1991 के मामले में 2024 में आए फैसले को बिना पढ़े लोग कर रहे आलोचना, कोर्ट ने ‘प्रयास’ और ‘तैयारी’ की कानूनी परिभाषा स्पष्ट की, राजस्थान हाईकोर्ट का पुराना फैसला फिर चर्चा में,
जयपुर, 25 नवंबर
सोमवार 24 नवंबर को देश के सोशल मीडिया पर अचानक से राजस्थान हाईकोर्ट के एक फैसले की बड़ी चर्चा होने लगी या यूँ कहें कि इस फैसले को लेकर देश की ज्यूडिशियरी को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है।
जिस फैसले के आधार पर सोशल मीडिया पर सोमवार को चर्चा हो रही है या वायरल हो रहा है वह फैसला राजस्थान हाईकोर्ट ने 13 मई 2024 को सुनाया था यानी कि करीब डेढ़ साल पूर्व।
क्यों वायरल हो रहा है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इसके वायरल होने के पीछे सोशल मीडिया के वे लोग हैं, जिन्होंने कभी यह फैसला पढ़ा भी नहीं होगा।
इस फैसले को देश के तमाम मीडिया हाउस ने कवर किया था जिनमें से कुछ की हेडलाइन यहां दी जा रही हैं…
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कहा जाए तो जिस वक्त यह फैसला दिया गया था सोशल मीडिया से लेकर देश की मीडिया ने भी इसे खूब प्रकाशित किया था।
लेकिन हाईकोर्ट के फैसले के करीब डेढ़ साल बाद 24 नवंबर 2025 को शाम 6:23 पर सोशल मीडिया पर वेनम नाम के एक्स हैंडल से किए गए एक ट्वीट से यह फैसला फिर से चर्चा में आ गया है।
Rajasthan HC Verdict On 1991 Case Goes Viral in 2025
इस पोस्ट को अब तक 4 लाख लोग देख चुके हैं तो वहीं करीब ढाई हजार लोगों ने रीपोस्ट किया है और 13 हजार लोगों ने लाइक किए हैं।
लेकिन इस बार सोशल मीडिया कानूनी बिंदुओं को नहीं बल्कि इस हेडलाइन को लेकर उत्तेजित है।
जिस फैसले को लेकर सोशल मीडिया अप्रत्यक्ष रूप से अदालत पर सवाल खड़े कर रहा है वह फैसला वर्ष 1991 में हुए घटनाक्रम से जुड़ा है।
सोशल मीडिया यह भूल जाता है कि देश में 1991 में पॉक्सो कानून लागू नहीं था, लेकिन सोशल मीडिया इस फैसले और घटना को आज के परिप्रेक्ष्य में खड़ा करने की कोशिश करता है।
यह एक विधिवत कानूनी पहलू है कि कोई कानून उसके लागू होने के बाद की घटना पर लागू हो सकता है, उससे पूर्ववर्ती घटना पर नहीं।
देश में पॉक्सो एक्ट 14 नवंबर 2012 को लागू हुआ था जो 1991 की घटना पर लागू नहीं हो सकता।
फैसले का केंद्रीय बिंदु
राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकलपीठ द्वारा सुनाए गए इस रिपोर्टेबल जजमेंट का केंद्रीय बिंदु IPC की धारा 376 और 511 है।
यह फैसला IPC की धारा 376/511 को लेकर विस्तृत चर्चा को जन्म देता है जो कि अब देश में BNS से बदली जा चुकी हैं।
IPC की धारा 376/511 का सीधा संबंध दुष्कर्म करने के प्रयास से है। यह धारा दो कानूनों का संयोजन है यानी ये दोनों धाराएं अलग-अलग हैं जिसमें—
IPC की धारा 376 — दुष्कर्म के अपराध और उसकी सजा से जुड़ी है।
IPC की धारा 511 — यह उन अपराधों के प्रयास के लिए सज़ा का प्रावधान करती है जिनके लिए कोई अलग से प्रयास की सज़ा नहीं है। इसमें आजीवन कारावास या अन्य कारावास से दंडनीय अपराध शामिल हैं।
जब इन दोनों धाराओं को एक साथ पढ़ा जाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि यह दुष्कर्म के प्रयास के लिए लागू होती है।
इसका मतलब है कि अगर कोई व्यक्ति दुष्कर्म करने का प्रयास करता है और उसके लिए कोई निश्चित कदम उठाता है, तो उस पर इस धारा के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। यह अपराध एक गंभीर गैर-जमानती अपराध है।
कब लागू होती है — यह धारा उन मामलों में लागू होती है जहां कोई व्यक्ति दुष्कर्म करने का प्रयास करता है, लेकिन किसी कारणवश अपराध पूरा नहीं हो पाता है।
सज़ा — इस धारा के लागू होने पर अपराध को पूरा करने के प्रयास की गंभीरता के आधार पर सज़ा तय होती है। यह एक गैर-जमानती अपराध है।
कानूनी बदलाव — देश में भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू होने के बाद IPC की धारा 511 को BNS 62 में बदल दिया गया है।
क्या कहता है राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला
Rajasthan Highcourt ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में दो महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं पर विस्तृत चर्चा करते हुए उनके सही कानूनी बिंदु तय किए हैं।
