जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने गोविंद धारगाये और पुष्पिका अमित कुमार की याचिकाएं खारिज कीं; कहा-सत्र न्यायालय को बायपास करने के लिए ठोस और असाधारण परिस्थितियां जरूरी, न्यायिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर सामान्य आशंका पर्याप्त नहीं
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर के ऋषभदेव थाना क्षेत्र में दर्ज कथित धर्मांतरण मामले में दो आरोपियों को बड़ा झटका देते हुए उनकी अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल दूसरे राज्य में निवास करना, संबंधित अदालत तक लगभग 1,600 किलोमीटर की दूरी होना, सह-आरोपियों की जमानत याचिकाएं पहले खारिज हो जाना या निष्पक्ष सुनवाई को लेकर सामान्य आशंका जताना—इन आधारों पर सीधे हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मांगने का अधिकार स्वतः नहीं मिल जाता।
जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने गोविंद धारगाये और पुष्पिका अमित कुमार की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट और सत्र न्यायालय दोनों को अग्रिम जमानत पर विचार करने का अधिकार है, लेकिन सीधे हाईकोर्ट आने के लिए विशेष परिस्थितियों का ठोस आधार होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतों की स्थापित व्यवस्था को दरकिनार करने के लिए केवल आशंकाएं पर्याप्त नहीं हैं।
एकलपीठ ने दोनों आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए आरोपियों को संबंधित सत्र न्यायालय अथवा सक्षम विशेष न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने की छूट दी है।
क्या है पूरा मामला?
थाना ऋषभदेव, जिला उदयपुर में 6 जून 2026 को एफआईआर दर्ज की गई थी।
एफआईआर में आरोप लगाया गया कि उसी दिन दोपहर लगभग 12 बजे गांव कानूवाड़ा में एक निजी कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा था, जहां स्थानीय पिछड़े वर्ग के लोगों को कथित तौर पर प्रलोभन देकर और दबाव बनाकर धर्मांतरण तथा बपतिस्मा कराने का प्रयास किया गया।
इस मामले में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 299, 302, 196(1)(a), 61(2) और 318(4), राजस्थान विधिविरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2025 की धाराओं 3 और 5(1), तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(2)(va) के तहत अपराध दर्ज किए गए।
गोविंद धारगाये और पुष्पिका अमित कुमार को शुरुआत में एफआईआर में नामजद नहीं किया गया था।
बाद में सह-आरोपियों के बयानों के आधार पर उन्हें भी आरोपी बनाया गया। जांच अधिकारी के अनुसार, दोनों को गिरफ्तार नहीं किया जा सका था, जिसके कारण उनके संबंध में जांच लंबित थी।
वहीं, अन्य आरोपियों के विरुद्ध 2 सितंबर 2026 को आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका था।
आरोपियों की ओर से दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि दोनों को मामले में झूठा फंसाया गया है और उनकी कोई विशिष्ट भूमिका सामने नहीं आई है।
गोविंद धारगाये की भूमिका: बचाव पक्ष के अनुसार, गोविंद सह-आरोपी अमित कुमार के यहां ड्राइवर के रूप में कार्यरत था और अपने काम के सिलसिले में कार्यक्रम स्थल पर गया था। कार्यक्रम के आयोजन, संचालन या प्रबंधन में उसकी कोई भूमिका नहीं थी।
पुष्पिका अमित कुमार की भूमिका: उनके वकीलों ने कहा कि पुष्पिका केवल अपने पति के साथ गई थीं और कार्यक्रम के आयोजन अथवा प्रबंधन में उन्होंने कोई भागीदारी नहीं की।
सह-आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत
आरोपियों की जमानत याचिकाएं राजस्थान हाईकोर्ट की समन्वय पीठ ने 23 जुलाई 2026 को खारिज की थीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2026 को आपराधिक अपील में उन्हें जमानत दे दी।
गिरफ्तारी और पूछताछ की आवश्यकता
बचाव पक्ष ने कहा कि अन्य आरोपियों के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल हो चुका है और वर्तमान याचिकाकर्ता जांच में सहयोग करने को तैयार हैं। इसलिए उनकी हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।
सीधे हाईकोर्ट आने का आधार
दोनों आरोपी छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के भिलाई में रहते हैं, जो उदयपुर स्थित संबंधित सत्र न्यायालय से लगभग 1,600 किलोमीटर दूर है। उन्होंने गिरफ्तारी की आशंका तथा स्थानीय परिस्थितियों में सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई को लेकर चिंता भी जताई।
जज की अहम टिप्पणी: सत्र न्यायालय को बायपास करना सामान्य प्रक्रिया नहीं
दलीलें सुनने के बाद मामले में जस्टिस संजीत पुरोहित ने आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 482 हाईकोर्ट और सत्र न्यायालय को अग्रिम जमानत पर विचार करने का समवर्ती अधिकार देती है।
हालांकि, इस अधिकार का अर्थ यह नहीं है कि कोई भी आरोपी बिना पर्याप्त कारण सीधे हाईकोर्ट पहुंच सकता है।
कोर्ट ने माना कि विशेष परिस्थितियों में सीधे हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर करना संभव है, लेकिन ऐसी परिस्थितियां केवल कह देने से सिद्ध नहीं हो जातीं। उनके समर्थन में रिकॉर्ड पर ठोस तथ्य होना आवश्यक है।
1600 किलोमीटर की दूरी का तर्क भी नहीं आया काम
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि वे छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के भिलाई में रहते हैं, जबकि मामले की सुनवाई से संबंधित सत्र न्यायालय उदयपुर में है।
दोनों स्थानों के बीच लगभग 1,600 किलोमीटर की दूरी होने के कारण उन्हें वहां जाकर अग्रिम जमानत मांगने में कठिनाई होगी।
इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दूसरे राज्य में निवास करना अपने आप में ऐसी असाधारण परिस्थिति नहीं है, जिसके आधार पर सत्र न्यायालय को छोड़कर सीधे हाईकोर्ट का रुख किया जाए।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि याचिकाकर्ताओं ने जोधपुर स्थित हाईकोर्ट में अधिवक्ता नियुक्त कर याचिकाएं दायर की थीं।
ऐसे में उदयपुर के सत्र न्यायालय में अधिवक्ता के माध्यम से अग्रिम जमानत आवेदन प्रस्तुत करने का विकल्प भी उपलब्ध था।
कोर्ट के अनुसार, संबंधित आवेदन पर पैरवी के लिए आरोपी की व्यक्तिगत उपस्थिति हर स्थिति में अनिवार्य नहीं होती।
सह-आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बावजूद राहत नहीं
बचाव पक्ष ने दलील दी कि इसी एफआईआर में शामिल अन्य आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी।
याचिकाकर्ताओं की आशंका थी कि यदि वे पहले सत्र न्यायालय में जाते हैं, तो वहां भी उनकी याचिकाएं खारिज हो सकती हैं।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को सीधे हाईकोर्ट आने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना।
अदालत ने कहा कि सह-आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर हुए निर्णय मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वर्तमान आरोपियों को सत्र न्यायालय में निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलेगी।
कोर्ट ने न्यायिक व्यवस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर भरोसा जताते हुए स्पष्ट किया कि किसी अदालत से प्रतिकूल आदेश आने की आशंका के आधार पर पहले से ही उस अदालत की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
हर आरोपी सीधे हाईकोर्ट आने लगेगा तो व्यवस्था प्रभावित होगी
हाईकोर्ट ने अदालतों की स्थापित पदानुक्रम व्यवस्था के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यदि किसी सह-आरोपी की जमानत याचिका खारिज होने को ही सीधे हाईकोर्ट आने का पर्याप्त आधार मान लिया जाए, तो एक ही एफआईआर में शामिल अन्य आरोपी भी इसी आधार पर सत्र न्यायालय को छोड़कर सीधे हाईकोर्ट का रुख करने लगेंगे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट को अग्रिम जमानत देने की शक्ति प्राप्त है, लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल स्थापित न्यायिक प्रक्रिया और विशेष परिस्थितियों के सिद्धांत को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Mohammed Rasal C. और Jagdeo Prasad बनाम State of Bihar सहित संबंधित न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सीधे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने के लिए असाधारण परिस्थितियों का ठोस आधार आवश्यक है।
सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई की आशंका भी नहीं हुई पर्याप्त साबित
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि मामला धार्मिक भावनाओं से जुड़ा होने के कारण उन्हें सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई को लेकर आशंका है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसे विशिष्ट तथ्य प्रस्तुत नहीं किए गए, जिनसे यह साबित हो कि आरोपियों को वास्तविक खतरा है या संबंधित सत्र न्यायालय में उनकी याचिकाओं पर निष्पक्ष विचार नहीं किया जा सकेगा।
कोर्ट ने संकेत दिया कि सामान्य आशंका और ठोस परिस्थितियों में अंतर है। केवल यह कहना कि किसी क्षेत्र में प्रतिकूल माहौल हो सकता है, सीधे हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मांगने के लिए पर्याप्त नहीं है।
SC/ST एक्ट की धारा 18 पर हाईकोर्ट ने नहीं दिया अंतिम निष्कर्ष
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर वैधानिक रोक का मुद्दा उठाया गया।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि गोविंद धारगाये और पुष्पिका अमित कुमार की जातिगत स्थिति के संबंध में उपलब्ध दस्तावेजों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर भी कानूनी आपत्ति उठाई कि उनके मामले में उक्त प्रावधान की प्रयोज्यता पर विचार आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने इस पहलू पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया। आदेश से स्पष्ट है कि धारा 18 के तहत रोक लागू होने या न होने का प्रश्न खुला छोड़ा गया है।
गिरफ्तारी की आशंका पर भी कोर्ट ने की परिस्थितियों की जांच
एफआईआर 6 जून 2026 को दर्ज हुई, अन्य आरोपियों के विरुद्ध 2 सितंबर 2026 को आरोपपत्र दाखिल हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2026 को सह-आरोपियों को जमानत दी।
इसके बावजूद वर्तमान याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तार नहीं किया गया था।
पुष्पिका सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट में उपस्थित भी हुई थीं, जबकि उन्हें कोई अंतरिम संरक्षण प्राप्त नहीं था।
कोर्ट ने इन परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा और माना कि रिकॉर्ड पर ऐसा पर्याप्त आधार नहीं है, जिससे सीधे हाईकोर्ट आने की असाधारण आवश्यकता स्थापित हो सके।
दोनों याचिकाएं खारिज, सत्र न्यायालय जाने की छूट
सभी दलीलों पर विचार करने के बाद जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने दोनों अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने अग्रिम जमानत की मांग के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। दोनों आरोपी संबंधित सत्र न्यायालय अथवा सक्षम विशेष न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं।
यदि आवेदन प्रस्तुत किया जाता है, तो संबंधित न्यायालय को उस पर शीघ्रता से, कानून के अनुसार और स्वतंत्र रूप से निर्णय लेना होगा। हाईकोर्ट की टिप्पणियां उस निर्णय को प्रभावित नहीं करेंगी।