्थान आबकारी सेवा संघ की याचिका पर हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश; नए सेवा नियम बनाए बिना विभागीय ढांचे में बदलाव को बताया गया विवादास्पद, कर्मचारियों की पदोन्नति और वरिष्ठता पर पड़ सकता था असर।

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने राज्य में आबकारी विभाग के पुनर्गठन और “आबकारी प्रवर्तन एवं निरोधक बल” के गठन से जुड़े राज्य सरकार के आदेशों पर महत्वपूर्ण अंतरिम रोक लगा दी है

जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली की एकलपीठ ने राजस्थान आबकारी सेवा संघ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए 1 जून 2026 को जारी वित्त (आबकारी) विभाग के आदेशों की क्रियान्विति और प्रभाव को अगले आदेश तक रोक लगाते हुए स्थगित कर दिया है।

मामले में राजस्थान आबकारी सेवा संघ ने राज्य सरकार के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसके तहत आबकारी विभाग की सामान्य शाखा और निरोधक शाखा की प्रशासनिक संरचना में व्यापक बदलाव करते हुए नए “आबकारी प्रवर्तन एवं निरोधक बल” का गठन किया गया था।

याचिकाकर्ता का कहना था कि सरकार ने यह कदम बिना नए सेवा नियम बनाए और मौजूदा वैधानिक नियमों में संशोधन किए बिना उठाया, जो विधि सम्मत नहीं है।

क्या है पूरा मामला?

राजस्थान आबकारी सेवा संघ एक पंजीकृत संगठन है, जो आबकारी विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करता है।

याचिका में कहा गया कि आबकारी विभाग में कार्यरत कर्मचारियों की भर्ती, पदोन्नति और सेवा शर्तें दो अलग-अलग वैधानिक नियमों द्वारा नियंत्रित होती हैं।

पहला, राजस्थान आबकारी अधीनस्थ सेवा (सामान्य शाखा) नियम, 1974, और दूसरा, राजस्थान आबकारी अधीनस्थ सेवा (निरोधक शाखा) नियम, 1976। ये दोनों नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत बनाए गए हैं और इनमें विभिन्न पदों की भर्ती, पदोन्नति तथा सेवा संरचना का स्पष्ट प्रावधान किया गया है।

याचिका के अनुसार, राज्य सरकार ने 1 जून 2026 को जारी आदेशों के माध्यम से विभागीय पुनर्गठन करते हुए सामान्य शाखा और निरोधक शाखा को एकीकृत करने की दिशा में कदम उठाया तथा नई प्रशासनिक संरचना लागू कर दी।

संघ का आरोप है कि ऐसा करते समय सरकार ने न तो 1974 और 1976 के नियमों में संशोधन किया और न ही कोई नए सेवा नियम अधिसूचित किए।

सरकार ने क्या बदलाव किए?

सरकारी आदेशों के तहत राज्य के संशोधित बजट प्रावधानों के आधार पर “आबकारी प्रवर्तन एवं निरोधक बल” का गठन किया गया।

इसके अंतर्गत नई प्रशासनिक संरचना तैयार करते हुए विभिन्न स्तरों पर कार्यालयों और पदों का पुनर्गठन किया गया।

याचिका में कहा गया कि इस नई व्यवस्था के तहत:

आबकारी आयुक्त के अधीन नई संरचना बनाई गई। जिनमें आठ संभाग स्तरीय अतिरिक्त आयुक्त कार्यालय स्थापित किए गए।

राज्य स्तर पर दो उप आयुक्त प्रवर्तन कार्यालय गठित किए गए।

साथ ही जयपुर और जोधपुर में स्वीकृत जिला आबकारी अधिकारी (अभियोजन) पदों का नाम परिवर्तित किया गया।

बड़ी संख्या में अधीनस्थ पदों और कार्यालयों का पुनर्गठन किया गया।

संघ का कहना है कि इन बदलावों का सीधा प्रभाव कर्मचारियों की सेवा शर्तों, वरिष्ठता और पदोन्नति के अधिकारों पर पड़ सकता है।

याचिकाकर्ता के प्रमुख तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत में दलील दी कि किसी भी वैधानिक नियम को केवल प्रशासनिक आदेश के माध्यम से अप्रभावी नहीं बनाया जा सकता।

यदि सरकार नई सेवा संरचना लागू करना चाहती है तो पहले उसे नए नियम बनाने होंगे या मौजूदा नियमों में विधिसम्मत संशोधन करना होगा।

