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बेटे की हत्या के आरोपियों को बरी करने के खिलाफ मां की अपील खारिज, कहा-बरी करने के फैसले में दखल का आधार नहीं

Right to Speedy Trial Is Not Just for Accused, Rajasthan High Court Tells Trial Court
मृतक की मां कस्कांडा ने चार आरोपियों को बरी करने के फैसले को दी थी चुनौती; प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों, मेडिकल साक्ष्यों, हथियारों की बरामदगी और पेन ड्राइव की फुटेज में गंभीर कमियों का किया विश्लेषण

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने बूंदी में आकाश सैनी की हत्या के मामले में चार आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ मृतक की मां कस्कांडा की अपील खारिज कर दी है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में ऐसी कोई कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर अपीलीय अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस फैसले में स्पष्ट किया कि केवल आरोप, कथित हथियारों की बरामदगी या मेडिकल निष्कर्ष अपने आप में दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं होते, यदि गवाहों के बयान, मेडिकल रिकॉर्ड और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य अभियोजन की कहानी की विश्वसनीय पुष्टि नहीं करते।

हाईकोर्ट ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने के 23 जनवरी 2026 के फैसले को बरकरार रखा।

जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल ओर जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने अपने फैसले में प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में विरोधाभास, मृतक की चोटों से संबंधित मेडिकल रिकॉर्ड की कमी, कथित हथियारों की बरामदगी की प्रक्रिया और पेन ड्राइव में मौजूद बताई गई वीडियो फुटेज की विश्वसनीयता सहित कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया।

क्या है पूरा मामला?

अभियोजन के अनुसार मामला बूंदी जिले में 7 अगस्त 2020 को हुई घटना से जुड़ा हैं.. मृतक आकाश सैनी प्राकृतिक पत्थर से संबंधित काम करने के बाद अपने गांव लौट रहा था।

शाम करीब छह बजे मालणमासी बालाजी के पास वह त्रिलोक मीणा के साथ मोटरसाइकिल पर था।

रास्ते में सोनू गुर्जर, निक्की उर्फ रूपेंद्र सिंह, जितेंद्र उर्फ जीतू और सुरेश ने उन्हें रोका। आरोप था कि सोनू ने लोहे के पाइप से आकाश के बाएं पैर और हाथ पर वार किया, जबकि अन्य आरोपियों ने भी लाठी-डंडों से मारपीट की।

कथित तौर पर त्रिलोक मीणा और लक्ष्मण गुर्जर ने बीच-बचाव कर आकाश को बचाया, जिसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया।

आकाश की मृत्यु के बाद पुलिस ने मामले में हत्या का आरोप भी जोड़ा। जांच के बाद सोनू, निक्की उर्फ रूपेंद्र सिंह, जितेंद्र उर्फ जीतू और सुरेश के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 341, 323, 302 और 34 के तहत आरोपपत्र पेश किया गया।

ट्रायल कोर्ट ने 23 जनवरी 2026 को चारों आरोपियों को हत्या के आरोप से संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

इसके बाद मृतक की मां कस्कांडा ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर आरोपियों को दोषी ठहराने और दंडित करने की मांग की।

मां की ओर से क्या दलील दी गई?

अपीलार्थी कस्कांडा की ओर से अधिवक्ता मनोज सेठ और पंकज शर्मा ने पक्ष रखा। अपीलार्थी की ओर से तर्क दिया गया कि पुलिस रिपोर्ट और ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश किए गए साक्ष्यों से आरोपियों द्वारा आकाश के साथ मारपीट करना और उसकी मृत्यु कारित करना साबित होता है।

उनकी ओर से कहा गया कि घटनास्थल से संबंधित साक्ष्य और कथित रूप से इस्तेमाल किए गए हथियारों की बरामदगी को उचित महत्व नहीं दिया गया।

अपीलार्थी ने आरोपियों को बरी करने के विचारण न्यायालय के फैसले को कानून के अनुरूप नहीं बताते हुए उसे निरस्त करने की मांग की।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने और दोनों पक्षों की दलीले सुनने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में ऐसी महत्वपूर्ण कमियां और विरोधाभास मौजूद थे, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था।

