नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जमानत कानून को लेकर बड़ा और स्पष्ट फैसला दिया है।
अदालत ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 480(3) के तहत लगाई जाने वाली सख्त शर्तें हर गैर-जमानती मामले में लागू नहीं होंगी। खासतौर पर उन मामलों में, जहां अधिकतम सजा 7 साल तक है।
कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामलों में शर्तें थोपना अनिवार्य नहीं है, बल्कि यह अदालत के विवेक पर निर्भर करेगा।
एक मामले से उठा बड़ा कानूनी सवाल
मामला एक ऐसे आरोपी से जुड़ा था, जिसे कम गंभीर अपराध में जमानत मिली थी। अपराध की अधिकतम सजा 7 साल तक थी।
इसके बावजूद निचली अदालत ने उस पर कड़ी शर्तें लगा दीं। ये शर्तें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), की धारा 480(3) के तहत लगाई गई थीं।
आरोपी ने इन शर्तों को चुनौती दी। उसका कहना था कि कम सजा वाले मामलों में इतनी सख्ती गैर-जरूरी है। इससे उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। यही विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
दोनों पक्षों की दलील
अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि जमानत का उद्देश्य स्वतंत्रता देना है। इसे सजा जैसा नहीं बनाया जा सकता। हर मामले में एक जैसी सख्त शर्तें लगाना गलत है। खासकर तब, जब अपराध गंभीर श्रेणी में नहीं आता।
वहीं, दूसरे पक्ष की ओर से तर्क दिया गया कि सख्त शर्तें जरूरी हैं। इससे आरोपी जांच में सहयोग करता है। गवाहों को प्रभावित करने का खतरा कम होता है। और न्याय प्रक्रिया सुरक्षित रहती है।
सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश
सुनवाई के बाद अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा, “कानून को यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं।”
अदालत ने यह भी कहा कि “एक समान शर्तें हर केस में थोपना न्यायसंगत नहीं है।” कोर्ट के अनुसार, जमानत की शर्तें संतुलित और तर्कसंगत होनी चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 480(3) का उद्देश्य केवल गंभीर मामलों में सख्ती सुनिश्चित करना है। इसे हर मामले में लागू करना कानून की भावना के खिलाफ होगा।
निचली अदालतों को दिया संदेश
कोर्ट ने निचली अदालतों को अहम संदेश दिया। कहा कि वे हर मामले को अलग-अलग देखें। अपराध की प्रकृति, आरोपी का व्यवहार और जांच पर प्रभाव, इन सबको ध्यान में रखें।
अदालत ने दो टूक कहा कि “वन-साइज-फिट्स-ऑल” अप्रोच न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। यानी हर केस में एक जैसा नियम लागू नहीं किया जा सकता।
अब ट्रायल कोर्ट्स को अधिक स्वतंत्रता मिलेगी। वे परिस्थितियों के अनुसार शर्तें तय कर सकेंगी।
मौलिक अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का जोर
अदालत ने इस फैसले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सबसे अहम बताया है। कोर्ट ने कहा कि जमानत को सजा की तरह नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह एक अधिकार है जो आरोपी को तब तक मिलता है जब तक उसका अपराध साबित नहीं हो जाता।
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि बिना ठोस कारण के सख्त शर्तें लगाना उचित नहीं है। इससे आरोपी के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच और स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी है।
7 साल तक की सजा वाले मामलों में जमानत शर्तें परिस्थितियों के अनुसार तय होंगी, न कि हर मामले में एक समान तरीके से लागू की जाएंगी।
इस फैसले का असर केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव पूरे न्याय तंत्र पर पड़ेगा। छोटे और मध्यम अपराधों में जमानत आसान होने से अनावश्यक हिरासत कम होगी और जेलों में भीड़भाड़ की समस्या को भी कम करने में मदद मिलेगी।
