राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस अशोक कुमार जैन ने नेपाल में न्यायपालिका में तकनीक और AI के इस्तेमाल पर रखे विचार, बोले-तकनीक अदालतों की मदद करे, लेकिन न्यायिक सोच और संवैधानिक मूल्यों से समझौता नहीं होना चाहिए
जयपुर/विराटनगर। राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अशोक कुमार जैन ने कहा कि अदालतों में AI और नई तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इससे न्यायिक काम आसान और तेज हो सकता है, लेकिन AI किसी जज की जगह नहीं ले सकती। अंतिम फैसला कानून, तथ्यों और परिस्थितियों को देखकर इंसान को ही करना होगा।
नेपाल के मनमोहन तकनीकी विश्वविद्यालय, विराटनगर के विधि एवं प्रौद्योगिकी विद्यालय की ओर से आयोजित विशेष व्याख्यान में आनलाईन जुड़े जस्टिस अशोक कुमार जैन ने “भारतीय उच्च न्यायालयों में AI और तकनीक : उभरते रुझान और चुनौतियां” विषय पर विस्तार से बात की।
उन्होंने कहा कि तकनीक का उद्देश्य न्याय व्यवस्था को बेहतर बनाना होना चाहिए। तकनीक के कारण न्याय के मूल सिद्धांतों में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए।
कंप्यूटर से शुरू हुआ सफर अब AI तक पहुंचा
जस्टिस जैन ने कहा कि भारतीय अदालतों में तकनीक का इस्तेमाल आज से शुरू नहीं हुआ है।
पहले अदालतों के रिकॉर्ड को कंप्यूटर में लाने का काम शुरू हुआ। इसके बाद डिजिटल वाद सूची, ऑनलाइन मुकदमे दाखिल करने की सुविधा, इलेक्ट्रॉनिक मामलों का प्रबंधन, वीडियो के जरिए सुनवाई और आभासी अदालतों जैसी व्यवस्थाएं शुरू हुईं।
अब न्यायपालिका तकनीक के एक नए दौर में पहुंच गई है, जहां AI भी न्यायिक व्यवस्था में मदद कर रही है।
उन्होंने बताया कि ई-कोर्ट परियोजना का तीसरा चरण 2023 से 2027 तक चल रहा है और इसके लिए करीब 7,210 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
इसमें पुराने रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने, ऑनलाइन मुकदमे दाखिल करने, ऑनलाइन भुगतान, ई-सेवा केंद्रों के विस्तार और नई तकनीकों के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है।

660 करोड़ से ज्यादा पन्ने डिजिटल किए जा चुके
जस्टिस जैन ने कहा कि जनवरी 2026 तक देश की अदालतों के 660 करोड़ से ज्यादा पन्नों के अदालती रिकॉर्ड डिजिटल किए जा चुके थे।
इसी अवधि तक 3.97 करोड़ से ज्यादा सुनवाई वीडियो के जरिए हुईं और करीब 1.07 करोड़ मामले ऑनलाइन दाखिल किए जा चुके थे।
वर्चुअल अदालतों के जरिए 10 करोड़ से ज्यादा यातायात चालानों का भी निपटारा किया जा चुका था।
उन्होंने कहा कि ये आंकड़े बताते हैं कि तकनीक ने आम लोगों और अदालतों के बीच संपर्क का तरीका बदलना शुरू कर दिया है।
ई-कोर्ट का मतलब सिर्फ कागज को कंप्यूटर में डालना नहीं
जस्टिस जैन ने कहा कि ई-कोर्ट का मतलब केवल कागज की जगह कंप्यूटर का इस्तेमाल करना नहीं है।
ऑनलाइन मुकदमे दाखिल करने से लोगों को अदालत में जाकर दस्तावेज जमा करने की जरूरत कम होती है।
ऑनलाइन भुगतान से काम आसान होता है। डिजिटल रिकॉर्ड से पुराने दस्तावेज जल्दी खोजे जा सकते हैं।
वीडियो के जरिए सुनवाई होने से दूर रहने वाले लोगों को भी सुविधा मिलती है।
वहीं ई-सेवा केंद्र उन लोगों की मदद कर सकते हैं जिन्हें डिजिटल तकनीक का ज्यादा ज्ञान नहीं है।
“अदालत कोई उत्पादन इकाई नहीं है”
अदालतों में आंकड़ों के इस्तेमाल पर जस्टिस जैन ने कहा कि आंकड़े प्रशासन के लिए काफी उपयोगी हैं। इनके जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि कौन से मामले ज्यादा लंबित हैं और किन मामलों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।
