नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी भर्तियों में उम्मीदवारों को समान अवसर देने को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी उम्मीदवार की कोई गलती नहीं है, तो सरकारी विभागों की देरी या कागजी प्रक्रियाओं का नुकसान उम्मीदवारों को नहीं भुगतना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि भर्ती प्रक्रिया में ऐसी परिस्थितियों से प्रभावित उम्मीदवारों को बराबरी का मौका देना जरूरी है। सरकारी भर्ती का मकसद सबसे योग्य उम्मीदवारों का चयन करना है, इसलिए विभागीय कारणों से किसी उम्मीदवार को अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चयन सूची में नाम आ जाने भर से नौकरी का पक्का अधिकार नहीं मिल जाता। यदि भर्ती प्रक्रिया में ऐसी कमियां सामने आती हैं जिनसे कुछ उम्मीदवार प्रभावित हुए हों, तो पूरी प्रक्रिया की समीक्षा की जा सकती है।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि सरकारी मंजूरी और नवीनीकरण जैसी प्रक्रियाएं उम्मीदवारों के नियंत्रण में नहीं होतीं।
इसलिए ऐसी देरी का खामियाजा उम्मीदवारों को नहीं भुगतना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सभी पात्र उम्मीदवारों को समान अवसर मिलना जरूरी है ताकि सबसे योग्य लोगों का चयन हो सके।
इसी सिद्धांत को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में मोटर व्हीकल इंस्पेक्टर भर्ती से जुड़े विवाद में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और तमिलनाडु लोक सेवा आयोग को दोबारा सत्यापन के आधार पर भर्ती प्रक्रिया जल्द पूरी करने का निर्देश दिया।
वर्कशॉप अनुभव और मान्यता पर फंसी भर्ती का मामला
यह मामला तमिलनाडु लोक सेवा आयोग द्वारा मोटर व्हीकल इंस्पेक्टर ग्रेड-2 के 113 पदों पर निकाली गई भर्ती से जुड़ा था। भर्ती प्रक्रिया में लिखित परीक्षा, दस्तावेज सत्यापन और इंटरव्यू शामिल थे।
भर्ती के बाद एक चयन सूची जारी हुई और कुछ उम्मीदवारों को नियुक्ति भी मिल गई। लेकिन बाद में भर्ती प्रक्रिया को चुनौती दी गई। विवाद मुख्य रूप से उन अनुभव प्रमाणपत्रों को लेकर था जो उम्मीदवारों ने विभिन्न ऑटोमोबाइल वर्कशॉप में काम करने के आधार पर जमा किए थे।
उम्मीदवारों के वर्कशॉप अनुभव को लेकर विवाद ये था कि जिन वर्कशॉप्स से अनुभव प्रमाणपत्र दिए गए थे, उनकी मान्यता और नवीनीकरण को लेकर अलग-अलग स्थिति थी।
भर्ती एजेंसी ने कुछ उम्मीदवारों को अनुभव के आधार पर योग्य मान लिया, जबकि कुछ अन्य उम्मीदवारों को उसी तरह के अनुभव के बावजूद भर्ती प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया।
इसी को लेकर विवाद शुरू हुआ और पूरी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठे। जिसके बाद मामला कोर्ट तक पहुंच गया।
मद्रास हाईकोर्ट ने कराई थी दोबारा जांच
सुनवाई के दौरान मद्रास हाईकोर्ट के सामने यह बात आई कि जिन वर्कशॉप में उम्मीदवारों ने काम किया था, उनमें से कई की मंजूरी का नवीनीकरण समय पर नहीं हुआ था। हालांकि ये वर्कशॉप बंद नहीं थीं और नियमित रूप से काम कर रही थीं। कई वर्कशॉप सरकारी वाहनों की मरम्मत का काम भी कर रही थीं।
हाईकोर्ट ने माना कि इस स्थिति का असर भर्ती प्रक्रिया पर पड़ा है। इसलिए अनुभव प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच कराने और पूरी भर्ती प्रक्रिया की समीक्षा करने का निर्देश दिया गया।
बाद में इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
उम्मीदवारों की अपनी-अपनी दलीलें
कुछ उम्मीदवारों का कहना था कि उनका नाम पहली चयन सूची में था और उन्होंने सभी जरूरी योग्यताएं पूरी कर रखी थीं। ऐसे में उन्हें बाद की प्रक्रिया में बाहर नहीं किया जाना चाहिए।
वहीं दूसरे उम्मीदवारों ने दलील दी कि उन्होंने किसी बंद या फर्जी वर्कशॉप में काम नहीं किया था। वर्कशॉप चल रही थीं, काम हो रहा था और अनुभव भी वास्तविक था। अगर उनकी मंजूरी के नवीनीकरण में सरकारी दफ्तरों में देरी हुई, तो उसका नुकसान उम्मीदवारों को नहीं दिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद पाया कि जिन वर्कशॉप की मंजूरी को लेकर विवाद था, उन्हें बाद में मंजूरी दे दी गई थी। इसके बाद दोबारा जांच में यह भी स्पष्ट हो गया कि संबंधित उम्मीदवारों के पास आवश्यक अनुभव मौजूद था।
