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जजों पर अनुशासनात्मक एक्शन के नियम तय, रजिस्ट्रार जनरल अपने आप नहीं कर सकते कार्रवाई: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

Supreme Court Draws Red Line On Registrar General’s Powers In Judicial Discipline Case
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई केवल चीफ जस्टिस या उनके अधिकृत जजों की समिति की मंजूरी से ही शुरू हो सकती है। रजिस्ट्रार जनरल स्वत: कार्रवाई नहीं कर सकते।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी Judicial Officer के खिलाफ departmental inquiry या disciplinary proceedings केवल हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस या उनके द्वारा गठित जजों की समिति की मंजूरी से ही शुरू की जा सकती है।

शीर्ष अदालत ने साफ किया कि हाईकोर्ट का रजिस्ट्रार जनरल अपने स्तर पर suo motu यानी स्वतः संज्ञान लेकर किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई शुरू नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा करना संविधान के Article 235 के तहत निर्धारित न्यायिक नियंत्रण व्यवस्था के खिलाफ होगा।

अदालत ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई तभी वैध मानी जाएगी जब उसे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा गठित जजों की कमेटी की मंजूरी प्राप्त हो।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने यह फैसला देते हुए उत्तराखंड की एक सिविल जज की बहाली को बरकरार रखा, जिन्हें विभागीय जांच के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।

किस मामले में आया फैसला?

मामला उत्तराखंड की एक सिविल जज दीपाली शर्मा से जुड़ा था। उन पर आरोप था कि उन्होंने अपने घर में घरेलू सहायक के रूप में काम कर रही एक नाबालिग लड़की के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार किया।

आरोपों के बाद उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई और बाद में उन्हें सेवा से हटा दिया गया।

हालांकि बाद में High Court of Uttarakhand ने उन्हें बहाल कर दिया। इसके खिलाफ हाईकोर्ट ने ही प्रशासनिक पक्ष से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की ओर से कहा गया कि विभागीय जांच में गंभीर कदाचार साबित हुआ था और पीड़ित बच्ची के शरीर पर 20 से ज्यादा चोटों के निशान पाए गए थे।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह आरोपों की सच्चाई या सजा की गंभीरता पर नहीं बल्कि इस मूल सवाल पर फैसला दे रहा है कि जांच कानूनी तरीके से शुरू हुई थी या नहीं।

”Registrar General को स्वतंत्र अधिकार नहीं”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि Judicial Officers पर अनुशासनात्मक नियंत्रण संविधान के Article 235 के तहत “High Court collectively” में निहित होता है। यानी यह शक्ति केवल Chief Justice और अन्य जजों के सामूहिक अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है।

अदालत ने साफ कहा कि:

  • रजिस्ट्रार जनरल के पास स्वतंत्र रूप से कार्रवाई शुरू करने का अधिकार नहीं है।
  • वह केवल मुख्य न्यायाधीश और जजों की ओर से कार्य कर सकता है।
  • बिना वैध मंजूरी के शुरू की गई कार्रवाई शुरुआत से ही अवैध मानी जाएगी।

कोर्ट के मुताबिक, यदि मुख्य न्यायाधीश या उनकी ओर से अधिकृत कमेटी की अनुमति नहीं ली गई, तो ऐसी पूरी कार्रवाई “void ab initio” यानी शुरुआत से ही शून्य मानी जाएगी।

क्यों रद्द हुई पूरी विभागीय कार्रवाई?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में विभागीय जांच की पूरी प्रक्रिया “jurisdictional infirmity” यानी अधिकार क्षेत्र से जुड़ी मूल कानूनी खामी से ग्रस्त थी।

अदालत ने कहा कि यदि किसी कार्रवाई की शुरुआत ही कानून के अनुरूप नहीं हुई हो, तो बाद की पूरी प्रक्रिया स्वतः प्रभावित हो जाती है।

कोर्ट ने कहा कि “कार्रवाई की नींव ही कानून में अस्तित्वहीन थी।”

कोर्ट ने माना कि एक बार यह स्पष्ट हो गया कि inquiry वैध तरीके से शुरू नहीं हुई, उसके बाद आरोपों के तथ्यों या सजा की अनुपातिकता पर विस्तार से जाने की जरूरत नहीं रह जाती।

आरोप गंभीर, लेकिन कानून से ऊपर नहीं प्रक्रिया

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना कि न्यायिक अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोप बेहद गंभीर थे। अदालत ने यह भी नोट किया कि विभागीय जांच में बच्ची के साथ कथित दुर्व्यवहार की बात सामने आई थी।

इसके बावजूद कोर्ट ने कहा कि किसी भी disciplinary proceeding को कानून के मुताबिक शुरू करना अनिवार्य है। गंभीर आरोप होने मात्र से प्रक्रिया संबंधी संवैधानिक सुरक्षा खत्म नहीं हो जाती।

अदालत ने साफ कहा कि न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई में भी constitutional safeguards का पालन जरूरी है।

जज की बहाली पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि संबंधित न्यायिक अधिकारी को पहले ही हाईकोर्ट के आदेश के बाद बहाल किया जा चुका है।

अदालत ने यह भी नोट किया कि अधिकारी की ओर से यह दावा किया गया था कि विवाद शुरू होने के बाद से उन्हें कुछ वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों द्वारा परेशान किया गया।

इन व्यापक परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनकी बहाली के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया।

Judicial Independence पर बड़ा फैसला

यह फैसला judicial independence और internal disciplinary control के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 235 की विस्तृत व्याख्या की।

कोर्ट के मुताबिक:

  • न्यायिक अधिकारियों पर नियंत्रण “हाई कोर्ट” के पास है, न कि किसी एक अधिकारी के पास।
  • यह नियंत्रण सामूहिक रूप से exercised होता है।
  • प्रशासनिक प्रक्रिया में भी संवैधानिक ढांचे का पालन अनिवार्य है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका के भीतर अनुशासनात्मक कार्रवाई भी एक तय संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही हो सकती है। यह फैसला भविष्य में Judicial Officers के खिलाफ departmental proceedings शुरू करने की प्रक्रिया को प्रभावित करेगा।

हाईकोर्ट प्रशासन के लिए भी अहम संदेश

यह निर्णय हाईकोर्ट प्रशासनिक ढांचे के लिए भी बड़ा संदेश माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि Registrar General जैसे प्रशासनिक पद संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही कार्य कर सकते हैं।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि judicial control का अधिकार संस्थागत रूप से Chief Justice और judges collectively में निहित है, न कि किसी एक प्रशासनिक अधिकारी में।

यह निर्णय कई कारणों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस फैसले से न्यायपालिका के अंदर अनुशासनात्मक कार्रवाई के नियम स्पष्ट हुए, संवैधानिक प्रावधानों की सही व्याख्या सामने आई और प्रशासनिक मनमानी पर रोक लगाने का संदेश दिया गया है।

यह फैसला भविष्य में उन सभी मामलों में महत्वपूर्ण संदर्भ बनेगा, जहां न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठते हैं। यह फैसला न्यायपालिका के भीतर प्रशासनिक शक्तियों और संवैधानिक नियंत्रण के दायरे को और स्पष्ट करेगा।

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