लेकिन उन्होंने साफ कहा कि अदालत को किसी उत्पादन इकाई की तरह नहीं देखा जा सकता और न्याय को केवल कितने मामलों का निपटारा हुआ, इस आंकड़े से नहीं मापा जा सकता।
उनके अनुसार आंकड़े प्रशासन की मदद कर सकते हैं, लेकिन किसी मामले की जटिलता और फैसले की गुणवत्ता को आंकड़ों से तय नहीं किया जा सकता।
AI कई काम आसान कर सकती है
जस्टिस जैन ने कहा कि AI का इस्तेमाल कई कामों में किया जा सकता है।
यह कानूनी जानकारी खोजने, पुराने फैसले ढूंढने, भाषा बदलने, अदालत की कार्यवाही को लिखित रूप देने, बड़ी संख्या में दस्तावेजों को व्यवस्थित करने, दस्तावेजों को अलग-अलग श्रेणियों में रखने और बड़ी सामग्री का सार तैयार करने में मदद कर सकती है।
इससे जजों और न्यायिक अधिकारियों का समय बच सकता है और वे महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर ज्यादा ध्यान दे सकते हैं।
AI मददगार है, लेकिन जज नहीं
जस्टिस जैन ने कहा कि AI किसी जज को किसी पुराने फैसले को खोजने में मदद कर सकती है, लेकिन यह तय नहीं कर सकती कि उस फैसले का मौजूदा मामले में क्या असर होगा।
यह दो मामलों में समानता बता सकती है, लेकिन दोनों मामलों के बीच कानूनी रूप से महत्वपूर्ण अंतर क्या हैं, यह फैसला जज को ही करना होगा।
इसी तरह AI किसी बड़े रिकॉर्ड का सार बना सकती है, लेकिन उस रिकॉर्ड के आधार पर क्या निष्कर्ष निकाला जाए, यह जिम्मेदारी जज की ही होगी।
उन्होंने कहा कि फैसला केवल जानकारी पढ़ने और मिलाने का काम नहीं है। इसमें कानून की समझ, तर्क, सबूतों का मूल्यांकन, पुराने फैसलों को देखना, संविधान के मूल्यों को ध्यान में रखना और न्यायिक विवेक शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट की पहल का भी किया उल्लेख
जस्टिस जैन ने न्यायपालिका में AI के इस्तेमाल के उदाहरण के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक दक्षता सहायता पहल का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि ऐसी तकनीक का उद्देश्य जजों को बड़ी मात्रा में कानूनी सामग्री समझने और व्यवस्थित करने में मदद करना है। इसका उद्देश्य जज की सोच को खत्म करना नहीं है।
उन्होंने कहा कि तकनीक जज की मदद करे, जज की जगह न ले।
AI गलत जानकारी भी दे सकती है
जस्टिस जैन ने AI से जुड़ी एक बड़ी समस्या की ओर भी ध्यान दिलाया।
उन्होंने कहा कि AI कई बार ऐसा जवाब दे सकती है जो देखने और पढ़ने में पूरी तरह सही लगे, लेकिन उसमें तथ्य या कानून से जुड़ी गलती हो सकती है।
कानून के क्षेत्र में ऐसी गलती गंभीर नुकसान कर सकती है। गलत फैसले का संदर्भ, गलत उद्धरण या ऐसा फैसला जो वास्तव में मौजूद ही नहीं है, अदालत को गुमराह कर सकता है।
इसलिए AI से मिली जानकारी को बिना जांचे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि सही फैसला, कानून का मूल पाठ और अदालत का आधिकारिक रिकॉर्ड ही अंतिम आधार होना चाहिए।
AI में पक्षपात हुआ तो न्याय प्रभावित हो सकता है
जस्टिस जैन ने कहा कि AI जिस जानकारी से सीखती है, उसमें अगर पहले से किसी तरह का पक्षपात है तो वह पक्षपात आगे भी दोहराया जा सकता है।
न्याय व्यवस्था में यह और गंभीर विषय है, क्योंकि हर व्यक्ति के मामले को उसके तथ्यों और लागू कानून के आधार पर अलग-अलग देखना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि अदालतों में इस्तेमाल होने वाली AI में निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उपाय होने चाहिए।
अदालतों के डिजिटल रिकॉर्ड की गोपनीयता भी जरूरी
जस्टिस जैन ने कहा कि अदालतों के रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने के साथ निजता और गोपनीयता की सुरक्षा भी जरूरी है।