इस फैसले से देश में आपराधिक न्याय प्रणाली में बेहद संवेदनशील बिंदुओं को और अधिक स्पष्ट किया है।
किसी भी अपराध के लिए “प्रयास” और “तैयारी” दो अलग कानूनी अवस्थाएँ हैं जिसे परिभाषित करते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि—
किसी भी यौन अपराध में केवल नीयत, कपड़े उतारना, अश्लील हरकत जैसे कृत्य “तैयारी” माने जाते हैं।
लेकिन “प्रयास” तब माना जाता है जब आरोपी ऐसा कदम उठाए जिससे अपराध लगभग पूरा होने वाला होता और पीड़िता यदि बचाव न करती तो अपराध हो ही जाता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कई बार ऐसे मामलों में धारा 376/511 IPC जल्दी लगा दी जाती है, जबकि हर घटना उस स्तर तक नहीं पहुंचती और कानून हर अपराध के लिए उपयुक्त धारा निर्धारित करता है।
हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक अपराध में किए गए कृत्य के लिए सही धारा में सही अपराध का मूल्यांकन करने से जुड़ा तथ्य स्थापित किया है।
साथ ही यह भी तय किया कि नाबालिग बच्चियों के साथ किसी भी प्रकार की अश्लील हरकत या मर्यादा भंग गंभीर अपराध है और कानून ऐसे मामलों में सख्त रुख रखता है।
हाईकोर्ट ने इस मामले में यह भी तय किया कि आरोपी के खिलाफ वही सज़ा दी जाए जिसकी कानूनी नींव पुख्ता हो।
34 साल पुराना मामला
राजस्थान हाईकोर्ट ने यह फैसला दुष्कर्म के प्रयास के आरोपी 56 वर्षीय टोंक जिले के अंबापुरा निवासी सुवालाल की ओर से दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई के बाद दिया है।
याचिकाकर्ता आरोपी ने यह अपील राजस्थान हाईकोर्ट में वर्ष 1991 में दायर की थी, जिस पर राजस्थान हाईकोर्ट ने 13 मई 2024 को रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला सुनाया था।
यह मामला 1991 में टोंक जिले के टोडारायसिंह थाना क्षेत्र में दर्ज हुआ था और तब से न्यायिक प्रक्रियाओं से गुजरते हुए करीब 33 साल बाद मई 2024 में तय किया गया था।
इस फैसले ने “अपराध की तैयारी” और “अपराध के प्रयास” के बीच की महीन कानूनी रेखा को फिर से स्पष्ट किया है।
कहां से शुरू हुआ मामला?
घटना टोंक जिले के थाना टोडारायसिंह में दर्ज 9 मार्च 1991 की है जहां 6 वर्षीय नाबालिग बालिका के दादा ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
आरोप था कि उसकी छह वर्ष की पोती शाम लगभग आठ बजे पानी पीने प्याऊ गई थी। उसी दौरान आरोपी सुवालाल, जो उसी क्षेत्र का निवासी था, उसे जबरन पास की धर्मशाला में ले गया और कपड़े उतारकर उसके साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया।
लड़की के चिल्लाने पर आसपास के लोग वहां पहुंचे और आरोपी वहां से भाग गया।
इस घटना के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज किया और जांच के बाद उसे 376/511 IPC के तहत आरोप तय किए।
ट्रायल कोर्ट का फैसला
अपराध की घटना के करीब 3 महीने बाद ही टोंक जिला सेशन कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी सुवालाल को दुष्कर्म करने के प्रयास का दोषी मानते हुए उसे 3 वर्ष 6 महीने की कठोर कारावास और 100 रुपये के अर्थदंड की सज़ा सुनाई।
फैसले के कुछ दिनों बाद ही आरोपी ने जिला अदालत के फैसले के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की।
हाईकोर्ट में आरोपी की दलीलें
जिला अदालत के फैसले के खिलाफ दायर की गई अपील में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता की ओर से दलील दी गई कि मेडिकल साक्ष्य दुष्कर्म के प्रयास को प्रमाणित नहीं करते।
पीड़िता के बयान में केवल यह कहा गया कि आरोपी ने उसके कपड़े उतारे और स्वयं निर्वस्त्र हुआ, लेकिन निर्णायक कदम नहीं उठाया जिससे दुष्कर्म का प्रयास सिद्ध होता।
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि इस मामले में धारा 376/511 लागू नहीं की जा सकती।
सरकार की विरोध में दलील
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता का बयान स्पष्ट, विश्वसनीय और बिना विरोधाभास वाला है।
आरोपी ने बयान के दौरान क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन नहीं किया, जो यह दर्शाता है कि उसने पीड़िता के आरोपों को स्वीकार कर लिया।
