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राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला: वैध कारण किसी भी प्रशासनिक निर्णय की आत्मा होते हैं, बिना कारण नीलामी रद्द करना मनमानी, आवास मंडल को आवंटन बहाल करने के निर्देश

Valid Reasons Are the Soul of Administrative Decisions; Arbitrary Cancellation of Auction Illegal: Rajasthan High Court

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान आवास मंडल (Rajasthan Housing Board) द्वारा बिना कारण बताए सफल नीलामी प्रक्रिया को रद्द करने के मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए बड़ा फैसला सुनाया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण को मनमाने ढंग से, बिना ठोस और लिखित कारण बताए नीलामी रद्द करने का अधिकार नहीं है। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 300-A का उल्लंघन है।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने नागौर, बांसवाड़ा और डूंगरपुर सहित विभिन्न स्थानों पर आवास मंडल की आवासीय योजनाओं से जुड़े कई रिट याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।

जवरी लाल, राजेंद्र भाकल, जयेंद्र सिंह सिसोदिया सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया है।

क्या था पूरा मामला

वर्ष 2012 और 2015 में राजस्थान आवास मंडल ने ताऊसर रोड आवासीय योजना, नागौर सहित अन्य योजनाओं में निर्मित आवासों की नीलामी के लिए विज्ञापन जारी किया था।

नीलामी प्रक्रिया पूरी होने के बाद याचिकाकर्ताओं को सफल बोलीदाता घोषित किया गया।

उनसे नियमानुसार 10 प्रतिशत राशि जमा करवाई गई, जिसे सभी याचिकाकर्ताओं ने समय पर जमा कर दिया।

इसके बावजूद आवास मंडल ने 13 मार्च 2015 को एक पत्र जारी कर बिना कोई ठोस कारण बताए पूरी नीलामी प्रक्रिया रद्द कर दी और भविष्य में पुनः नीलामी कराने की बात कही।

न तो किसी प्रकार का कारण बताया गया और न ही याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर दिया गया।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि “कारण किसी भी प्रशासनिक निर्णय की आत्मा होते हैं।” यदि किसी निर्णय से नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं, तो उसमें स्पष्ट, ठोस और तर्कसंगत कारण दर्ज होना अनिवार्य है।

केवल यह कह देना कि नीलामी निष्पक्ष या प्रतिस्पर्धात्मक नहीं थी, पर्याप्त नहीं है, जब तक इसे प्रमाणित करने वाले तथ्य रिकॉर्ड पर न हों।

अदालत ने यह भी कहा कि आवास मंडल द्वारा जिन धाराओं का हवाला देकर नीलामी रद्द की गई, वे असीमित और निरंकुश अधिकार प्रदान नहीं करतीं।

विवेकाधिकार का अर्थ मनमानी नहीं होता। विवेकाधिकार का प्रयोग कानून, तर्क और निष्पक्षता की सीमाओं में रहकर ही किया जाना चाहिए।

सफल बोली के बाद अधिकार बनता है

हाईकोर्ट ने माना कि जब बोली स्वीकार कर ली जाती है और निर्धारित राशि जमा कर ली जाती है, तब केवल “प्रस्ताव” की स्थिति नहीं रहती, बल्कि आवेदक के पक्ष में वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation) उत्पन्न हो जाती है।

ऐसे में बिना कारण और बिना सुनवाई के नीलामी रद्द करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

कोर्ट का अंतिम आदेश

अदालत ने आवास मंडल द्वारा जारी 13 मार्च 2015 का रद्दीकरण आदेश रद्द कर दिया और निर्देश दिए कि सभी याचिकाकर्ताओं को उनके-अपने आवासों का आवंटन बहाल किया जाए।

साथ ही आवास मंडल को शेष औपचारिकताएँ कानून के अनुसार पूरी करने का आदेश दिया गया। भविष्य में भी बिना कारण दर्ज किए आवंटन में हस्तक्षेप न करने के निर्देश दिए गए।

राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला: वैध कारण किसी भी प्रशासनिक निर्णय की आत्मा होते हैं, बिना कारण नीलामी रद्द करना मनमानी, आवास मंडल को आवंटन बहाल करने के निर्देश

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान आवास मंडल (Rajasthan Housing Board) द्वारा बिना कारण बताए सफल नीलामी प्रक्रिया को रद्द करने के मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए बड़ा फैसला सुनाया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण को मनमाने ढंग से, बिना ठोस और लिखित कारण बताए नीलामी रद्द करने का अधिकार नहीं है। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 300-A का उल्लंघन है।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने नागौर, बांसवाड़ा और डूंगरपुर सहित विभिन्न स्थानों पर आवास मंडल की आवासीय योजनाओं से जुड़े कई रिट याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।

जवरी लाल, राजेंद्र भाकल, जयेंद्र सिंह सिसोदिया सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया है।

क्या था पूरा मामला

वर्ष 2012 और 2015 में राजस्थान आवास मंडल ने ताऊसर रोड आवासीय योजना, नागौर सहित अन्य योजनाओं में निर्मित आवासों की नीलामी के लिए विज्ञापन जारी किया था।

नीलामी प्रक्रिया पूरी होने के बाद याचिकाकर्ताओं को सफल बोलीदाता घोषित किया गया।

उनसे नियमानुसार 10 प्रतिशत राशि जमा करवाई गई, जिसे सभी याचिकाकर्ताओं ने समय पर जमा कर दिया।

इसके बावजूद आवास मंडल ने 13 मार्च 2015 को एक पत्र जारी कर बिना कोई ठोस कारण बताए पूरी नीलामी प्रक्रिया रद्द कर दी और भविष्य में पुनः नीलामी कराने की बात कही।

न तो किसी प्रकार का कारण बताया गया और न ही याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर दिया गया।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि “कारण किसी भी प्रशासनिक निर्णय की आत्मा होते हैं।” यदि किसी निर्णय से नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं, तो उसमें स्पष्ट, ठोस और तर्कसंगत कारण दर्ज होना अनिवार्य है।

केवल यह कह देना कि नीलामी निष्पक्ष या प्रतिस्पर्धात्मक नहीं थी, पर्याप्त नहीं है, जब तक इसे प्रमाणित करने वाले तथ्य रिकॉर्ड पर न हों।

अदालत ने यह भी कहा कि आवास मंडल द्वारा जिन धाराओं का हवाला देकर नीलामी रद्द की गई, वे असीमित और निरंकुश अधिकार प्रदान नहीं करतीं।

विवेकाधिकार का अर्थ मनमानी नहीं होता। विवेकाधिकार का प्रयोग कानून, तर्क और निष्पक्षता की सीमाओं में रहकर ही किया जाना चाहिए।

सफल बोली के बाद अधिकार बनता है

हाईकोर्ट ने माना कि जब बोली स्वीकार कर ली जाती है और निर्धारित राशि जमा कर ली जाती है, तब केवल “प्रस्ताव” की स्थिति नहीं रहती, बल्कि आवेदक के पक्ष में वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation) उत्पन्न हो जाती है।

ऐसे में बिना कारण और बिना सुनवाई के नीलामी रद्द करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

कोर्ट का अंतिम आदेश

अदालत ने आवास मंडल द्वारा जारी 13 मार्च 2015 का रद्दीकरण आदेश रद्द कर दिया और निर्देश दिए कि सभी याचिकाकर्ताओं को उनके-अपने आवासों का आवंटन बहाल किया जाए।

साथ ही आवास मंडल को शेष औपचारिकताएँ कानून के अनुसार पूरी करने का आदेश दिया गया। भविष्य में भी बिना कारण दर्ज किए आवंटन में हस्तक्षेप न करने के निर्देश दिए गए।

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