प्रत्यक्षदर्शियों के बयान अभियोजन की कहानी की पुष्टि नहीं करते

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आकाश की ओर से अस्पताल में दी गई लिखित रिपोर्ट में दावा किया गया था कि त्रिलोक मीणा उसके साथ मोटरसाइकिल पर था और उसने आरोपियों द्वारा की गई मारपीट देखी थी।

हालांकि, ट्रायल कोर्ट में गवाह ने अपने बयान में घटना को प्रत्यक्ष रूप से देखने से इनकार किया। उसने यह भी कहा कि उसके सामने सोनू, निक्की, जितेंद्र और सुरेश द्वारा आकाश के साथ मारपीट किए जाने की बात सही नहीं है।

अदालत ने यह भी नोट किया कि लिखित रिपोर्ट में दूसरे प्रत्यक्षदर्शी के रूप में गवाह ने भी मारपीट देखने और किसी घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने से इनकार किया।

खंडपीठ के अनुसार, अभियोजन की प्रारंभिक कहानी और अदालत में दिए गए इन गवाहों के बयानों के बीच महत्वपूर्ण अंतर था। इससे अभियोजन की कहानी को समर्थन देने वाले प्रत्यक्ष साक्ष्य कमजोर पड़ते थे।

मृतक की मां ने रिपोर्ट लिखने के संबंध में क्या कहा?

अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि अस्पताल में आकाश की ओर से लिखित रिपोर्ट दिए जाने की बात कही गई थी।

लेकिन मृतक की मां कस्कांडा ने अपनी जिरह में कहा कि आकाश ने स्वयं रिपोर्ट लिखकर नहीं दी थी और इस संबंध में दर्ज कथन को गलत बताया।

हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि रिपोर्ट में दर्ज तथ्यों की पुष्टि के लिए जांच के दौरान आकाश का पुलिस बयान या मृत्यु-पूर्व बयान दर्ज किए जाने का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।

अदालत ने इस पहलू को महत्वपूर्ण माना, क्योंकि मृतक की मां ने कहा था कि अस्पताल में आकाश अच्छी तरह बात कर रहा था। ऐसे में रिपोर्ट की उत्पत्ति और उसमें दर्ज तथ्यों की पुष्टि से जुड़े साक्ष्य का अभाव अभियोजन के मामले के मूल्यांकन में प्रासंगिक था।

छाती की चोट के संबंध में रिकॉर्ड नहीं मिला

हाईकोर्ट ने पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों की गवाहों ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण ब्लंट ट्रॉमा चेस्ट बताया था।

हालांकि, अदालत ने पाया कि अस्पताल में दी गई लिखित रिपोर्ट में आकाश को बाएं पैर में घुटने के नीचे और बाएं हाथ में कोहनी के नीचे चोट लगने का उल्लेख था। छाती की चोट का उल्लेख उसमें नहीं था।

खंडपीठ ने यह भी नोट किया कि जांच के दौरान मृतक की चोटों से संबंधित अलग चोट-रिपोर्ट तैयार नहीं कराई गई थी।

जिस सामान्य चिकित्सालय, बूंदी में आकाश का प्रारंभिक उपचार हुआ था, वहां के रिकॉर्ड भी प्राप्त नहीं किए गए थे और ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक के बयान दर्ज नहीं किए गए थे।

अदालत ने कहा कि अस्पताल के रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हो सकता था कि घटना के समय मृतक की छाती पर कोई चोट थी या नहीं। यह भी महत्वपूर्ण था कि पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों ने जिरह में इस संभावना से इनकार नहीं किया कि बताई गई चोटें मोटरसाइकिल से किसी कठोर और नुकीली सतह पर गिरने से भी आ सकती थीं।

अदालत ने इन कमियों को मेडिकल साक्ष्य और अभियोजन की कहानी के बीच महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा।

कथित हथियारों की बरामदगी पर भी उठे सवाल

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों की निशानदेही पर घटना में इस्तेमाल किए गए हथियार बरामद किए गए थे। लोहे का पाइप, बांस की लकड़ी, धोकड़े की लकड़ी शामिल थी। लेकिन हाईकोर्ट ने बरामदगी की प्रक्रिया से संबंधित कई कमियों को रेखांकित किया।

