राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, कहा घर का काम सिर्फ महिला का नहीं-समाज को खुद बदलना होगा
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बेहद दर्दनाक और सनसनीखेज मामले में सख्त संदेश देते हुए पत्नी को जिंदा जलाकर हत्या करने वाले पति की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।
सुप्रीम कोर्ट ने न केवल दोषी की अपील खारिज की, बल्कि देश में महिलाओं के खिलाफ जारी हिंसा पर भी तीखी टिप्पणी की।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने आरोपी शंकर की अपील को सिरे से खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट के फैसलों को सही ठहराया।
डाइंग डिक्लेरेशन बना सबसे बड़ा सबूत
यह मामला राजस्थान के बूंदी जिले का है, जहां वर्ष 2012 में 20 वर्षीय सुगना बाई को उसके पति ने कथित रूप से पीटने के बाद मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी थी।
गंभीर रूप से झुलसी सुगना ने अस्पताल में दम तोड़ दिया, लेकिन मरने से पहले दिए गए उसके बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) ने पूरे केस की दिशा बदल दी।
कोर्ट ने साफ कहा कि बयान मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हुआ और डॉक्टर ने उसकी मानसिक स्थिति सही बताई.
कोर्ट ने कहा कि किसी दबाव या सिखाने का सबूत नहीं मिला.
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा—यह बयान पूरी तरह विश्वसनीय है और दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है।
विकास के बावजूद हिंसा जारी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने समाज में महिला हिंसा को लेकर सवाल खड़े करते हुए कहा कि“कानून, योजनाओं और सुधारों के बावजूद महिलाओं के जीवन, शरीर और फैसलों पर नियंत्रण आज भी क्यों कायम है?”
कोर्ट ने कहा कि इसका जवाब केवल “हम भारत के लोग” ही दे सकते हैं।
कोर्ट ने कहा कि “विकास के बावजूद हिंसा जारी” – कोर्ट ने बताया कड़वा सच
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में एक ओर आर्थिक विकास, शिक्षा और महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन दूसरी ओर घरेलू हिंसा, दहेज हत्या और महिलाओं पर अत्याचार अब भी लगातार हो रहे हैं।
“यह एक विरोधाभास है—प्रगति भी है और हिंसा भी। पितृसत्ता आज भी रोजमर्रा के जीवन में मौजूद है।”
दहेज पर भी कड़ा रुख
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दहेज को लेकर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि
दहेज प्रथा कानूनन प्रतिबंधित है लेकिन समाज में इसकी स्वीकृति अभी खत्म नहीं हुई. यही वजह है कि ऐसे अपराध आज भी सामने आ रहे हैं।
चौंकाने वाले आंकड़े
सुप्रीम कोर्ट ने NCRB के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2023 में महिलाओं के खिलाफ 4.48 लाख से ज्यादा अपराध दर्ज हुए हैं.
कोर्ट ने कहा कि हर साल हजारों महिलाओं की मौत दहेज से जुड़े मामलों में होती हैं और यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।
घर के भीतर ही सबसे ज्यादा खतरा
कोर्ट ने कहा कि खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में घर में पुरुषों का वर्चस्व कायम है और महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित है.
यहां तक कि कामकाजी महिलाओं से भी उम्मीद की जाती है कि वे घर और बाहर दोनों जिम्मेदारियां अकेले निभाएं।
“घर का काम सिर्फ महिला का नहीं” – कोर्ट की दो टूक
सुप्रीम कोर्ट ने पारंपरिक सोच पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह गलत है कि घर के सारे काम सिर्फ महिला करे और पुरुष केवल कमाने की जिम्मेदारी निभाए
कोर्ट ने इस मानसिकता को बदलने की जरूरत बताई।
समाज को खुद बदलना होगा
अपने फैसले के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने बेहद भावुक और कड़ा संदेश दिया:
“ऐसे अपराध क्यों होते हैं, इसका जवाब केवल ‘हम भारत के लोग’ ही दे सकते हैं।”
अदालत ने साफ कहा कि केवल कानून बनाना काफी नहीं है—
जब तक समाज अपनी सोच नहीं बदलेगा, तब तक ऐसे अपराध नहीं रुकेंगे।