आरोपी के कार्य से स्पष्ट है कि उसका उद्देश्य दुष्कर्म करना था।
हाईकोर्ट का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद किसी अपराध में ‘तैयारी’ और ‘प्रयास’ पर विस्तृत चर्चा करते हुए फैसला सुनाया।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी अपराध में—
पहले इरादा पैदा होता है,
फिर तैयारी होती है,
और अंत में प्रत्यक्ष प्रयास।
किसी अपराध को “प्रयास” साबित करने के लिए यह आवश्यक है कि—
आरोपी ऐसे कदम उठाए हों जिनसे अपराध का पूरा होना लगभग तय हो गया हो,
मात्र तैयारी या मंशा पर्याप्त नहीं मानी जाती।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में 1967 के Sittu Vs. State of Rajasthan (AIR 1967 Raj) और 1996 के Damodar Behera Vs. State of Orissa (1996 CrLR 346) पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा—
आरोपी द्वारा लड़की के कपड़े उतारना और स्वयं निर्वस्त्र होना अपराध की नीयत को तो दर्शाता है,
लेकिन ऐसा निर्णायक कदम नहीं उठाया गया जो “दुष्कर्म के अंतिम चरण” को साबित करे।
इसी आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि—
यह मामला दुष्कर्म के प्रयास का नहीं, बल्कि एक नाबालिग लड़की की मर्यादा भंग करने का अपराध है।
साक्ष्यों की भूमिका
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मामला मुख्य रूप से पीड़िता के प्रत्यक्ष बयान पर आधारित था।
कोर्ट ने कहा कि उसने अपने बयान में स्पष्ट कहा कि आरोपी ने उसे धर्मशाला में ले जाकर कपड़े उतारे, खुद भी निर्वस्त्र हुआ और लड़की के चिल्लाने पर वह भाग गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि बचाव पक्ष ने क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन में एक भी सवाल नहीं पूछा, इसका सीधा निष्कर्ष यह निकला कि उसका बयान अदालत में बिना शर्त स्वीकार किया गया।
लेकिन चूंकि मेडिकल साक्ष्य नहीं थे और आरोपी का कार्य “अपराध की तैयारी” के दायरे में था, इसलिए धारा 376/511 IPC लागू नहीं मानी जा सकती।
हाईकोर्ट का निष्कर्ष
राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी का कार्य “महिला की लज्जा भंग” (धारा 354 IPC) का स्पष्ट मामला है।
इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित धारा में संशोधन करना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने टोंक जिला अदालत का फैसला बदलते हुए आरोपी को धारा 376/511 के बजाय धारा 354 IPC के तहत दोषी माना।
इसके साथ ही अदालत ने सज़ा के बिंदु पर कहा कि अपराध के समय आरोपी 25 वर्ष से कम उम्र का था और घटना को 33 वर्ष से अधिक बीत चुके हैं।
कोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय में न्यायिक प्रक्रिया स्वयं ही दंड स्वरूप रही, इसलिए इतने वर्षों बाद आरोपी को दोबारा जेल भेजना न्यायसंगत नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने आरोपी द्वारा न्यायिक हिरासत में बिताई गई ढाई महीने की अवधि को “पहले से भुगती गई अवधि” के बराबर मानते हुए सज़ा सुनाई।
फैसले का असर
राजस्थान हाईकोर्ट का यह ऐतिहासिक और रिपोर्टेबल जजमेंट भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहता है—
- “प्रयास” और “तैयारी” दो अलग कानूनी अवस्थाएँ हैं।
किसी भी यौन अपराध में केवल नीयत, कपड़े उतारना, अश्लील हरकत जैसे व्यवहार “तैयारी” माने जाते हैं।
लेकिन “प्रयास” तब माना जाता है जब आरोपी ऐसा कदम उठाए जिससे अपराध लगभग पूरा होने वाला होता और पीड़िता यदि बचाव न करती तो अपराध हो ही जाता।
- लंबी अवधि तक किसी भी आरोपी के जीवन पर अपराध का दबाव और मुकदमे की मानसिक पीड़ा स्वयं ही एक दंड के समान होती है।
अदालत सज़ा देते समय केवल अपराध नहीं, बल्कि पूरा सामाजिक, जीवनकालिक और कानूनी परिप्रेक्ष्य भी देखती है।
Case Details : –
HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN BENCH AT JAIPUR
S.B. Criminal Appeal No. 272/1991
Suwalal Versus State of Rajasthan
JUDGMENT : REPORTABLE 13/05/2024
BENCH : JUSTICE ANOOP KUMAR DHAND
ADVOCATE FOR For Appellant : Ms. Anzum Parveen
ADVOCATE FOR For Respondent : Mr. Suresh Kumar, PP
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