याचिका में यह भी कहा गया कि 1974 और 1976 के नियमों के अंतर्गत सामान्य शाखा और निरोधक शाखा के कर्मचारियों की भर्ती और पदोन्नति की व्यवस्था अलग-अलग है।

ऐसे में दोनों शाखाओं को प्रशासनिक आदेश से जोड़ देने पर कर्मचारियों की वरिष्ठता और पदोन्नति से जुड़े गंभीर विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।

संघ ने यह भी आरोप लगाया कि पुनर्गठन से पहले प्रभावित कर्मचारियों या उनके प्रतिनिधि संगठन को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले का हवाला दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि कार्यपालिका द्वारा जारी निर्देश केवल वहां तक प्रभावी हो सकते हैं जहां कानून या नियम मौन हों।

यदि कोई प्रशासनिक आदेश किसी वैधानिक नियम या अधिनियम के विपरीत जाता है, तो उसे कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि राज्य सरकार का 1 जून 2026 का आदेश इसी श्रेणी में आता है क्योंकि वह मौजूदा सेवा नियमों के विपरीत प्रभाव उत्पन्न कर रहा है।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन किया और पाया कि सामान्य शाखा तथा निरोधक शाखा के लिए अलग-अलग सेवा नियम अस्तित्व में हैं और उन्हें अभी तक समाप्त नहीं किया गया है।

हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि यदि नए सेवा नियम बनाए बिना नई प्रशासनिक व्यवस्था लागू कर दी जाती है तो इससे उन कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं जो वर्तमान नियमों के तहत पदों पर कार्यरत हैं।

कोर्ट ने यह भी माना कि ऐसी स्थिति में वरिष्ठता, पदोन्नति और भर्ती से जुड़े कई जटिल विवाद पैदा हो सकते हैं। इससे न केवल कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित होंगे बल्कि विभाग में अनावश्यक कानूनी विवाद भी बढ़ सकते हैं।

अंतरिम राहत क्यों मिली?

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने नई संरचना तो लागू कर दी, लेकिन इसके लिए आवश्यक नए सेवा नियम अभी तक अधिसूचित नहीं किए गए हैं।

ऐसे में वर्तमान नियमों को बनाए रखते हुए नई व्यवस्था लागू करना विधिक दृष्टि से विवादास्पद प्रतीत होता है।

हाईकोर्ट ने माना कि यदि अंतरिम राहत नहीं दी गई तो कर्मचारियों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और बाद में स्थिति को पूर्ववत करना कठिन हो सकता है।

इसी आधार पर कोर्ट ने 1 जून 2026 को जारी आदेशों की क्रियान्विति और प्रभाव पर रोक लगाते हुए उन्हें अगले आदेश तक स्थगित कर दिया।

सरकार को दिया जवाब का अवसर

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह केवल अंतरिम आदेश है और मामले के अंतिम गुण-दोष पर अभी कोई राय व्यक्त नहीं की गई है।

राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर जवाब प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया है।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि राज्य सरकार चाहे तो स्थगन आदेश को निरस्त कराने के लिए विधिसम्मत आवेदन प्रस्तुत कर सकती है। इस अंतरिम आदेश का अंतिम सुनवाई पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं माना जाएगा।

कर्मचारियों में बढ़ी उम्मीद

हाईकोर्ट के इस आदेश को आबकारी विभाग के कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण राहत माना जा रहा है।

याचिका में कर्मचारियों के संगठन का कहना है कि यदि बिना स्पष्ट नियमों के नई व्यवस्था लागू हो जाती तो बड़ी संख्या में अधिकारियों और कर्मचारियों की पदोन्नति, वरिष्ठता और सेवा संबंधी अधिकार प्रभावित हो सकते थे।

यह मामला केवल आबकारी विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक पुनर्गठन और सेवा नियमों के संबंध में सरकारों की शक्तियों की सीमा को भी स्पष्ट करेगा।

अगली सुनवाई 7 जुलाई को

मामले में हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 7 जुलाई 2026 निर्धारित की है।

फिलहाल, हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद 1 जून 2026 को जारी पुनर्गठन संबंधी आदेशों का प्रभाव रोक दिया गया है, जिससे आबकारी विभाग की मौजूदा सेवा संरचना यथावत बनी रहेगी।

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