जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने श्रीगंगानगर जिले के 26 साल पुराने बहुचर्चित हत्या मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सात दोषियों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या के इस मामले में अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए प्रत्यक्षदर्शी गवाहों, मेडिकल रिपोर्ट, फॉरेंसिक साक्ष्यों और घटनास्थल से जुड़े दस्तावेजी प्रमाणों से यह पूरी तरह साबित हो गया कि आरोपियों ने सामूहिक रूप से मृतक मुक्खराम पर जानलेवा हमला किया था।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के वर्ष 2002 के फैसले को सही ठहराते हुए सभी आरोपियों की अपील खारिज कर दी और उन्हें तुरंत हिरासत में लेने के आदेश दिए।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने यह फैसला लक्ष्मणराम, प्रभूराम सहित धंधरा गांव के 7 याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर अपील पर सुनाया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य आरोपियों के अपराध को संदेह से परे साबित करते हैं और ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया निर्णय विधिसम्मत तथा तथ्यों पर आधारित है।
रास्ते के विवाद ने लिया खूनी रूप
मामले के अनुसार, घटना 2 अक्टूबर 1999 की शाम करीब 6 बजे की है।
गांव धंधरा, थाना रामसिंहपुर, जिला श्रीगंगानगर निवासी मुक्खराम बैलगाड़ी ठीक कराने के लिए गांव के मिस्त्री की दुकान पर गया था।
उसी दौरान पुरानी रंजिश और खेत के रास्ते को लेकर विवाद ने हिंसक रूप ले लिया।
शिकायतकर्ता राजाराम उर्फ रज्जीराम ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि गोविंदराम और रूपाराम जाखड़ के परिवार से रास्ते को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था।
शिकायत के अनुसार, राजाराम पास ही स्थित मालूराम के घर बैठा हुआ था, तभी उसे चीख-पुकार सुनाई दी। जब वह घटनास्थल पर पहुंचा तो उसने देखा कि लक्ष्मणराम, कृष्णलाल, प्रभूराम, हनुमान, लेखराम, देवलाल और राजाराम उर्फ राजीराम मुक्खराम को घेरकर मारपीट कर रहे थे। आरोपियों के पास गंडासी, कसिया और लाठियां थीं।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि आरोपी राजाराम ने मुक्खराम के सिर पर गंडासी से वार किया, जबकि अन्य आरोपियों ने लाठियों और धारदार हथियारों से हमला जारी रखा।
जब राजाराम अपने भाई को बचाने पहुंचा तो उस पर भी हमला किया गया और उसके सिर, कंधे तथा पैरों पर गंभीर चोटें पहुंचाई गईं।
अस्पताल पहुंचने से पहले बिगड़ी हालत, इलाज के दौरान मौत
घटना के बाद गांव वालों की मदद से मुक्खराम और घायल राजाराम को श्रीविजयनगर के सरकारी अस्पताल ले जाया गया।
वहां डॉक्टरों ने मुक्खराम की हालत गंभीर बताई। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार उसके शरीर पर कई गहरी चोटें थीं, जिनमें सिर और सीने की चोटें सबसे गंभीर थीं।
इलाज के दौरान मुक्खराम की मौत हो गई। इसके बाद पुलिस ने राजाराम के बयान के आधार पर हत्या सहित विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज की।
एफआईआर संख्या 175/1999 थाना रामसिंहपुर में आईपीसी की धाराएं 147, 148, 149, 323, 341, 307 और 302 के तहत दर्ज की गई थी। जांच के बाद पुलिस ने आरोप पत्र पेश किया और मामला सत्र न्यायालय को भेजा गया।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद
मामले की सुनवाई अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक), अनूपगढ़ ने की थी।
वर्ष 2002 में ट्रायल कोर्ट ने सभी सात आरोपियों को विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
आरोपियों को आईपीसी की धारा 302/149 के तहत आजीवन कारावास दिया गया था।
साथ ही धारा 147, 148, 324, 326 और 323 के तहत अलग-अलग सजाएं भी सुनाई गई थीं।
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ सभी दोषियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अपील लंबित रहने के दौरान उन्हें जमानत मिल गई थी। अब हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज करते हुए जमानत निरस्त कर दी है।
