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राजस्थान के 11 हजार स्कूल लेक्चरर्स को बड़ी राहत : सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा, 2015 भर्ती की सीनियरिटी सूची फिर से तैयार होगी

Supreme Court Upholds Rajasthan High Court Verdict, Major Relief for 11,000 School Lecturers

‘एक भर्ती, एक चयन वर्ष’ के सिद्धांत को मिला बल; हाईकोर्ट के आदेश में दखल से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

नई दिल्ली/जयपुर/जोधपुर। राजस्थान के करीब 11 हजार स्कूल लेक्चरर्स के लिए बड़ी राहत की खबर है। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस महत्वपूर्ण फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है, जिसमें वर्ष 2015 की स्कूल लेक्चरर भर्ती के अभ्यर्थियों की अलग-अलग नियुक्ति तिथियों के आधार पर तय की गई वरिष्ठता को गलत ठहराया गया था।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब 2015 की एक ही भर्ती प्रक्रिया से चयनित स्कूल लेक्चरर्स की कॉमन इंटर-से सीनियरिटी तय करने का रास्ता साफ हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने 18 अगस्त 2026 को माही पाल व अन्य बनाम राजस्थान सरकार व अन्य से जुड़े दर्जनों मामलो की सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के 8 जुलाई 2026 के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया हैं.

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दायर सभी विशेष अनुमति याचिकाओं (SLPs) को खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप का कोई उचित आधार नहीं बनता।

2015 की एक भर्ती, लेकिन नियुक्तियां अलग-अलग तारीखों पर

विवाद राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा 16 अक्टूबर 2015 को जारी स्कूल लेक्चरर भर्ती विज्ञापन से जुड़ा है।

भर्ती में विभिन्न विषयों के पद एक ही विज्ञापन और एक ही चयन प्रक्रिया के तहत विज्ञापित किए गए थे, लेकिन विषयवार परिणाम अलग-अलग तारीखों पर घोषित किए गए।

अलग अलग तारीख पर जारी परिणाम के चलते अलग अलग विषय के अभ्यर्थियो के नियुक्ति आदेश भी अलग-अलग समय पर जारी हुए।

कुछ विषयों की चयन प्रक्रिया पर न्यायालय में मुकदमेबाजी और स्थगन आदेश के कारण नियुक्तियों में देरी हुई।

वहीं अन्य विषयों के अभ्यर्थियों को पहले नियुक्ति मिल गई।

इसी अलग-अलग नियुक्ति तिथियों को बाद में कॉमन सीनियरिटी सूची तैयार करने का आधार बना दिया गया, जिससे एक ही भर्ती प्रक्रिया में शामिल कई अधिक मेधावी अभ्यर्थी वरिष्ठता में पीछे चले गए।

हाईकोर्ट ने पाया कि विषयवार परिणाम और नियुक्तियों के अलग-अलग क्रम को इंटर-से सीनियरिटी का आधार बनाया गया था।

हाईकोर्ट ने रद्द की थी विवादित सीनियरिटी सूची

राजस्थान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 2015 भर्ती से संबंधित विवादित सीनियरिटी सूची को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया था।

कोर्ट ने राज्य सरकार और नियुक्ति प्राधिकारी को निर्देश दिया था कि वर्ष 2015 के विज्ञापन के तहत चयनित और नियुक्त सभी अभ्यर्थियों को एक समान चयन वर्ष दिया जाए और वर्ष 2018 की भर्ती में अपनाई गई प्रक्रिया के अनुरूप उनकी इंटर-से सीनियरिटी सूची तैयार की जाए।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि सही इंटर-से सीनियरिटी तैयार करने की प्रक्रिया चार महीने के भीतर पूरी की जाए।

हाईकोर्ट ने विवादित सीनियरिटी सूची के आधार पर लंबित याचिकाओं के दौरान हुई वाइस-प्रिंसिपल पद की पदोन्नतियों को भी रद्द कर दिया था और नई सीनियरिटी के आधार पर नियमों के अनुसार पदोन्नति की प्रक्रिया अपनाने के निर्देश दिए थे।

राजस्थान हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विवेक श्रीमाली, मनोज भंडारी और विकास बालिया ने पैरवी की थी.

सुप्रीम कोर्ट ने लंबी सुनवाई के बाद खारिज की SLPs

सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने की।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी, श्याम दीवान, गोपाल शंकरनारायणन और एस. गुरुकृष्णकुमार सहित अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा।

वहीं, प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरी, परमजीत सिंह पटवालिया और डॉ. मनीष सिंहवी और एडवोकेट आन रिकॉर्ड सहित अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है और विशेष अनुमति याचिकाओं को खारिज कर दिया।

खत्म होगी अलग-अलग जॉइनिंग डेट से पैदा हुई असमानता

इस फैसले को स्कूल लेक्चरर्स के लिए वरिष्ठता और पदोन्नति के मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

विवाद का मूल कारण यह था कि एक ही भर्ती और चयन प्रक्रिया से आए अभ्यर्थियों की वरिष्ठता केवल इसलिए अलग हो गई क्योंकि कुछ विषयों की नियुक्तियां मुकदमेबाजी के कारण बाद में हुईं।

हाईकोर्ट ने माना था कि चयन प्रक्रिया में देरी का खामियाजा उन अभ्यर्थियों को नहीं भुगतना चाहिए, जिनकी नियुक्ति उनके किसी दोष के बिना बाद में हुई।

अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखे जाने के बाद वर्ष 2015 की स्कूल लेक्चरर भर्ती के लिए एक समान चयन वर्ष और निष्पक्ष कॉमन इंटर-से सीनियरिटी तय करने की प्रक्रिया को कानूनी मजबूती मिल गई है।

इससे विभिन्न विषयों के लेक्चरर्स के बीच पदोन्नति के अवसरों में लंबे समय से चली आ रही असमानता दूर होने की उम्मीद है।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एक ही भर्ती प्रक्रिया से चयनित अभ्यर्थियों की वरिष्ठता तय करते समय केवल प्रशासनिक कारणों से हुई नियुक्ति में देरी को उनके खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

करीब 11 हजार स्कूल लेक्चरर्स के लिए यह फैसला समान अवसर और निष्पक्ष वरिष्ठता की दिशा में बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है।

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