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई उम्मीदवार ऐसी वर्कशॉप में काम कर चुका है जो वास्तव में काम कर रही थी और जरूरी सेवाएं दे रही थी, तो केवल सरकारी फाइलों में देरी की वजह से उसे भर्ती प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उम्मीदवारों का न तो मंजूरी देने की प्रक्रिया पर नियंत्रण होता है और न ही नवीनीकरण की फाइलों पर। इसलिए सरकारी देरी का नुकसान उम्मीदवारों पर डालना उचित नहीं होगा।
चयन सूची को लेकर भी स्पष्ट किया कानून
सुनवाई के दौरान कुछ उम्मीदवारों ने यह भी तर्क दिया कि उनका नाम संशोधित चयन सूची में शामिल था, इसलिए भर्ती प्रक्रिया उसी आधार पर पूरी की जानी चाहिए।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चयन सूची में नाम आ जाने भर से नियुक्ति का अधिकार नहीं बन जाता। यदि यह पाया जाता है कि कुछ उम्मीदवारों को बराबरी का अवसर नहीं मिला या भर्ती प्रक्रिया में ऐसी कमियां थीं जिनसे परिणाम प्रभावित हो सकते थे, तो प्रक्रिया की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नई प्रक्रिया से किसी उम्मीदवार का नुकसान नहीं होगा। सभी पात्र उम्मीदवारों को फिर से मौका मिलेगा और चयन समान आधार पर किया जाएगा।
अंकों में पारदर्शिता पर भी जोर
सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता को भी अहम बताया।
कोर्ट ने कहा कि यह विवाद कई वर्षों से चल रहा है। ऐसे में उम्मीदवारों को उनके मार्क्स बताने में कोई दिक्कत नहीं है। इससे चयन प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी और लंबे समय से चल रहे विवाद को खत्म करने में मदद मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उम्मीदवारों को आंसर शीट देने की जरूरत नहीं है। लेकिन उनके मार्क्स बताए जा सकते हैं, ताकि यह साफ रहे कि चयन किस आधार पर हुआ और भर्ती प्रक्रिया को लेकर किसी तरह का भ्रम न रहे।
तमिल माध्यम से पढ़ाई करने वाले उम्मीदवारों को राहत
मामले में तमिल माध्यम से पढ़ाई करने वाले उम्मीदवारों को मिलने वाले लाभ का मुद्दा भी उठा था।
सुप्रीम कोर्ट ने तमिल माध्यम से पढ़ाई करने वाले उम्मीदवारों को भी राहत दी। कोर्ट ने कहा कि अगर स्कूल या कॉलेज के प्रमुख ने यह प्रमाणित कर दिया है कि उम्मीदवार ने तमिल माध्यम में पढ़ाई की है, तो उसे स्वीकार किया जाएगा। भर्ती नियमों में ऐसी कोई शर्त नहीं थी कि उम्मीदवारों को इसके लिए कोई और दस्तावेज देना पड़े।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें भर्ती प्रक्रिया की दोबारा जांच कराने और नए सिरे से चयन प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु लोक सेवा आयोग को कहा कि दोबारा जांच में योग्य पाए गए उम्मीदवारों को भी चयन प्रक्रिया में शामिल किया जाए और भर्ती प्रक्रिया जल्द पूरी की जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जिन उम्मीदवारों की कोई गलती नहीं थी, उन्हें केवल सरकारी प्रक्रियाओं में हुई देरी की वजह से भर्ती से बाहर नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही कोर्ट ने उम्मीदवारों के मार्क्स बताने और तमिल माध्यम से पढ़ाई से जुड़े प्रमाणपत्रों को मान्य मानने के निर्देश को भी सही ठहराया।
देशभर की सरकारी भर्तियों के लिए अहम फैसला
यह फैसला सिर्फ तमिलनाडु की एक भर्ती का मामला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के जरिए साफ कर दिया है कि सरकारी भर्ती में उम्मीदवारों को बराबरी का मौका मिलना चाहिए और विभागीय गड़बड़ियों का नुकसान उनके ऊपर नहीं डाला जा सकता।
यदि किसी विभाग की देरी, मंजूरी से जुड़ी प्रक्रिया या अन्य प्रशासनिक कारणों से उम्मीदवार प्रभावित होते हैं, तो उन्हें बराबरी का अवसर देना जरूरी है।
साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि चयन सूची अंतिम नहीं होती और जरूरत पड़ने पर भर्ती प्रक्रिया की दोबारा जांच कराई जा सकती है।
सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि विभागीय कमियों का बोझ उम्मीदवारों पर नहीं डाला जा सकता। भर्ती का उद्देश्य सबसे योग्य उम्मीदवार का चयन करना है और इसके लिए सभी को समान अवसर मिलना चाहिए।
