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राजनीतिक दबाव में नहीं दी जा सकती अभियोजन की मंजूरी: राजस्थान सरकार को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, याचिका खारिज, 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया

Supreme Court Seeks Response on Plea Alleging Medical Data Leak of 1.5 Lakh People

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी डॉक्टर के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में पहले अभियोजन की मंजूरी देने से इनकार करने और बाद में बिना किसी नए सबूत के वही फैसला बदलने पर राजस्थान सरकार को कड़ी फटकार लगाई है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी राजनीतिक दबाव या बाहरी प्रभाव में नहीं दी जा सकती।

भ्रष्टाचार निवारण कानून की धारा 19 के तहत यह प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष होनी चाहिए।

अगर सक्षम अधिकारी सभी रिकॉर्ड और सबूतों की जांच के बाद अभियोजन की मंजूरी देने से इनकार कर चुका है, तो बिना किसी नए और ठोस सबूत के उस फैसले को बदला नहीं जा सकता।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि इस मामले में पहले अभियोजन की मंजूरी देने से इनकार किया गया था। बाद में बिना किसी नए तथ्य या सबूत के वही फैसला बदल दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह फैसला बदलना कानून के मुताबिक नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन की मंजूरी का फैसला केवल रिकॉर्ड और उपलब्ध सबूतों के आधार पर होना चाहिए, न कि राजनीतिक दबाव या किसी बाहरी प्रभाव में।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।

साथ ही राज्य सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया और यह राशि राजस्थान हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में जमा कराने का निर्देश दिया।

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2017 का रिश्वत मामला

यह मामला वर्ष 2017 में एक सरकारी डॉक्टर के खिलाफ लगाए गए रिश्वत लेने के आरोप से जुड़ा है।

शिकायत के बाद भ्रष्टाचार के मामले में मुकदमा चलाने की मंजूरी देने का सवाल राज्य सरकार के सामने आया।

राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग ने मामले से जुड़े सभी रिकॉर्ड और सबूतों की जांच की। जांच में विभाग ने पाया कि ट्रैप की कार्रवाई पर कई सवाल हैं और डॉक्टर द्वारा रिश्वत मांगने का कोई स्पष्ट सबूत भी नहीं मिला।

इसी आधार पर विभाग ने डॉक्टर के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देने से इनकार कर दिया।

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कैसे बदला सरकार का फैसला?

इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय के स्तर से मामले की फिर से समीक्षा करने का निर्देश दिया गया।

हालांकि, दोबारा विचार के दौरान कोई नया सबूत या तथ्य सामने नहीं आया। इसके बावजूद पहले का फैसला बदलते हुए डॉक्टर के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी दे दी गई।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस आदेश को कानून के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया।

इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण कानून की धारा 19 के तहत अभियोजन की मंजूरी देना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है।

इसका मकसद ईमानदार सरकारी कर्मचारियों को बिना पर्याप्त आधार के आपराधिक मुकदमों से बचाना भी है। इसलिए मंजूरी देने या न देने का फैसला केवल रिकॉर्ड, सबूत और कानून के आधार पर होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर सक्षम अधिकारी सभी रिकॉर्ड, सबूत और जांच रिपोर्ट की समीक्षा करने के बाद अभियोजन की मंजूरी देने से इनकार कर चुका है, तो बाद में उसी सामग्री के आधार पर फैसला नहीं बदला जा सकता।

ऐसा तभी किया जा सकता है, जब जांच के दौरान कोई नया, महत्वपूर्ण और ठोस सबूत सामने आए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई नया तथ्य या साक्ष्य सामने नहीं आया था। इसके बावजूद पहले का फैसला बदलकर अभियोजन की मंजूरी दे दी गई, जो कानून के मुताबिक सही नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इससे यह सवाल उठता है कि फैसला स्वतंत्र रूप से लिया गया या उस पर बाहरी प्रभाव पड़ा।

राजनीतिक दबाव पर कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में फैसला स्वतंत्र तरीके से लिया गया, ऐसा नहीं लगता। अभियोजन की मंजूरी की प्रक्रिया पर राजनीतिक दबाव या किसी भी बाहरी प्रभाव की कोई जगह नहीं हो सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग का उदाहरण है। बिना किसी नए और ठोस सबूत के पहले के फैसले को बदलना यह दिखाता है कि अभियोजन की मंजूरी की प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रही।

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में अंग्रेजी साहित्यकार विलियम शेक्सपीयर के प्रसिद्ध संवाद “हो या न हो” का जिक्र भी किया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन की मंजूरी की प्रक्रिया ऐसी असमंजस की स्थिति में नहीं हो सकती, जहां बिना किसी नए और ठोस आधार के बार-बार फैसला बदला जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर पहले सभी रिकॉर्ड और सबूतों की जांच के बाद अभियोजन की मंजूरी से इनकार किया गया था, तो बाद में उसी सामग्री के आधार पर मंजूरी देना यह दिखाता है कि फैसला स्वतंत्र तरीके से नहीं लिया गया।

इस मामले में राजनीतिक निर्देश का असर साफ दिखाई देता है और इससे निष्पक्ष निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जब हाई कोर्ट पहले ही ऐसे आदेश को अवैध ठहरा चुका था, तब राज्य सरकार को वहीं रुक जाना चाहिए था, न कि उसे आगे बढ़ाना चाहिए।

राज्य सरकार पर लगाया जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब राजस्थान हाईकोर्ट अभियोजन की मंजूरी को पहले ही गैरकानूनी करार दे चुका था, तब राज्य सरकार को उस फैसले का सम्मान करना चाहिए था।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामले में बिना ठोस कानूनी आधार के सुप्रीम कोर्ट में अपील करना उचित नहीं था।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।

साथ ही राज्य सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह राशि राजस्थान हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की विधिक सेवा समितियों में बराबर-बराबर जमा कराई जाए।

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