जयपुर। छह साल की बच्ची से दुष्कर्म के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए दोषी महेश कुमार शर्मा की अपील खारिज कर दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखते हुए कहा कि यदि यौन अपराध की पीड़िता की गवाही स्वाभाविक, सुसंगत और विश्वसनीय है, तो केवल उसी के बयान के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है।
पीड़िता की गवाही को चिकित्सकीय साक्ष्य, एफएसएल रिपोर्ट और अन्य गवाहों के बयानों से भी समर्थन मिला।
जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस प्रवीर भटनागर की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दुष्कर्म के दोषी की अपील को खारिज कर दिया हैं.
हाईकोर्ट ने माना कि बचाव पक्ष अभियोजन के साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करने या ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार बताने में विफल रहा।
बच्ची की गवाही पर सवाल, लेकिन अदालत में बयान रहा कायम
मामला 27 दिसंबर 2014 का है। अभियोजन के अनुसार, जयपुर के हरमाड़ा थाना क्षेत्र के चक जैतपुरा में छह वर्षीय बच्ची गंभीर हालत में मिली थी।
बच्ची के पिता को सूचना मिलने पर वह मौके पर पहुंचे, जहां बच्ची डरी हुई अवस्था में थी और उसके कपड़ों पर खून के निशान थे।
आरोप था कि एक व्यक्ति बच्ची को बहला-फुसलाकर मोटरसाइकिल पर ले गया और उसके साथ दुष्कर्म करने के बाद उसे वहां छोड़ गया।
मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच की और महेश कुमार शर्मा के खिलाफ आरोप पत्र पेश किया।
ट्रायल कोर्ट ने 21 दिसंबर 2019 को आरोपी को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
अपील में बचाव पक्ष ने पीड़िता के बयान, मेडिकल रिपोर्ट में बाहरी चोटों के उल्लेख, आरोपी की पहचान और स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि को लेकर सवाल उठाए।
अभियोजन पक्ष ने इन आपत्तियों का विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता ने अदालत में आरोपी की पहचान की और उसके बयान की पुष्टि चिकित्सा, वैज्ञानिक तथा परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से होती है।
बच्चे की गवाही को मामूली विसंगति पर खारिज नहीं किया जा सकता
खंडपीठ ने बाल गवाह की गवाही पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले State of Madhya Pradesh v. Balveer Singh (2025 LiveLaw SC 243) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि यदि बच्चा गवाही देने में सक्षम है, तो उसके बयान का मूल्यांकन अन्य गवाहों की तरह किया जा सकता है। हालांकि, यह देखना जरूरी है कि बच्चा किसी के प्रभाव या सिखाए जाने के कारण बयान तो नहीं दे रहा।
अदालत के अनुसार, बाल गवाह की गवाही का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया जाना चाहिए, लेकिन मामूली विसंगति के आधार पर उसे पूरी तरह खारिज करना उचित नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक मामले में ऐसी गवाही की अलग से पुष्टि अनिवार्य नहीं है; परिस्थितियों के अनुसार corroboration यानी अतिरिक्त पुष्टि की जरूरत सावधानी और विवेक का विषय हो सकती है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने जिरह के दौरान भी अपने बयान पर कायम रहते हुए आरोपी की पहचान और घटना के संबंध में स्पष्ट जवाब दिए।
अदालत को ऐसा कोई आधार नहीं मिला जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि बच्ची ने किसी के सिखाने या दुश्मनी के कारण आरोपी को पहचाना था।
“दुष्कर्म पीड़िता की गवाही पर अकेले भी हो सकती है दोषसिद्धि”
फैसले में हाईकोर्ट ने यौन अपराधों से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराया।
अदालत ने कहा कि यदि पीड़िता की गवाही स्वाभाविक, सुसंगत और विश्वसनीय है, तो उसके बयान के आधार पर अकेले भी दोषसिद्धि की जा सकती है।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़िता को अपराध में सहभागी नहीं, बल्कि अपराध से प्रभावित व्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। केवल बाहरी चोटों की अनुपस्थिति, चिकित्सकीय साक्ष्य में किसी कमी या निजी अंगों पर चोट न मिलने से पीड़िता की गवाही अपने आप अविश्वसनीय नहीं हो जाती।
हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले में अभियोजन को आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित करना होता है। संदेह वास्तविक और तर्कसंगत होना चाहिए, केवल काल्पनिक आशंका या अनुमान पर्याप्त नहीं है।
मेडिकल रिपोर्ट और एफएसएल जांच ने मजबूत किया अभियोजन का मामला
हाईकोर्ट ने चिकित्सकों की गवाही पर भी विस्तार से विचार किया। रिकॉर्ड के अनुसार, बच्ची की चिकित्सकीय जांच में योनि में चोट, खून के निशान और ताजा चोट की पुष्टि हुई थी। उपचार के दौरान उसका ऑपरेशन भी किया गया था।
एफएसएल रिपोर्ट में बच्ची के कपड़ों और योनि संबंधी नमूने में मानव वीर्य मिलने का प्रमाण था.
आरोपी के कपड़ों की जांच में भी मानव वीर्य पाया गया। अदालत ने इन वैज्ञानिक साक्ष्यों को अभियोजन के मामले की पुष्टि करने वाला महत्वपूर्ण आधार माना।
खंडपीठ ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट और एफएसएल निष्कर्ष पीड़िता के बयान के अनुरूप हैं और घटना के संबंध में अभियोजन की कहानी को समर्थन देते हैं।
मोटरसाइकिल पर बच्ची के साथ आरोपी को देखने वाले गवाह भी अहम
अभियोजन के गवाह ने अदालत में बताया कि उन्होंने घटना वाले दिन आरोपी को बच्ची के साथ मोटरसाइकिल पर देखा था।
गवाहों के अनुसार, बच्ची की उम्र करीब पांच से छह वर्ष थी। उन्होंने बाद में घटना की जानकारी मिलने और बच्ची को पहचानने के संबंध में भी बयान दिए।
दोनों गवाहों ने पहचान परेड में आरोपी की पहचान की थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि उनकी जिरह में ऐसा कोई महत्वपूर्ण तथ्य सामने नहीं आया, जिससे उनके बयानों की विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा हो।
जांच अधिकारी और संबंधित उपखंड अधिकारी के बयानों से भी जेल में कराई गई पहचान परेड की पुष्टि हुई। अदालत ने माना कि पीड़िता की पहचान को अन्य साक्ष्यों से भी समर्थन मिला।
स्कूल रिकॉर्ड से साबित हुई बच्ची की उम्र
बचाव पक्ष ने स्कूल प्रमाणपत्र में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर भी सवाल उठाए थे।
हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता के माता-पिता और अन्य गवाहों ने उसकी उम्र लगभग छह वर्ष बताई थी। स्कूल रिकॉर्ड में उसकी जन्मतिथि जनवरी 2008 दर्ज थी, जबकि घटना दिसंबर 2014 की थी।
अदालत ने कहा कि उपलब्ध मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों से पीड़िता की उम्र स्पष्ट होती है। इस संबंध में ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
ट्रायल कोर्ट का फैसला सही, अपील खारिज
सभी पक्षों की दलीले सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 363, धारा 366(ए) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(एम)/6 के तहत दोषी ठहराकर सही किया था।
हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी।
ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को धारा 363 के तहत सात वर्ष का कठोर कारावास, धारा 366(ए) के तहत दस वर्ष का कठोर कारावास और पॉक्सो अधिनियम के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। सभी सजाएं साथ-साथ चलाने का आदेश दिया गया था।