नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस थानों में महिला वकीलों की सुरक्षा को लेकर दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों और Bar Council of India (BCI) से जवाब मांगा है।
याचिका में कहा गया है कि पेशेगत जिम्मेदारियों के कारण महिला वकीलों को अक्सर पुलिस थानों में जाना पड़ता है, लेकिन वहां उनकी सुरक्षा के लिए कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा या एक समान सुरक्षा व्यवस्था मौजूद नहीं है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया।
याचिका में दावा किया गया है कि हाल के वर्षों में महिला वकीलों के साथ पुलिस थानों में डराने, प्रताड़ित करने और यौन दुर्व्यवहार तक के आरोप सामने आए हैं। ऐसे मामलों से महिला वकीलों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।
पुलिस थानों में महिला वकीलों की सुरक्षा पर चिंता
याचिका में कहा गया है कि महिला वकीलों को अपने क्लाइंट्स के मामलों में नियमित रूप से पुलिस थानों में जाना पड़ता है। लेकिन इन स्थानों पर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, इस कमी के कारण महिला अधिवक्ताओं को कई बार पुलिसकर्मियों द्वारा डराने-धमकाने, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को गंभीर मानते हुए केंद्र और राज्यों से इस पर जवाब मांगा है।
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हाल की घटनाओं का हवाला
याचिका में नोएडा और कर्नाटक की कुछ हालिया घटनाओं का जिक्र किया गया है, जिनमें महिला वकीलों के साथ कथित तौर पर मारपीट, डराने और यौन उत्पीड़न जैसे आरोप सामने आए थे।
याचिका में कहा गया है कि ये घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि यह एक “सिस्टमिक फेल्योर” को दर्शाती हैं, जहां राज्य के नियंत्रण वाले स्थानों पर भी महिला पेशेवरों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पा रही।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि ऐसी असुरक्षित परिस्थितियों का सीधा असर महिला वकीलों के पेशे पर पड़ता है।
कई महिला अधिवक्ता खासकर देर रात या संवेदनशील मामलों में पुलिस थानों जाने से बचने लगी हैं, जिससे उनके पेशेवर दायित्व प्रभावित होते हैं।
याचिका में कहा गया है कि यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत पेशा करने की स्वतंत्रता का उल्लंघन है। साथ ही यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का भी उल्लंघन करती है।
महिला वकीलों की सुरक्षा के लिए क्या मांगें उठीं ?
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से महिला वकीलों की सुरक्षा के लिए कई व्यापक सुरक्षा उपाय लागू करने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि पुलिस थानों में महिला वकीलों के लिए एक समान Standard Operating Procedure (SOP) बनाई जानी चाहिए।
याचिका में मांग की गई कि:
- देर रात महिला वकीलों से बातचीत के दौरान महिला पुलिसकर्मियों की मौजूदगी अनिवार्य हो।
- पुलिस थानों में ऑडियो रिकॉर्डिंग वाले CCTV कैमरे लगाए जाएं।
- डिजिटल एंट्री और निगरानी व्यवस्था लागू की जाए।
- स्वतंत्र शिकायत निवारण तंत्र बनाया जाए।
- वकीलों की सुरक्षा के लिए नोडल ऑफिसर नियुक्त किए जाएं।
इसके अलावा पुलिसकर्मियों के लिए gender sensitisation programmes यानी महिला संवेदनशीलता प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने और शिकायत करने वाली महिला वकीलों को प्रताड़ना से बचाने की भी मांग की गई है।
विशाखा केस का हवाला, कानूनी कमी का मुद्दा
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के “विशाखा बनाम राजस्थान राज्य” फैसले का भी जिक्र किया गया है।
उस मामले में कोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जब तक कि इस पर कानून नहीं बन गया।
याचिकाकर्ता का कहना है कि वर्तमान मामले में भी ऐसा ही ”लीगल वैक्यूम” है, जिसे भरने के लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए।
कोर्ट की कार्यवाही और अगला कदम
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में नोटिस जारी कर सभी पक्षों से जवाब मांगा है। महिला वकीलों की सुरक्षा के मुद्दे पर केंद्र, राज्यों और BCI से जवाब तलब किया है।
कोर्ट के सामने यह सवाल है कि पुलिस थानों जैसे स्थानों पर महिला अधिवक्ताओं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। अब सभी पक्षों के जवाब के बाद इस मामले में आगे की दिशा तय की जाएगी।
अब केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को यह बताना होगा कि महिला वकीलों की सुरक्षा के लिए मौजूदा व्यवस्था क्या है और इसमें सुधार के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
इस मामले की अगली सुनवाई में कोर्ट इन जवाबों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करेगा।