नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने खनन उद्योग और खनिज कारोबार से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि खनिजों पर रॉयल्टी का भुगतान उस दर से किया जाएगा जो खनिज की वास्तविक निकासी या परिवहन की तारीख पर लागू हो।
यदि सरकार बाद में रॉयल्टी दर बढ़ा देती है, तो पहले किए गए अनुबंध या नीलामी के आधार पर पुरानी दर का लाभ नहीं लिया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यदि सरकार रॉयल्टी की दर बढ़ाती है, तो उसका असर उन सभी मामलों पर पड़ेगा जहां खनिज की निकासी बाद में होती है-भले ही कॉन्ट्रैक्ट पहले की दर पर हुआ हो।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि खनिजों पर रॉयल्टी देयता का संबंध खनिज की वास्तविक निकासी से है, न कि अनुबंध होने या भुगतान किए जाने की तारीख से।
इसलिए यदि खनिज की निकासी रॉयल्टी बढ़ने के बाद हुई है, तो नई दर से भुगतान करना होगा।
अदालत ने कहा कि कोई भी निजी अनुबंध संसद द्वारा बनाए गए कानून के प्रावधानों को सीमित नहीं कर सकता। यदि कानून के तहत रॉयल्टी बढ़ाई जाती है तो उसका प्रभाव सभी लंबित मामलों पर पड़ेगा, चाहे संबंधित अनुबंध पहले का ही क्यों न हो।
बेल्लारी खनन संकट से शुरू हुआ विवाद
मामला कर्नाटक के बेल्लारी क्षेत्र में खनन गतिविधियों से जुड़ा था। जो देश के प्रमुख लौह अयस्क (iron ore) उत्पादन क्षेत्रों में से एक रहा है।
कुछ वर्षों पहले अवैध खनन के आरोपों के चलते सुप्रीम कोर्ट ने इस क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर रोक लगा दी थी।
इसके बाद खनिजों के प्रबंधन और बिक्री के लिए कोर्ट के निर्देश पर एक मॉनिटरिंग कमेटी का गठन किया गया।
यह कमेटी ई-ऑक्शन के माध्यम से खनिजों की बिक्री करती थी, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
इसी प्रक्रिया के तहत जून 2014 में M/s BMM Ispat Ltd. नामक कंपनी ने एक नीलामी में भाग लिया और आयरन ओर का एक बड़ा स्टॉक खरीदने में सफल रही।
उस समय माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1957 (MMDR Act) के तहत आयरन ओर पर रॉयल्टी की दर 10% निर्धारित थी।
कंपनी ने नीलामी की शर्तों के अनुसार भुगतान किया, जिसमें 10% रॉयल्टी भी शामिल थी। उस समय तक सब कुछ सामान्य था।
समस्या कब और कैसे उत्पन्न हुई?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब कंपनी खरीदे गए पूरे खनिज को एक बार में नहीं निकाल सकी। खदान से खनिज को चरणबद्ध तरीके से हटाया जा रहा था।
इसी बीच, 1 सितंबर 2014 को केंद्र सरकार ने MMDR Act की दूसरी अनुसूची में संशोधन करते हुए आयरन ओर पर रॉयल्टी 10% से बढ़ाकर 15% कर दी।
अब स्थिति जटिल हो गई। जो खनिज पहले ही निकाला जा चुका था, उस पर पुरानी दर लागू थी।
लेकिन जो खनिज अभी भी स्टॉकयार्ड में पड़ा था और बाद में निकाला गया, उस पर नई दर लागू होने का सवाल खड़ा हुआ।
राज्य सरकार ने यह रुख अपनाया कि जो खनिज 1 सितंबर 2014 के बाद निकाला गया, उस पर 15% रॉयल्टी देनी होगी।
इसी आधार पर सरकार ने कंपनी से अतिरिक्त रॉयल्टी की मांग की और करीब 2 करोड़ रुपये से अधिक की राशि उसकी सिक्योरिटी डिपॉजिट से समायोजित कर ली।
कंपनी का पक्ष
कंपनी ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए कहा कि उसने नीलामी के समय जो शर्तें स्वीकार की थीं, उसी के अनुसार उसका दायित्व तय हो गया था।
कंपनी का मुख्य तर्क यह था कि नीलामी जून 2014 में हुई थी, उस समय रॉयल्टी 10% थी और उसने उसी दर से भुगतान भी कर दिया था इसलिए बाद में रॉयल्टी बढ़ने का असर उस पर नहीं डाला जा सकता।
कंपनी का कहना था कि एक बार जब कॉन्ट्रैक्ट पूरा हो गया और भुगतान हो गया, तो बाद में कानून में हुए बदलाव के आधार पर अतिरिक्त मांग करना अनुचित और गैरकानूनी है।
हाईकोर्ट का फैसला और राज्य सरकार की अपील
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कंपनी के तर्क को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार की कार्रवाई को गलत ठहराया।
अदालत ने कहा कि अतिरिक्त रॉयल्टी की वसूली उचित नहीं है और कंपनी को उसकी राशि वापस मिलनी चाहिए।
इस फैसले से असहमत होकर राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
असली विवाद क्या था?
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि रॉयल्टी की दर तय करने के लिए कौन-सी तारीख महत्वपूर्ण मानी जाएगी।
क्या वह तारीख जब नीलामी हुई, अनुबंध बना, भुगतान किया गया या फिर वह तारीख जब वास्तव में खनिज को खदान क्षेत्र से बाहर ले जाया गया?
