नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट हिंदू विवाह कानून में महिलाओं को दिए गए एक विशेष तलाक अधिकार को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने एक अहम फैसले में उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मांग की गई थी कि हिंदू मैरिज एक्ट के उस प्रावधान को बदला जाए जो केवल पत्नी को तलाक मांगने का विशेष अधिकार देता है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने साफ कहा कि संविधान महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है, इसलिए इस कानून में कोई असंवैधानिकता नहीं है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाते हुए यह भी कहा कि व्यक्तिगत विवादों को संविधान के अनुच्छेद 32 के जरिए सुप्रीम कोर्ट में लाना उचित नहीं है। अदालत ने साफ कहा कि संविधान महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है और हर कानून को अनिवार्य रूप से जेंडर न्यूट्रल बनाना जरूरी नहीं है।
क्या है पूरा मामला: पति ने क्यों दी चुनौती?
यह मामला हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 13(2)(iii) से जुड़ा है। इस प्रावधान के तहत यदि किसी पत्नी को कोर्ट से मेंटेनेंस (भरण-पोषण) का आदेश मिल चुका है और उसके बाद एक साल या उससे अधिक समय तक पति-पत्नी के बीच साथ रहना (cohabitation) दोबारा शुरू नहीं होता, तो पत्नी तलाक की मांग कर सकती है।
याचिकाकर्ता की मांग थी कि यह अधिकार पुरुषों को भी मिलना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि महिलाओं के लिए विशेष सुरक्षा और कानूनी प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 15(3) के तहत संरक्षित हैं।
याचिकाकर्ता ने इस प्रावधान को चुनौती देते हुए कहा कि यह अधिकार केवल महिलाओं को देना गलत है और इसे पुरुषों के लिए भी उपलब्ध होना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने खुद कोर्ट में पेश होकर कहा कि वह इस कानून की “पुनर्समीक्षा” चाहते हैं ताकि पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार मिल सके।
क्या है हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13(2)(iii)
Hindu Marriage Act, 1955 की धारा 13(2)(iii) के तहत पत्नी को यह विशेष अधिकार दिया गया है कि यदि पति के खिलाफ अलग रहने या भरण-पोषण का आदेश पारित होने के बाद भी एक वर्ष तक वैवाहिक सहजीवन बहाल नहीं होता, तो वह तलाक की मांग कर सकती है।
यह प्रावधान महिलाओं को वैवाहिक और आर्थिक सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाया गया था। कानून का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि यदि पति अदालत के आदेश के बावजूद पत्नी के साथ वैवाहिक संबंध सामान्य नहीं करता, तो पत्नी को विवाह समाप्त करने का वैधानिक विकल्प मिले।
याचिकाकर्ता ने अदालत में दलील दी कि यह अधिकार केवल महिलाओं तक सीमित रखना “जेंडर पैरिटी” के खिलाफ है और इसे पुरुषों के लिए भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
कोर्ट का सवाल: ‘आपको इससे दिक्कत क्या है?’
मामले की सुनवाई Surya Kant और जस्टिस Joymalya Bagchi की बेंच कर रही थी।
याचिकाकर्ता स्वयं अदालत में पेश हुआ और कहा कि वह इस प्रावधान पर “relook” चाहता है। उसने कहा कि यह कानून पुरुष और महिला दोनों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने सीधे पूछा, “आपको इससे दिक्कत क्या है?”
