नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वसीयत विवादों से जुड़े मामलों पर बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि सिर्फ वसीयत पर दस्तखत या अंगूठे का निशान और गवाह पेश कर देने भर से वसीयत सही नहीं मानी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने वसीयत से जुड़े एक अहम फैसले में साफ कहा है कि अगर वसीयत को लेकर कोई ऐसा मामला सामने आता है जिससे संदेह पैदा होता हो, तो वसीयत का सहारा लेने वाले व्यक्ति को कोर्ट के सामने हर शक दूर करना होगा।
उसे यह भी साबित करना होगा कि वसीयत बनाने वाले ने उसे अपनी पूरी समझ और अपनी मर्जी से बनाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसीयत को सही मानने से पहले कोर्ट को यह भरोसा होना जरूरी है कि दस्तावेज वास्तव में उसी व्यक्ति की इच्छा से बने हैं, न कि किसी दबाव, धोखे या संदेह वाली स्थिति में।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि :
किसी वसीयत को सही मानने से पहले यह भरोसा होना चाहिए कि उसे बनाने वाले ने अपनी मर्जी और पूरी समझ के साथ बनाया था। अगर ऐसा नहीं लगता या वसीयत को लेकर कोई शक पैदा होता है, तो पहले उस शक को दूर करना जरूरी है।
इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट व प्रथम अपीलीय कोर्ट का फैसला फिर से लागू कर दिया।
यह फैसला जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने सुनाया। मामला वर्ष 1974 की एक रजिस्टर्ड वसीयत से जुड़ा था, जिसके आधार पर पूरी संपत्ति कुछ लोगों के नाम कर दी गई थी। कोर्ट ने पाया कि वसीयत को लेकर कई ऐसे संदेह थे, जिन्हें दूर नहीं किया गया।
पूरा मामला क्या था?
यह विवाद छज्जू राम नाम के व्यक्ति की संपत्ति से जुड़ा था। पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब भांबो देवी, जो छज्जू राम की पत्नी थीं, ने कोर्ट में दावा किया कि उनके पति की मृत्यु बिना वसीयत के हुई थी। भांबो देवी ने कोर्ट में दावा किया कि उनके पति ने कोई वसीयत नहीं बनाई थी। इसलिए कानून के अनुसार वह उनकी पहली श्रेणी की कानूनी वारिस हैं और पूरी संपत्ति पर उनका अधिकार है।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने वर्ष 1974 की एक रजिस्टर्ड वसीयत पेश की। उनका कहना था कि छज्जू राम ने अपनी चल और अचल दोनों तरह की संपत्ति उनके नाम इसलिए कर दी थी क्योंकि उन्होंने उनकी देखभाल की थी। भांबो देवी ने इस वसीयत को फर्जी बताया और कहा कि यह धोखाधड़ी और दबाव में बनाई गई है।
ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय कोर्ट ने इस वसीयत को सही नहीं माना था और वसीयत को संदेहास्पद मानते हुए खारिज कर दिया। लेकिन बाद में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने यह कहते हुए फैसला पलट दिया कि जब गवाह ने वसीयत की पुष्टि कर दी है और दस्तावेज रजिस्टर्ड भी है, तो उसे खारिज नहीं किया जा सकता। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा ?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने सिर्फ इस बात पर भरोसा किया कि वसीयत का गवाह पेश हुआ और वसीयत रजिस्टर्ड थी। लेकिन कानून केवल इतना नहीं कहता।
कोर्ट ने साफ किया कि वसीयत साबित करने का मतलब सिर्फ दस्तखत या अंगूठे का निशान और गवाह साबित करना नहीं है। अगर वसीयत को लेकर कोई संदेह पैदा होता है, तो उसे दूर करना भी उतना ही जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि :
अगर वसीयत को लेकर कोई संदेह है, तो वसीयत पेश करने वाले को उसका साफ जवाब देना होगा। जब तक ऐसा नहीं होगा, कोर्ट वसीयत को सही नहीं मानेगी।
इस केस में क्या-क्या संदेह पाए गए ?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कई ऐसी बातें बताईं, जिनसे वसीयत पर संदेह पैदा हुआ।
वसीयत पर संदेह की तीन बड़ी वजहें:-
- पत्नी को पूरी तरह संपत्ति से बाहर रखा गया, जबकि वह मृतक की पहली श्रेणी की कानूनी वारिस थीं। दूसरी ओर, पूरी संपत्ति ऐसे लोगों के नाम कर दी गई, जो करीबी रिश्तेदार भी साबित नहीं हो सके।
- जिन लोगों के पक्ष में वसीयत बनाई गई, उन्हें मृतक का भतीजा बताया गया, लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह रिश्ता साबित हो सके।
- रजिस्टर्ड वसीयत के पीछे कई जगह नाम काटकर दूसरा नाम लिखा गया था, लेकिन इन बदलावों पर सब-रजिस्ट्रार के दस्तखत या पुष्टि नहीं थी। इससे भी वसीयत पर संदेह पैदा हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब इतने अहम सवाल मौजूद हों, तो सिर्फ गवाह का बयान वसीयत को सही साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