बचाव पक्ष ने उठाए कई सवाल
अपील की सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि घटना गांव के बीच हुई थी, लेकिन पुलिस ने किसी स्वतंत्र गवाह को पेश नहीं किया।
मिस्त्री की दुकान पर घटना होने के बावजूद दुकान मालिक को गवाह नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष के अधिकांश गवाह मृतक के रिश्तेदार हैं, इसलिए उनकी गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि कुछ गवाहों के बयानों में विरोधाभास हैं और जांच अधिकारी ने निष्पक्ष जांच नहीं की।
आरोपी पक्ष का कहना था कि कृष्णलाल और देवलाल के नाम प्रारंभिक बयान में नहीं थे और बाद में उन्हें झूठा फंसाया गया।
आरोपियों के वकीलों ने यह भी कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों पर गंभीर घाव नहीं थे और मामला हत्या का नहीं बल्कि अधिक से अधिक गैर इरादतन हत्या या गंभीर चोट पहुंचाने का बनता है।
बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि यह अचानक हुआ झगड़ा था और आरोपियों ने आत्मरक्षा में हमला किया।
राज्य सरकार का विरोध
राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने बचाव पक्ष की दलीलों का कड़ा विरोध किया और ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह सही बताया।
अभियोजन पक्ष ने कहा कि निचली अदालत ने मौखिक, दस्तावेजी, मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्यों का सही मूल्यांकन करते हुए आरोपियों को दोषी ठहराया है और फैसले में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है।
राज्य की ओर से कहा गया कि इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण गवाह स्वयं घायल शिकायतकर्ता राजाराम है, जिसकी मौजूदगी घटनास्थल पर निर्विवाद है।
उसने शुरू से ही सातों आरोपियों के नाम लिए और अदालत में भी लगातार एक जैसी कहानी बताई। अभियोजन ने कहा कि घायल गवाह की गवाही कानून में विशेष महत्व रखती है।
अभियोजन पक्ष ने कहा कि राजाराम की गवाही को अन्य प्रत्यक्षदर्शी गवाहों—आदूराम, आसाराम, कृष्णा, गीता देवी और मालूराम—ने भी समर्थन दिया।
सभी गवाहों ने बताया कि आरोपी धारदार हथियारों और लाठियों से लैस थे तथा उन्होंने मिलकर मुक्खराम और राजाराम पर हमला किया।
राज्य सरकार की ओर से मेडिकल साक्ष्यों को सबसे मजबूत आधार बताया गया।
डॉक्टर देवीलाल भाखर ने अदालत में स्पष्ट कहा कि मृतक के सीने पर लगी चोटों से उसके फेफड़े फट गए थे और यही मौत का कारण बना।
अभियोजन ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही की पूरी तरह पुष्टि करती है।
प्रतिवादी पक्ष ने यह भी कहा कि एफएसएल रिपोर्ट में मृतक और घायल के कपड़ों तथा घटनास्थल से उठाए गए नमूनों पर मानव रक्त पाया गया, जिससे घटना की पुष्टि होती है। केवल हथियारों पर रक्त नहीं मिलने से पूरा मामला कमजोर नहीं हो जाता।
राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि आरोपीगण एक गैरकानूनी जमावड़े का हिस्सा थे और सभी ने साझा उद्देश्य से हमला किया।
मृतक के सिर और सीने जैसे संवेदनशील अंगों पर वार यह साबित करते हैं कि हमला जानलेवा था। इसलिए धारा 302/149 आईपीसी पूरी तरह लागू होती है।
अभियोजन ने बचाव पक्ष के आत्मरक्षा के तर्क को भी खारिज किया।
राज्य सरकार ने कहा कि किसी भी आरोपी के शरीर पर चोट नहीं पाई गई, जबकि मृतक और घायल दोनों गंभीर रूप से जख्मी हुए थे।
राज्य सरकार ने अदालत से कहा कि जांच में यदि कोई छोटी तकनीकी त्रुटि रही भी हो तो उसका लाभ आरोपियों को नहीं दिया जा सकता, क्योंकि प्रत्यक्षदर्शी, मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्य मिलकर अपराध को पूरी तरह सिद्ध करते हैं।
अभियोजन पक्ष ने अंत में मांग की कि ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा जाए और अपील खारिज की जाए।
हाईकोर्ट ने कहा-घायल गवाह की गवाही सबसे मजबूत
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि घायल गवाह की गवाही को कानून में विशेष महत्व दिया जाता है क्योंकि उसकी घटनास्थल पर मौजूदगी पर संदेह नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता राजाराम स्वयं घायल था और उसकी गवाही विश्वसनीय एवं सुसंगत है।