अदालतों के रिकॉर्ड में बच्चों, स्वास्थ्य, वैवाहिक विवाद, यौन अपराध, वित्तीय मामलों और व्यापार से जुड़ी गोपनीय जानकारी हो सकती है।
इसलिए तकनीक के कारण ऐसी जानकारी आसानी से गलत लोगों तक नहीं पहुंचनी चाहिए। रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए मजबूत व्यवस्था जरूरी है।
साइबर सुरक्षा न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ी
जस्टिस जैन ने कहा कि अदालतों के डिजिटल होने के साथ साइबर सुरक्षा का महत्व भी बढ़ गया है।
डिजिटल रिकॉर्ड को चोरी, छेड़छाड़, नुकसान और गलत तरीके से सार्वजनिक होने से बचाना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि साइबर सुरक्षा केवल कंप्यूटर विभाग का विषय नहीं है। यह न्याय व्यवस्था और उसमें जनता के विश्वास से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।
तकनीक के कारण गरीब और ग्रामीण नागरिक पीछे न छूटें
जस्टिस जैन ने डिजिटल असमानता पर भी चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि भारत में बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके पास अच्छा इंटरनेट, डिजिटल जानकारी या जरूरी तकनीकी साधन नहीं हैं।
ऐसे लोगों को केवल इसलिए न्याय से नुकसान नहीं होना चाहिए क्योंकि वे तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि तकनीक का उद्देश्य लोगों को अदालत के करीब लाना होना चाहिए, उनसे दूरी बढ़ाना नहीं।
इसी कारण ई-सेवा केंद्र जैसी व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण हैं।
AI के दौर में वकीलों की जिम्मेदारी बढ़ेगी
जस्टिस जैन ने कहा कि आने वाले समय में वकीलों के लिए कानून की जानकारी के साथ तकनीक को समझना भी जरूरी होगा।
लेकिन अगर कोई वकील AI का इस्तेमाल करके कानूनी जानकारी जुटाता है तो अदालत में दी गई जानकारी सही है या नहीं, इसकी जिम्मेदारी वकील की ही होगी।
उन्होंने कहा कि अदालत के प्रति ईमानदारी, सही जानकारी देना, मेहनत करना और जिम्मेदारी निभाना जैसे सिद्धांत AI के दौर में भी नहीं बदलेंगे।
भविष्य की अदालत में तकनीक होगी, लेकिन फैसला जज ही करेगा
भविष्य की अदालतों के बारे में जस्टिस जैन ने कहा कि आने वाले समय में मुकदमे ऑनलाइन दाखिल होंगे, रिकॉर्ड पूरी तरह डिजिटल हो सकते हैं, पुराने फैसले आसानी से खोजे जा सकेंगे, अदालत की कार्यवाही तुरंत लिखित रूप में उपलब्ध हो सकती है और अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद की सुविधा भी मिल सकती है।
लेकिन इसके बावजूद चार बातें हमेशा बनी रहेंगी—
जज को सुनना होगा।
जज को समझना होगा।
जज को तर्क करना होगा।
और जज को फैसला करना होगा।
उन्होंने कहा कि न्यायिक फैसला किसी मशीन से निकला हुआ ऐसा परिणाम नहीं होना चाहिए जिसे समझाया न जा सके। फैसला हमेशा जज के विचार और तर्क पर आधारित होना चाहिए।
तकनीक न्याय में मदद करे, न्याय की जिम्मेदारी न संभाले
अपने व्याख्यान के अंत में जस्टिस अशोक कुमार जैन ने कहा कि AI न्याय व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती है, लेकिन इसका इस्तेमाल सोच-समझकर और जरूरी सुरक्षा के साथ होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि न्यायिक रिकॉर्ड को डिजिटल बनाया जाए, लेकिन लोगों की निजता सुरक्षित रहे। तकनीक का इस्तेमाल किया जाए, लेकिन उसमें किसी तरह का पक्षपात न हो। ऑनलाइन न्याय की सुविधा बढ़ाई जाए, लेकिन जिन लोगों के पास तकनीकी साधन नहीं हैं, उन्हें न्याय से बाहर न किया जाए।
उन्होंने कहा कि मशीन हजारों फैसले खोज सकती है, लाखों दस्तावेज पढ़ सकती है और बड़ी मात्रा में जानकारी का विश्लेषण कर सकती है, लेकिन कानून, तथ्य और परिस्थितियों को समझकर न्याय करने का काम इंसान को ही करना होगा।