‘संदेहजनक परिस्थितियां’ क्या होती हैं? कोर्ट ने समझाया
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘सस्पिशियस सर्कम्स्टेंसेस’ (संदेहजनक परिस्थितियां) का दायरा बहुत बड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि वसीयत पर संदेह पैदा करने वाली वजहें कई तरह की हो सकती हैं।
कोर्ट के मुताबिक, ये परिस्थितियां हो सकती हैं:
- वसीयत पर किए गए दस्तखत या अंगूठे के निशान पर संदेह होना।
- वसीयत बनाते समय व्यक्ति की मानसिक या शारीरिक स्थिति ठीक न होना।
- संपत्ति का ऐसा बंटवारा, जो सामान्य या उचित न लगे।
- कानूनी वारिसों को बिना किसी ठोस वजह के संपत्ति से बाहर कर देना।
- जिसे वसीयत से फायदा होना है, उसका वसीयत बनवाने में ज्यादा दखल होना।
हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि संदेह वास्तविक होना चाहिए, न कि केवल कल्पना।
सिर्फ गवाह से क्यों नहीं बनेगी बात?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसीयत साबित करने की प्रक्रिया सिर्फ एक औपचारिकता नहीं है। कोर्ट को यह भी देखना होता है कि वसीयत बनाने वाले ने दस्तावेज को समझकर और अपनी इच्छा से उस पर दस्तखत या अंगूठा लगाया था या नहीं।
अगर किसी मामले में यह शक हो कि वसीयत दबाव में बनाई गई, किसी को अनुचित फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई या उसमें कोई दूसरी संदिग्ध बात है, तो वसीयत पेश करने वाले की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में उसे हर संदेह दूर करना होगा। तभी कोर्ट इस नतीजे पर पहुंच सकती है कि वसीयत वास्तव में सही है।
गवाह न होने पर भी याचिकाकर्ता को राहत राहत क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि याचिकाकर्ता भांबो देवी ने खुद या किसी गवाह को पेश नहीं किया, उसका केस खारिज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि अगर कोई बुनियादी तथ्य पहले से ही स्वीकार है, जैसे कोई महिला मृतक की पत्नी है, तो उसे अलग से साबित करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन वसीयत सही है, यह साबित करना वसीयत पेश करने वाले की जिम्मेदारी है।
यानि, अगर वसीयत सही साबित नहीं होती, तो संपत्ति का अधिकार अपने आप कानूनी वारिस को मिल जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा, वसीयत खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी वसीयत से जुड़े अहम संदेहों का जवाब नहीं दे सके। इसलिए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने माना था कि चूंकि वसीयत रजिस्टर्ड है और गवाहों ने उसकी पुष्टि कर दी है, इसलिए उसे सही माना जाना चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस सोच को गलत बताया और कहा कि केवल रजिस्ट्रेशन और गवाहों की पुष्टि वसीयत की सच्चाई साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने 1974 की उस वसीयत के आधार पर संपत्ति के बंटवारे को रद्द कर दिया, जिसमें एक अशिक्षित किसान ने अंगूठा लगाकर वसीयत बनाई थी।
इसके साथ ही ट्रायल कोर्ट और अपील वाली कोर्ट का फैसला फिर से लागू हो गया, जिसमें वसीयत को सही नहीं मानते हुए उसे खारिज कर दिया गया था और मृतक की पत्नी के पक्ष में दिया गया फैसला भी कायम रहा।
वसीयत बनाने वालों के लिए अहम फैसला
यह फैसला उन सभी लोगों के लिए अहम है जो वसीयत बनाते हैं या भविष्य में वसीयत के आधार पर संपत्ति का दावा करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सिर्फ वसीयत का रजिस्टर्ड होना या गवाह का कोर्ट में बयान दे देना ही काफी नहीं है। अगर वसीयत को लेकर कोई संदेह पैदा होता है, तो उसे दूर करना जरूरी होगा।
इस फैसले से यह भी साफ हो गया कि कोर्ट हर मामले में सिर्फ कागजी प्रक्रिया नहीं देखेगी। अगर रिकॉर्ड में ऐसी परिस्थितियां हैं जिनसे वसीयत पर शक होता है, तो कोर्ट यह भी जांचेगी कि वसीयत वास्तव में उस व्यक्ति की अपनी इच्छा से बनाई गई थी या नहीं।
यानी वसीयत से जुड़े मामलों में सिर्फ औपचारिकताएं पूरी कर देना पर्याप्त नहीं होगा। जिस व्यक्ति के पक्ष में वसीयत होगी, उसे जरूरत पड़ने पर यह भी साबित करना होगा कि दस्तावेज पूरी तरह सही, भरोसेमंद और बिना किसी संदेह के बनाया गया था। यही इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश है।