कोर्ट ने पाया कि राजाराम ने शुरू से ही सातों आरोपियों के नाम लिए थे और उनके हथियारों का भी स्पष्ट उल्लेख किया था। उसकी गवाही अन्य प्रत्यक्षदर्शी गवाहों और मेडिकल रिपोर्ट से पूरी तरह मेल खाती है।
अदालत ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि गवाह मृतक के रिश्तेदार हैं, उनकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। यदि उनकी गवाही विश्वसनीय और परिस्थितियों से मेल खाती हो तो उस पर भरोसा किया जा सकता है।
मेडिकल रिपोर्ट बनी सबसे बड़ा आधार
फैसले में हाईकोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों को बेहद महत्वपूर्ण माना। डॉक्टर देवीलाल भाखर ने अदालत में बताया कि मुक्खराम के शरीर पर कई गंभीर चोटें थीं। उसके सिर पर धारदार हथियार से गहरे घाव थे, जबकि सीने पर लगी चोटों से फेफड़े फट गए थे। डॉक्टर ने स्पष्ट कहा कि सीने की चोटें सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त थीं।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी यह स्पष्ट हुआ कि मृत्यु का कारण फेफड़ों में गंभीर चोट और अत्यधिक रक्तस्राव था। अदालत ने कहा कि मेडिकल साक्ष्य प्रत्यक्षदर्शियों के बयान की पूरी तरह पुष्टि करते हैं।
फॉरेंसिक रिपोर्ट से भी मिला समर्थन
हाईकोर्ट ने फॉरेंसिक रिपोर्ट का भी उल्लेख किया। जांच के दौरान मृतक और घायल के खून से सने कपड़े जब्त किए गए थे। घटनास्थल से रक्तरंजित मिट्टी भी उठाई गई थी। एफएसएल रिपोर्ट में मानव रक्त की पुष्टि हुई, जिससे अभियोजन पक्ष की कहानी मजबूत हुई।
हालांकि बचाव पक्ष ने यह तर्क दिया था कि जब्त हथियारों पर खून नहीं मिला, लेकिन अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की विश्वसनीय गवाही को नकारा नहीं जा सकता। कोर्ट ने कहा कि रिकवरी साक्ष्य केवल सहायक प्रकृति के होते हैं।
‘सामूहिक हमला था, अचानक झगड़ा नहीं’
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह मामला अचानक हुए झगड़े का नहीं बल्कि सुनियोजित सामूहिक हमले का है। अदालत ने कहा कि आरोपी घातक हथियारों से लैस होकर आए थे और उन्होंने मिलकर मृतक व घायल पर हमला किया। सीने और सिर जैसे संवेदनशील हिस्सों पर किए गए वार यह साबित करते हैं कि हमला गंभीर इरादे से किया गया था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आरोपी आत्मरक्षा में हमला करते तो उनके शरीर पर भी चोटें होतीं, जबकि रिकॉर्ड में किसी आरोपी के घायल होने का प्रमाण नहीं है। इससे बचाव पक्ष का निजी प्रतिरक्षा का दावा कमजोर पड़ जाता है।
जांच में त्रुटियों का आरोपियों को नहीं मिलेगा लाभ
फैसले में अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी की किसी त्रुटि या लापरवाही का लाभ आरोपियों को नहीं दिया जा सकता, यदि प्रत्यक्षदर्शी गवाहों और अन्य साक्ष्यों से अपराध सिद्ध हो रहा हो। अदालत ने माना कि कुछ पुलिस बयानों में नाम छूट जाने जैसी कमियां थीं, लेकिन प्रारंभिक रिपोर्ट और अदालत में दिए गए बयानों में सातों आरोपियों की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आई।
अपील खारिज, सभी आरोपी फिर जाएंगे जेल
अंत में हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषियों को दी गई सजा पूरी तरह न्यायसंगत है और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट ने सातों आरोपियों की अपील खारिज कर दी और कहा कि चूंकि वे जमानत पर बाहर हैं, इसलिए उन्हें तुरंत हिरासत में लिया जाए।
करीब 26 साल पुराने इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले को क्षेत्र में बड़ी कानूनी कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है।
अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट संदेश दिया कि सामूहिक हिंसा और जानलेवा हमलों के मामलों में प्रत्यक्षदर्शी, मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्य यदि एक-दूसरे की पुष्टि करते हों तो केवल तकनीकी कमियों के आधार पर दोषियों को राहत नहीं दी जा सकती।