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क्या रात में भी खुले रहेंगे कोर्ट? 24×7 आपात सुनवाई की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

Supreme Court Rejects Plea for 24×7 Court System, Says Existing Emergency Mechanism Is Adequate

नई दिल्ली: क्या देर रात, छुट्टी या रविवार को भी सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट हर समय खुले रहेंगे? इस मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने चौबीसों घंटे आपात सुनवाई के लिए अलग व्यवस्था बनाने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज करते हुए कहा कि फिलहाल ऐसी व्यवस्था की जरूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभी ऐसी नई व्यवस्था की जरूरत नहीं है, क्योंकि ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई और अति जरूरी मामलों की तत्काल लिस्टिंग जैसी सुविधाएं पहले से मौजूद हैं।

इनकी मदद से किसी भी समय जरूरी मामला कोर्ट तक पहुंचाया जा सकता है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने कहा कि संविधान के तहत लोगों को न्याय तक पहुंच मिलनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोर्ट हर समय नियमित रूप से बैठे।

मौजूदा व्यवस्था जरूरत और संस्थागत संतुलन, दोनों का ध्यान रखती है।

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याचिका में क्या मांग की गई थी?

यह जनहित याचिका अधिवक्ता महेरविश रीन ने दायर की थी। उनका कहना था कि भारत की संवैधानिक अदालतें तय कामकाजी समय में ही काम करती हैं।

ऐसे में अगर देर रात, छुट्टी या शनिवार-रविवार को किसी व्यक्ति के जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मामला सामने आए, तो तुरंत न्याय मिलना मुश्किल हो जाता है।

याचिका में मांग की गई थी कि सभी हाईकोर्ट में स्थायी आपात संवैधानिक पीठ बनाई जाए। साथ ही ऐसी डिजिटल व्यवस्था तैयार की जाए, जिससे चौबीसों घंटे तुरंत सुनवाई हो सके।

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चौबीस घंटे सुनवाई की मांग

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि कई बार किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों पर खतरा सामान्य कोर्ट समय के बाद पैदा होता है।

उदाहरण के तौर पर, देर रात किसी को अवैध रूप से हिरासत में ले लिया जाए, बिना कानूनी प्रक्रिया के मकान पर बुलडोजर चलाने की कार्रवाई शुरू हो जाए या किसी व्यक्ति को देश से बाहर भेजने की प्रक्रिया शुरू हो जाए।

ऐसे मामलों में कुछ घंटों की देरी भी व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा असर डाल सकती है।

याचिकाकर्ता का कहना था कि ऐसे समय अगर कोर्ट की नियमित कार्यवाही बंद हो, तो पीड़ित व्यक्ति को तुरंत न्याय नहीं मिल पाता।

इसलिए सभी संवैधानिक अदालतों में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जहां जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों की चौबीसों घंटे तुरंत सुनवाई हो सके।

याचिका में कहा गया कि संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इसलिए न्याय तक पहुंच भी सिर्फ कोर्ट के तय समय तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। देर रात, छुट्टी या सप्ताहांत में भी लोगों को तत्काल राहत मिलने की व्यवस्था होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में तुरंत न्याय मिलना बेहद जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिका में उठाई गई चिंता वाजिब है और संविधान के तहत मिलने वाले अधिकार सिर्फ कोर्ट के तय समय तक सीमित नहीं हो सकते।

हालांकि कोर्ट ने कहा कि मौजूदा डिजिटल और प्रशासनिक व्यवस्था इस जरूरत को काफी हद तक पूरा करती है।

अब ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई और अति जरूरी मामलों की तत्काल लिस्टिंग जैसी सुविधाओं के कारण सिर्फ कोर्ट का सामान्य समय खत्म होने से कोई व्यक्ति न्याय से वंचित नहीं रहता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब भी किसी मामले में तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत होती है, कोर्ट सामान्य कामकाज के समय से अलग भी सुनवाई करता रहा है।

इसलिए मौजूदा व्यवस्था को देखते हुए चौबीसों घंटे सुनवाई के लिए अलग संस्थागत तंत्र बनाने की जरूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने गिनाईं मौजूदा व्यवस्थाएं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिलहाल तीन ऐसी व्यवस्थाएं पहले से लागू हैं, जिनकी मदद से आपात मामलों में तुरंत कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।

  • पहली– ई-फाइलिंग पोर्टल चौबीसों घंटे उपलब्ध है। कोई भी व्यक्ति किसी भी समय ऑनलाइन याचिका दाखिल कर सकता है।
  • दूसरी– वर्चुअल सुनवाई की सुविधा है। इसके कारण जरूरी मामलों में हर बार कोर्ट में शारीरिक रूप से मौजूद होना जरूरी नहीं है।
  • तीसरी– अति जरूरी मामलों की तत्काल लिस्टिंग की व्यवस्था पहले से मौजूद है। इसके लिए मेंशनिंग प्रोफार्मा और लेटर ऑफ अर्जेंसी के जरिए मामला तुरंत चीफ जस्टिस के समक्ष रखा जा सकता है।

‘न्याय समय का मोहताज नहीं’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह चिंता वाजिब है कि किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार सिर्फ इसलिए प्रभावित नहीं होने चाहिए कि मामला सामान्य कोर्ट समय के बाद सामने आया है।

हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामान्य समय और आपात स्थिति में न्याय तक पहुंच की प्रक्रिया अलग हो सकती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को न्याय से वंचित किया जा रहा है। मौजूदा व्यवस्था लोगों को तुरंत राहत देने और न्यायिक व्यवस्था के संतुलन, दोनों का ध्यान रखती है।

अलग व्यवस्था की जरूरत नहीं

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका का निस्तारण कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिलहाल चौबीसों घंटे सुनवाई के लिए अलग संवैधानिक पीठ बनाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मौजूदा डिजिटल और प्रशासनिक तंत्र आपात मामलों में न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी हाईकोर्ट में इन व्यवस्थाओं के काम करने में व्यावहारिक दिक्कत आती है, तो उससे जुड़ी शिकायत या सुझाव संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल या चीफ जस्टिस के सामने रखा जा सकता है।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि आपात मामलों में तत्काल सुनवाई के लिए जरूरी व्यवस्थाएं पहले से मौजूद हैं। जरूरत पड़ने पर कोर्ट सामान्य कामकाज के समय से अलग भी बैठकर सुनवाई कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि देर रात, शनिवार-रविवार या सरकारी छुट्टियों के दौरान भी जरूरत पड़ने पर बेहद जरूरी मामलों की सुनवाई की जा सकती है।

इसलिए फिलहाल चौबीसों घंटे सुनवाई के लिए अलग संस्थागत तंत्र बनाने का कोई निर्देश देने की जरूरी नहीं है।

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