कंपनी का कहना था कि जब उसने बोली लगाई और भुगतान किया, तब रॉयल्टी 10 प्रतिशत थी। इसलिए बाद में बढ़ी हुई दर लागू नहीं की जा सकती।
वहीं राज्य सरकार का तर्क था कि खनिज की निकासी बाद में हुई है। इसलिए उस समय लागू कानूनी दर के अनुसार रॉयल्टी वसूलना पूरी तरह वैध है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण: कानून की भाषा ही अंतिम
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 9 का विस्तार से विश्लेषण किया। कोर्ट ने कहा कि कानून स्पष्ट रूप से बताता है कि रॉयल्टी का भुगतान खनिजों की निकासी या उपभोग से जुड़ा हुआ है।
यानी रॉयल्टी देयता उस समय उत्पन्न होती है जब खनिज वास्तव में खदान क्षेत्र से बाहर निकाला जाता है या उसका उपयोग किया जाता है।
कोर्ट ने कहा कि यदि रॉयल्टी की दर बढ़ने से पहले खनिज की निकासी हो जाती, तो पुरानी दर लागू होती। लेकिन जहां निकासी बाद में हुई है, वहां नई दर ही लागू होगी।
कोर्ट ने माना कि रॉयल्टी का संबंध खनिज की वास्तविक आवाजाही से है, न कि अनुबंध के समय से।
यह भी पढ़ें: विभागीय सजा के आधार पर पुरानी पदोन्नति नहीं रोकी जा सकती: राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों को दी बड़ी राहत
“पुराना अनुबंध कानून को नहीं रोक सकता“
फैसले की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी निजी अनुबंध कानून द्वारा निर्धारित दायित्वों को सीमित नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि संसद या सरकार कानून के तहत रॉयल्टी दर बढ़ाती है, तो उसका प्रभाव उन सभी मामलों पर पड़ेगा जहां खनिज की निकासी बाद में हो रही है।
कोर्ट ने कहा कि अनुबंध उस समय की परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है, लेकिन यदि बाद में कानून बदलता है तो अनुबंध को उसी अनुसार पढ़ा जाएगा।
जस्टिस संजय करोल ने फैसले में कहा कि यदि खनिज की आवाजाही रॉयल्टी बढ़ने के बाद हुई है, तो पुराने अनुबंध का हवाला देकर नई दर से बचा नहीं जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैधानिक दायित्व हमेशा अनुबंधीय शर्तों पर प्राथमिकता रखते हैं।
कंपनी की देरी बनी उसके खिलाफ
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि कंपनी के पास अवसर था कि वह संशोधन लागू होने से पहले पूरा लौह अयस्क उठा लेती।
कोर्ट ने कहा कि कंपनी ने खनिज की निकासी चरणबद्ध तरीके से की या फिर पूरा माल बाद में हटाया। ऐसी स्थिति में बढ़ी हुई रॉयल्टी से बचने का लाभ उसे नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यदि कंपनी वास्तव में पुरानी दर का लाभ लेना चाहती थी, तो उसे रॉयल्टी संशोधन लागू होने से पहले खनिज की निकासी पूरी कर लेनी चाहिए थी। अदालत ने माना कि विलंब का परिणाम कंपनी को ही भुगतना होगा।
राज्य सरकार की कार्रवाई को मिली वैधता
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा जमा राशि से अतिरिक्त रॉयल्टी काटना पूरी तरह वैध था।
कोर्ट ने कहा कि जब कानून के अनुसार अतिरिक्त 5 प्रतिशत रॉयल्टी देय थी, तब सरकार उस राशि की वसूली कर सकती थी। कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार ने जो राशि समायोजित की, वह वैधानिक अधिकार के तहत की गई कार्रवाई थी।
इसलिए कर्नाटक हाईकोर्ट का वह आदेश सही नहीं था जिसमें कंपनी को राहत दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और राज्य सरकार की अपील स्वीकार कर ली।
खनन कंपनियों और उद्योग जगत के लिए महत्वपूर्ण फैसला
यह फैसला देशभर की खनन कंपनियों, लौह अयस्क कारोबारियों और खनिज क्षेत्र में काम करने वाले उद्योगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अदालत ने साफ कर दिया है कि:
- रॉयल्टी दर का निर्धारण खनिज की निकासी की तारीख से होगा।
- पुरानी नीलामी या अनुबंध का हवाला देकर नई रॉयल्टी से नहीं बचा जा सकता।
- वैधानिक संशोधन अनुबंधीय शर्तों पर प्रभावी रहेंगे।
- खनिज की निकासी में देरी का जोखिम कारोबारी को स्वयं उठाना होगा।
यह फैसला भविष्य में खनिज रॉयल्टी, खनन पट्टों और सरकारी देयताओं से जुड़े अनेक विवादों में मार्गदर्शक सिद्ध होगा।
कॉन्ट्रैक्ट के आगे कानून सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय के जरिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया है कि जहां किसी क्षेत्र को कानून द्वारा नियंत्रित किया जाता है, वहां निजी अनुबंध कानून से ऊपर नहीं हो सकते।
फैसला यह स्पष्ट करता है कि खनन क्षेत्र में रॉयल्टी केवल व्यावसायिक भुगतान नहीं बल्कि वैधानिक देयता है। इसलिए इसकी गणना कानून में निर्धारित व्यवस्था के अनुसार ही होगी।
यह निर्णय न केवल खनन उद्योग बल्कि उन सभी क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है जहां सरकारी शुल्क, कर या रॉयल्टी समय-समय पर संशोधित किए जाते हैं। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि कानून बदलने के बाद पुराने अनुबंधों का सहारा लेकर वैधानिक दायित्वों से बचा नहीं जा सकता।
खनिजों पर रॉयल्टी जैसी देनदारियां केवल आर्थिक लेन-देन नहीं हैं, बल्कि वे एक वैधानिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, जिसका पालन करना सभी के लिए अनिवार्य है।