नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों और अनुकंपा नियुक्ति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल शादी हो जाने के आधार पर किसी बेटी को परिवार की परिभाषा से बाहर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने साफ कहा कि वैवाहिक स्थिति किसी महिला को सरकारी कल्याणकारी योजना से वंचित करने का संवैधानिक आधार नहीं हो सकती।
जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया जिनमें कहा गया था कि शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति या पारिवारिक लाभ का अधिकार नहीं मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा बेटे पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाता, इसलिए केवल बेटी के मामले में यह शर्त लगाना संविधान के समानता सिद्धांत के खिलाफ है।
अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के उन फैसलों से सहमति जताई जिनमें कहा गया था कि शादी किसी महिला के अधिकार खत्म करने का आधार नहीं हो सकती।
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क्या था पूरा मामला ?
यह मामला उत्तर प्रदेश की रहने वाली कुलसुम निशा से जुड़ा था।
कुलसुम निशा की मां राशन की दुकान चलाती थीं। मां की मृत्यु के बाद कुलसुम निशा ने अनुकंपा आधार पर उचित मूल्य की दुकान का लाइसेंस अपने नाम करने के लिए आवेदन किया।
लेकिन अधिकारियों ने उनका आवेदन यह कहकर खारिज कर दिया कि वह शादीशुदा हैं और वर्ष 2019 के सरकारी आदेश के अनुसार “परिवार” की परिभाषा में केवल अविवाहित बेटी को शामिल किया गया है।
कुलसुम निशा ने इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने कहा कि शादी के बाद भी वह अपने परिवार के साथ ही रह रही थीं, मां की दुकान चलाने में मदद करती थीं और अपनी दिव्यांग बहन की देखभाल भी करती थीं। इसके बावजूद केवल शादीशुदा होने के आधार पर उन्हें अधिकार से वंचित कर दिया गया।
हाईकोर्ट में क्यों बना विवाद ?
मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने पहले से मौजूद अलग-अलग फैसलों का मुद्दा आया।
एक तरफ वर्ष 2015 में “विमल श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य” मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा था कि शादीशुदा बेटी को परिवार की परिभाषा से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है।
उस फैसले में अदालत ने “अविवाहित बेटी” शब्द को असंवैधानिक मानते हुए हटाया था। लेकिन बाद में “कुसुमलता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य” और “साइदा बेगम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य” मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अलग राय अपनाई। इन फैसलों में कहा गया कि सरकारी आदेश में “अविवाहित बेटी” शब्द का इस्तेमाल भेदभावपूर्ण नहीं माना जा सकता।
इसी विरोधाभास के कारण इलाहाबाद हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने मामला सुप्रीम कोर्ट को भेज दिया।
दूसरे हाईकोर्टों ने क्या कहा था ?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देश के अलग-अलग हाईकोर्टों के फैसलों का भी अध्ययन किया।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने “रंजना मुरलीधर अनेराव बनाम महाराष्ट्र राज्य” मामले में कहा था कि शादीशुदा बेटी को परिवार की परिभाषा से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19(1)(g) का उल्लंघन है।
गुजरात हाईकोर्ट ने भी इसी तरह का दृष्टिकोण अपनाया था।
इन फैसलों में अदालतों ने माना था कि शादी के बाद भी बेटी अपने माता-पिता से जुड़ी रहती है। परिवार की जिम्मेदारियां निभा सकती है। तो सिर्फ वैवाहिक स्थिति के आधार पर उसे अलग नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि “साइदा बेगम” वाला इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला सही कानून नहीं बताता।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि कुलसुम निशा शादी के बाद भी उसी गांव में रह रही थीं और अपनी मां की दुकान चलाने में सक्रिय रूप से मदद कर रही थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मां की मृत्यु के बाद उन्होंने अपनी बहनों, खासकर दिव्यांग बहन की जिम्मेदारी उठाई। अदालत ने माना कि ऐसे मामले में केवल शादीशुदा होने के आधार पर आवेदन खारिज करना संवैधानिक रूप से गलत है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:
- शादी किसी महिला की पारिवारिक जिम्मेदारियां खत्म नहीं करती।
- बेटी शादी के बाद भी माता-पिता की देखभाल कर सकती है।
- सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में उसे केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर बाहर नहीं किया जा सकता।
“शादीशुदा बेटी को अलग मानना समानता के खिलाफ“
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि शादीशुदा बेटे को परिवार का हिस्सा माना जाता है, तो शादीशुदा बेटी को बाहर करना स्पष्ट भेदभाव है।
कोर्ट ने कहा कि संविधान महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देता है। ऐसे में केवल बेटी के लिए अलग शर्त लगाना समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की व्याख्या संकीर्ण तरीके से नहीं की जानी चाहिए। यदि कोई महिला वास्तव में परिवार की जिम्मेदारी निभा रही है, तो केवल उसकी शादी को आधार बनाकर उसे लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
अधिकारियों को 4 सप्ताह में लाइसेंस देने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने कुलसुम निशा का आवेदन खारिज करने वाले आदेश रद्द कर दिए।
सुप्रीम कोर्ट ने न केवल हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द किया, बल्कि प्रशासन द्वारा याचिकाकर्ता के आवेदन को खारिज करने के आदेश को भी निरस्त कर दिया। साथ ही कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को फेयर प्राइस शॉप का वैध लाइसेंस जारी करें।
यह आदेश स्पष्ट करता है कि अब ऐसे मामलों में प्रशासन मनमानी नहीं कर सकता और उसे संवैधानिक सिद्धांतों का पालन करना ही होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वैवाहिक स्थिति को अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता।
महिलाओं के अधिकारों के लिहाज से अहम फैसला
यह फैसला केवल राशन दुकान लाइसेंस या अनुकंपा नियुक्ति तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के जरिए बड़ा संवैधानिक सिद्धांत स्पष्ट किया है कि:
- शादी के बाद महिला की पहचान खत्म नहीं होती।
- बेटी का अपने परिवार से संबंध समाप्त नहीं माना जा सकता।
- सरकारी योजनाओं में वैवाहिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।
यह फैसला भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति, पारिवारिक पेंशन, सरकारी लाभ और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में भी प्रभाव डाल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से यह संकेत दिया है कि प्रशासनिक नियमों की व्याख्या संविधान के मूल सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि महिलाओं को केवल शादी के आधार पर अलग श्रेणी में नहीं रखा जा सकता और सरकारी नीतियों को लैंगिक समानता के अनुरूप बनाना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से साफ संकेत दिया है कि महिला के अधिकारों की व्याख्या अब पारंपरिक सोच के आधार पर नहीं बल्कि संवैधानिक समानता के आधार पर की जाएगी। यह फैसला उन हजारों महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है जो शादी के बाद भी अपने माता-पिता और परिवार की जिम्मेदारियां निभाती हैं, लेकिन सरकारी नियमों में उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिलता।