नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश में फार्मेसी कॉलेजों को हर साल मिलने वाली मंजूरी की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक-एक साल की मंजूरी देने की मौजूदा व्यवस्था से सबसे ज्यादा परेशानी उन छात्रों को होती है, जो इन संस्थानों में पढ़ाई कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जब किसी संस्थान के पास जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और संसाधन मौजूद हैं, तो हर साल मंजूरी देने का क्या मतलब है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि फार्मेसी शिक्षा और उसके नियमन में बड़े बदलाव की तैयारी चल रही है।
सरकार इस संबंध में नेशनल फार्मेसी कमीशन विधेयक लाने पर काम कर रही है, जिसे नेशनल मेडिकल कमीशन की तर्ज पर तैयार किया जा रहा है।
सरकार ने संकेत दिया कि संसद के मौजूदा सत्र में इसे पेश किया जा सकता है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई दो सप्ताह के लिए टालते हुए अगली सुनवाई 20 अगस्त के बाद तय की।
हर साल मंजूरी पर सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने पूछा कि यदि किसी फार्मेसी कॉलेज के पास पहले से सभी जरूरी संसाधन और आधुनिक उपकरण मौजूद हैं, तो फिर उसे सिर्फ एक साल के लिए ही मंजूरी देने का क्या औचित्य है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बी.फार्मा, एम.फार्मा और डिप्लोमा पाठ्यक्रम चलाने वाले संस्थानों को हर साल मंजूरी लेने की प्रक्रिया अनिश्चितता पैदा करती है। इसका असर सीधे छात्रों के भविष्य पर पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी कॉलेज के पास अच्छी लैब, फैकल्टी और जरूरी सुविधाएं हैं, तो उसे हर साल नई मंजूरी लेने के लिए मजबूर करना तर्कसंगत नहीं लगता।
जजों ने यह भी पूछा कि क्या यह व्यवस्था सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है या वास्तव में इसका कोई ठोस उद्देश्य भी है।
इस दौरान सुप्रीम कोर्ट का फोकस साफ तौर पर शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों के हित पर रहा।
सुप्रीम कोर्ट को छात्रों की चिंता
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी चिंता यह है कि फार्मेसी शिक्षा के लिए ऐसी व्यवस्था हो, जिससे छात्रों के हित सुरक्षित रहें।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हर साल की मंजूरी से छात्रों में असमंजस की स्थित बनी रहती है और इस समस्या का समाधान जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फार्मेसी कॉलेजों को साल-दर-साल मंजूरी देने की प्रक्रिया छात्रों के लिए एक तरह का अस्थिर माहौल बना देती है।
जब छात्र किसी कॉलेज में एडमिशन लेते हैं, तो उन्हें यह भरोसा होना चाहिए कि उनका कोर्स बिना किसी रुकावट के पूरा होगा।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सीधा मतलब यह है कि मौजूदा सिस्टम में पढ़ रहे छात्रों के मन में यह डर बना रहता है कि अगर अगले साल कॉलेज को मंजूरी नहीं मिली, तो उनकी पढ़ाई और डिग्री पर असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद भविष्य में जो भी नीति बनाए, लेकिन नियामक व्यवस्था प्रभावी और भरोसेमंद होनी चाहिए।
केंद्र ने नए कानून की दी जानकारी
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार फार्मेसी शिक्षा से जुड़ी मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की तैयारी कर रही है।
इसके लिए ‘नेशनल फार्मेसी कमीशन विधेयक’ तैयार किया जा रहा है, जिसका ढांचा नेशनल मेडिकल कमीशन की तर्ज पर होगा।
सरकार का कहना है कि नए कानून का उद्देश्य फार्मेसी शिक्षा और संस्थानों के नियमन को अधिक प्रभावी बनाना है।
तुषार मेहता ने यह भी कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट की ओर से उठाई गई चिंताओं और टिप्पणियों से संबंधित अधिकारियों को अवगत कराएंगे।
2 सप्ताह बाद फिर सुनवाई
केंद्र सरकार की ओर से नए कानून की तैयारी की जानकारी मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की आगे की सुनवाई दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद में विधायी प्रक्रिया की स्थिति सामने आने के बाद इस मामले पर फिर सुनवाई की जाएगी।
अगली सुनवाई 20 अगस्त के बाद होगी।