जब याचिकाकर्ता ने कहा कि यह प्रावधान दोनों के लिए खुला होना चाहिए, तब अदालत ने उससे पूछा कि आखिर यह कानून उसे किस तरह प्रभावित कर रहा है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से सीधा सवाल किया कि इस प्रावधान से उसे व्यक्तिगत रूप से क्या परेशानी है।
जब याचिकाकर्ता ने कहा कि यह अधिकार पुरुषों को भी मिलना चाहिए, तो कोर्ट ने और सख्ती दिखाते हुए पूछा कि यह मुद्दा उसे कैसे प्रभावित करता है।
इस पर याचिकाकर्ता ने स्वीकार किया कि वह खुद एक वैवाहिक विवाद (matrimonial dispute) का सामना कर रहा है और “personal sufferer” है।
Article 32 के दुरुपयोग पर कोर्ट सख्त
जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि याचिका व्यक्तिगत विवाद से प्रेरित है, कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया।
CJI ने कहा कि इस तरह के मामलों में सुप्रीम कोर्ट का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने यहां तक कहा कि ऐसे मामलों में भारी जुर्माना (exemplary cost) भी लगाया जा सकता है।
कोर्ट ने साफ कहा:
“Article 32 का इस्तेमाल व्यक्तिगत बदले या निजी विवाद सुलझाने के लिए नहीं किया जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाई गई असाधारण रिट जुरिस्डिक्शन का इस्तेमाल निजी वैवाहिक या व्यक्तिगत नाराजगी के लिए नहीं होना चाहिए।
संविधान में महिलाओं के लिए विशेष कानून की अनुमति
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने इस मामले में संविधान का अहम पहलू सामने रखा। उन्होंने कहा कि Article 15(3) के तहत सरकार को यह अधिकार है कि वह महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाए।
यानी कानून में अगर महिलाओं को कुछ अतिरिक्त अधिकार दिए गए हैं, तो वह संविधान के तहत पूरी तरह वैध हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर कानून में पूर्ण समानता जरूरी नहीं। अदालत ने माना कि महिलाओं की सामाजिक और वैवाहिक स्थिति को देखते हुए संसद को ऐसे विशेष अधिकार देने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। इसलिए केवल इस आधार पर कि कोई प्रावधान पुरुषों के लिए उपलब्ध नहीं है, उसे असंवैधानिक नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ता लॉ स्टूडेंट को भी मिली नसीहत
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता कानून की पढ़ाई कर रहा है। इस पर कोर्ट ने उसे सलाह देते हुए कहा कि उसे अपने कदम सोच-समझकर उठाने चाहिए।
CJI ने कहा कि हो सकता है उसकी कुछ वास्तविक परेशानियां हों, लेकिन इस तरह की याचिका कानून के छात्रों के लिए सही संदेश नहीं देती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि उसे सही समय और सही मंच का इंतजार करना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि उसे याचिकाकर्ता की परेशानियों से सहानुभूति है, लेकिन उसी तरह उसकी अलग रह रही पत्नी के लिए भी सहानुभूति है। इस टिप्पणी से कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वह केवल एक पक्ष को ध्यान में रखकर कानून नहीं बदल सकता।
‘महिलाओं के विशेष अधिकार बरकरार‘
इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि हिंदू मैरिज एक्ट में महिलाओं को दिए गए विशेष अधिकारों को चुनौती देना आसान नहीं होगा। यह फैसला बताता है कि:
- महिलाओं के लिए बने विशेष प्रावधान संविधान के तहत सुरक्षित हैं।
- हर मामले में जेंडर समानता का मतलब समान अधिकार नहीं होता।
- सामाजिक संतुलन के लिए अलग-अलग प्रावधान जरूरी हो सकते हैं।
कोर्ट ने खारिज कर दी याचिका
अंत में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
इस फैसले से साफ हो गया है कि महिलाओं के लिए बनाए गए विशेष वैवाहिक अधिकारों को केवल “जेंडर न्यूट्रल” बनाने की मांग के आधार पर चुनौती देना आसान नहीं होगा, खासकर तब जब ऐसे प्रावधानों को संविधान का स्पष्ट संरक्षण प्राप्त हो।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के जरिए दो महत्वपूर्ण संदेश दिए हैं। पहला, महिलाओं के लिए बनाए गए विशेष कानून संविधान के अनुरूप हैं और उन्हें आसानी से चुनौती नहीं दी जा सकती।
दूसरा, कोर्ट का समय और अधिकार क्षेत्र व्यक्तिगत विवादों के लिए नहीं है। PIL का इस्तेमाल केवल जनहित के मामलों के लिए ही किया जाना चाहिए।
इस फैसले से यह भी साफ हो गया है कि कानून में समानता का मतलब हमेशा एक जैसा व्यवहार नहीं होता, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार न्यायसंगत व्यवस्था बनाना ही असली उद्देश्य है।