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MBBS के बाद गांव में सेवा होगी अनिवार्य? ग्रामीण सेवा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश के लिए एक समान नीति का दिया सुझाव, केंद्र से मांगा जवाब

Supreme Court Suggests Uniform Rural Service Policy for MBBS Graduates Across India

नई दिल्ली: क्या देशभर के मेडिकल छात्रों के लिए एमबीबीएस पूरा करने के बाद एक साल की ग्रामीण सेवा अनिवार्य होनी चाहिए? क्या सभी राज्यों में इसके लिए एक जैसा नियम होना चाहिए?

इन अहम सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेडिकल शिक्षा सिर्फ डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि डॉक्टरों की देश निर्माण और ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने में भी अहम भूमिका है।

इसलिए पूरे देश के लिए एक समान नीति बनाने पर विचार किया जाना चाहिए।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ कर्नाटक सरकार के उस नियम को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एमबीबीएस के बाद डॉक्टरों के लिए स्थायी पंजीकरण से पहले एक साल की ग्रामीण सेवा अनिवार्य की गई है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नियम होने के बजाय पूरे देश के लिए एक समान नीति होनी चाहिए।

इसी पर कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।

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कर्नाटक के नियम से शुरू हुआ मामला

यह मामला कर्नाटक सरकार के उस नियम से जुड़ा है, जिसके तहत एमबीबीएस, पीजी और सुपर स्पेशियलिटी मेडिकल कोर्स पूरा करने वाले डॉक्टरों को मेडिकल काउंसिल में स्थायी पंजीकरण से पहले एक साल की ग्रामीण सेवा करना अनिवार्य है।

बाद में राज्य सरकार ने इस व्यवस्था का दायरा बढ़ाते हुए निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों की निजी सीटों पर पढ़ने वाले छात्रों को भी इसमें शामिल कर दिया।

इसी फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि निजी सीटों पर पढ़ने वाले छात्र अपनी पढ़ाई पर बहुत अधिक खर्च करते हैं।

इसलिए उन्हें सरकारी सीटों पर पढ़ने वाले छात्रों की तरह अनिवार्य ग्रामीण सेवा के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा ने कहा कि यह सिर्फ एक राज्य का मामला नहीं है, बल्कि पूरे देश से जुड़ा अहम मुद्दा है। इसलिए इस विषय पर एक समान राष्ट्रीय नीति होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि मेडिकल शिक्षा केवल निजी प्रयासों से पूरी नहीं होती। सरकारें भी मेडिकल शिक्षा पर बड़ी भूमिका निभाती हैं।

ऐसे में डॉक्टरों की जिम्मेदारी सिर्फ अपना पेशा चुनने तक सीमित नहीं है, बल्कि देश और समाज के प्रति भी उनकी जिम्मेदारी होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नियम होने के बजाय पूरे देश के लिए एक समान नीति बनाना ज्यादा बेहतर होगा।

केंद्र सरकार ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि पूरे देश के लिए एक समान नीति बनाने की संभावना पर केंद्र सरकार से निर्देश लेने के लिए उन्हें कुछ समय चाहिए।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई तीन सप्ताह के लिए टाल दी और केंद्र सरकार से कहा कि वह इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करे।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या मेडिकल छात्रों की अनिवार्य ग्रामीण सेवा को लेकर पूरे देश के लिए एक समान नीति बनाई जा सकती है।

अब अगली सुनवाई में केंद्र सरकार इस मुद्दे पर अपना जवाब सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश करेगी।

प्राइवेट मेडिकल छात्रों की दलील

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि निजी या डीम्ड विश्वविद्यालयों की निजी सीटों पर पढ़ने वाले छात्र अपनी पढ़ाई पर लाखों रुपये खर्च करते हैं।

इसलिए उन्हें सरकारी सीटों पर पढ़ने वाले छात्रों के बराबर मानना संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार के खिलाफ है।

याचिका में यह भी मांग की गई है कि ग्रामीण सेवा पूरी किए बिना भी उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) दिया जाए और कर्नाटक मेडिकल काउंसिल उनके स्थायी पंजीकरण को स्वीकार करे।

2024 में भी उठाया था यही सवाल

यह पहला मौका नहीं है, जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सवाल उठाया हो।

मई 2024 में इसी मामले की शुरुआती सुनवाई के दौरान भी जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा ने पूछा था कि निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों को ग्रामीण सेवा से छूट क्यों मिलनी चाहिए।

अभी की सुनवाई में भी उन्होंने यही चिंता दोहराई।

उन्होंने कहा कि मेडिकल शिक्षा हासिल करने वाले डॉक्टर सिर्फ अपना पेशा नहीं चुनते, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में भी उनकी अहम भूमिका होती है।

ऐसे में ग्रामीण सेवा को लेकर अलग-अलग राज्यों में अलग नियम होने के बजाय पूरे देश के लिए एक समान नीति पर विचार किया जाना चाहिए।

पूरे देश पर पड़ सकता है असर

यह मामला सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं है। यदि केंद्र सरकार पूरे देश के लिए एक समान नीति बनाने का फैसला करती है, तो भविष्य में मेडिकल शिक्षा पूरी करने वाले हजारों छात्रों पर इसका असर पड़ सकता है।

साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी दूर करने की दिशा में भी यह एक बड़ा कदम माना जा सकता है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है, लेकिन केंद्र सरकार से स्पष्ट नीति पर जवाब मांगकर इस बहस को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा दिया है।

अब इस मामले में सबकी नजर अगली सुनवाई पर रहेगी, जहां केंद्र सरकार बताएगी कि क्या पूरे देश में मेडिकल छात्रों की अनिवार्य ग्रामीण सेवा को लेकर एक समान नीति बनाई जा सकती है।

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