खंडपीठ ने कहा कि बरामदगी की कार्रवाई के दौरान किसी स्वतंत्र गवाह को शामिल नहीं किया गया था।

रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य भी नहीं था जिससे साबित हो कि बरामदगी के समय स्वतंत्र गवाह मौके पर मौजूद नहीं हो सकते थे।

अदालत ने यह भी नोट किया कि बरामदगी घटना के तीन दिन बाद की गई थी।

संबंधित पुलिसकर्मियों के 10 और 11 अगस्त 2020 को बरामदगी के स्थान पर जाने के संबंध में रोजनामचा रिपोर्ट या वाहन लॉगशीट की प्रतियां रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई थीं।

इसके अतिरिक्त, जब्त किए गए हथियारों पर खून के निशान होने का उल्लेख जब्ती दस्तावेजों में नहीं था और उन्हें फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) जांच के लिए भी नहीं भेजा गया था।

इन परिस्थितियों में अदालत ने बरामदगी से जुड़े साक्ष्यों को अभियोजन की कहानी की निर्णायक पुष्टि के रूप में स्वीकार नहीं किया।

पेन ड्राइव की फुटेज से भी मारपीट की पुष्टि नहीं हुई

मामले में अभियोजन पक्ष ने पेन ड्राइव को सबूत के तौर पर पेश किया था। अदालत ने इस इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की विश्वसनीयता पर भी विचार किया।

बाद में अदालत के कंप्यूटर पर पेन ड्राइव चलाने पर न तो वीडियो फुटेज और न ही ऑडियो चला। उसमें त्रुटि दिखाई दी।

अदालत में उसे चलाने पर यह भी स्पष्ट नहीं हो सका कि फुटेज में किस व्यक्ति के साथ मारपीट हो रही थी और मारपीट करने वाले कौन थे।

खंडपीठ ने इस कारण माना कि पेन ड्राइव में मौजूद बताई गई सामग्री से घटना में आकाश के साथ मारपीट होने और आरोपियों की पहचान की पुष्टि नहीं हो पाई।

इस प्रकार, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी अभियोजन की कहानी को अपेक्षित समर्थन नहीं दे सका।

बरी किए जाने के खिलाफ अपील में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के Babu Sahebagouda Rudragoudar v. State of Karnataka, (2024) 8 SCC 149 के फैसले का हवाला दिया और कहा कि आरोपी को बरी किए जाने के बाद उसकी निर्दोषता की धारणा और मजबूत होती है।

कोर्ट ने कहा कि अपीलीय अदालत मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन कर सकती है।

कोर्ट ने कहा कि अदालत को देखना होता है कि ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संभव दृष्टिकोण था या नहीं।

केवल इसलिए बरी किए जाने का फैसला पलटा नहीं जा सकता कि साक्ष्यों की एक दूसरी व्याख्या भी संभव है।

हाईकोर्ट ने कहा कि हस्तक्षेप तभी उचित है, जब ट्रायल कोर्ट का फैसला स्पष्ट रूप से विकृत हो, महत्वपूर्ण साक्ष्यों को गलत पढ़ा गया हो या नजरअंदाज किया गया हो, अथवा रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों से आरोपियों का दोष सिद्ध होने के अलावा कोई दूसरा उचित निष्कर्ष संभव न हो।

हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की अपील?

खंडपीठ ने उपलब्ध साक्ष्यों, दोनों पक्षों की दलीलों और ट्रायल कोर्ट के फैसले का समग्र मूल्यांकन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि 23 जनवरी 2026 के फैसले में कोई कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं है।

अदालत ने माना कि विचारण न्यायालय ने अभियोजन के साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया था। रिकॉर्ड पर ऐसी स्थिति नहीं थी, जिसमें अपीलीय अदालत को उस फैसले में हस्तक्षेप करना आवश्यक होता।

परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने कस्कांडा की अपील खारिज कर दी और चारों आरोपियों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले की पुष्टि कर दी।

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