नई दिल्ली: अब बिना वैध इंश्योरेंस के सड़कों पर वाहन चलाना पहले जितना आसान नहीं होगा। देश की सड़कों पर बिना वैध बीमा के दौड़ रहे करोड़ों वाहनों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
सड़क हादसों के पीड़ितों को समय पर मुआवजा मिले और मोटर बीमा व्यवस्था प्रभावी बने, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) को कई बड़े निर्देश जारी किए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और आईआरडीएआई को एक पायलट प्रोजेक्ट तैयार करने को कहा है, जिसमें वैध इंश्योरेंस नहीं होने पर वाहन को ईंधन नहीं देने की व्यवस्था पर काम किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही नई निजी कारों के लिए अनिवार्य थर्ड पार्टी इंश्योरेंस की अवधि 3 साल से बढ़ाकर 4 साल और नए दोपहिया वाहनों के लिए 5 साल से बढ़ाकर 6 साल करने का भी निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था के बावजूद बड़ी संख्या में वाहन बिना बीमा के सड़कों पर चल रहे हैं। जिससे एक्सीडेंट होने पर पीड़ितों को मुआवजा मिलने में सालों लग जाते हैं।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि देश में करीब 56 फीसदी वाहन बिना वैध इंश्योरेंस के चल रहे हैं।
इसका सीधा असर सड़क हादसों के पीड़ितों और उनके परिवारों पर पड़ता है, क्योंकि ऐसे मामलों में मुआवजा मिलने में लंबा समय लग जाता है और कई बार कानूनी लड़ाई भी वर्षों तक चलती रहती है।
इसी स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मोटर बीमा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई अहम निर्देश जारी किए हैं।
56 फीसदी वाहन बिना बीमा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार देश में पंजीकृत 30.48 करोड़ वाहनों में से करीब 16.54 करोड़ वाहन बिना वैध बीमा के चल रहे हैं।
यानी लगभग 56 प्रतिशत वाहन अनिवार्य मोटर बीमा के दायरे से बाहर हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन कानून में थर्ड पार्टी बीमा इसलिए अनिवार्य किया गया था ताकि सड़क हादसे में घायल लोगों या मृतकों के परिवारों को समय पर मुआवजा मिल सके।
लेकिन बड़ी संख्या में वाहन बिना बीमा चलने से यह मकसद पूरा नहीं हो पा रहा है।
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बिना इंश्योरेंस नहीं मिलेगा पेट्रोल?
सुप्रीम कोर्ट ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) को ऐसा पायलट प्रोजेक्ट तैयार करने को कहा है, जिसमें पेट्रोल पंपों पर ईंधन देने की व्यवस्था को वाहन के वैध इंश्योरेंस से जोड़ा जा सके।
सु्प्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि यदि किसी वाहन का वैध इंश्योरेंस नहीं है, तो नया बीमा कराने तक उसे पेट्रोल या डीजल नहीं दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक इससे बिना बीमा और बिना पंजीकरण वाले वाहनों की पहचान आसान होगी।
साथ ही वाहन मालिक भी समय पर अपना इंश्योरेंस रिन्यू कराने के लिए प्रेरित होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस प्रस्ताव पर पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने सिद्धांत रूप से कोई आपत्ति नहीं जताई है। अब इस मॉडल को लेकर संबंधित विभाग आगे की प्रक्रिया पर विचार करेंगे।
नई कार और बाइक के बीमा नियम कैसे बदलेंगे?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2018 में दिए गए निर्देशों के तहत नई निजी कार खरीदने पर 3 साल और नए दोपहिया वाहन खरीदने पर 5 साल का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस अनिवार्य किया गया था।
लेकिन इसके बावजूद देश में बड़ी संख्या में वाहन आज भी बिना वैध बीमा के चल रहे हैं।
इसी स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आईआरडीएआई को नई निजी कारों के लिए अनिवार्य थर्ड पार्टी इंश्योरेंस की अवधि 3 साल से बढ़ाकर 4 साल और नए दोपहिया वाहनों के लिए 5 साल से बढ़ाकर 6 साल करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सड़क सुरक्षा और बीमा नियमों के बेहतर पालन के लिए यह बदलाव जरूरी है।
साथ ही आईआरडीएआई को इस संबंध में जरूरी दिशा-निर्देश तत्काल जारी करने को भी कहा गया है।
कैमरे पकड़ेंगे बिना बीमा वाले वाहन
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब तकनीक का अधिक इस्तेमाल किया जाना चाहिए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि राजमार्गों और शहरों में लगे ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (एएनपीआर) कैमरों को वाहन पोर्टल और बीमा डाटाबेस से जोड़ा जाए।
इससे बिना बीमा वाले वाहनों की स्वतः पहचान हो सकेगी और उन्हें ई-चालान जारी किए जा सकेंगे।
इसके अलावा राज्यों को निर्देश दिया गया कि ट्रैफिक पुलिस को ऐसे मोबाइल ऐप या हैंडहेल्ड उपकरण उपलब्ध कराए जाएं, जिनसे मौके पर ही किसी वाहन के बीमा की स्थिति जांची जा सके।
बीमा कंपनियों के लिए भी नए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने बीमा कंपनियों के लिए भी कई निर्देश जारी किए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वाहन बीमा खरीदते समय ग्राहकों को अब स्पष्ट और पूरी जानकारी मिलनी चाहिए।
इसके लिए हर बीमा कंपनी को कस्टमर ऑप्शन फॉर्म देना होगा, ताकि ग्राहक अपनी जरूरत के मुताबिक अतिरिक्त बीमा कवर चुन सके।
इसके साथ ही ग्राहकों को आसान भाषा में एक जानकारी पत्र भी उपलब्ध कराया जाएगा।
इसमें बताया जाएगा कि अनिवार्य थर्ड पार्टी बीमा में क्या-क्या शामिल है और अतिरिक्त प्रीमियम देकर कौन-कौन से वैकल्पिक बीमा कवर लिए जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने आईआरडीएआई को बीमा कंपनियों के साथ मिलकर इन वैकल्पिक बीमा कवर की एक समान शर्तें और भाषा तय करने का भी निर्देश दिया है।
साथ ही बीमा कंपनियों से कहा गया है कि वे अपनी वेबसाइट पर व्यापक मोटर बीमा के फायदे आसान और स्पष्ट तरीके से प्रदर्शित करें, ताकि ग्राहक सोच-समझकर फैसला ले सकें।
किस मामले में आए ये निर्देश?
यह मामला नेशनल इंश्योरेंस कंपनी की उस अपील से जुड़ा था, जिसमें उसने तेलंगाना हाईकोर्ट के एक फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने सड़क हादसे में जान गंवाने वाले एक व्यक्ति के परिवार को 10.00 लाख रुपये से अधिक मुआवजा देने का आदेश दिया था।
बीमा कंपनी का तर्क था कि पॉलिसी के तहत इस दावे का भुगतान नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील खारिज कर दी और कहा कि मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में जरूरत से ज्यादा तकनीकी आधार पर दावों को नहीं रोका जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि यह मामला केवल एक परिवार के मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में बिना बीमा वाले वाहनों, सड़क सुरक्षा और मोटर बीमा व्यवस्था से जुड़े बड़े सवाल भी सामने आ रहे हैं।
इसी वजह से कोर्ट ने सार्वजनिक हित में कई व्यापक निर्देश जारी किए।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को 14 अगस्त तक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को होगी, जब इन निर्देशों के पालन की स्थिति पर विचार किया जाएगा।