नई दिल्ली, 15 सितंबर
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए एक फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है. फैमिली कोर्ट ने अपने आदेश में वास्तविक आय छिपाने वाली पत्नी को भरण-पोषण देने से इनकार किया था.
कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जो पत्नी अपनी आय का उचित खुलासा नहीं करती और यह साबित नहीं कर पाती कि वह भरण-पोषण में असमर्थ है, वह कानून के तहत भरण-पोषण का हकदार नहीं है.
हालांकि कोर्ट ने नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण के लिए पिता के दायित्व को कायम रखते हुए कहा कि बच्चे का हक माता-पिता के झगड़ों से प्रभावित नहीं होता ।
क्या था मामला?
मामला पूर्वी दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट से शुरू हुआ था, जहां पत्नी ने अपने और बेटे के लिए भरण-पोषण की मांग की.
पक्षकार कपल का 27 नवंबर, 2009 को विवाह हुआ और 28 अगस्त, 2010 को उनका बच्चा जन्मा।
पत्नी ने पति और ससुराल वालों पर शारीरिक, मानसिक और वित्तीय उत्पीड़न का आरोप लगाकर वैवाहिक घर छोड़ दिया.
इसके बाद उसने Cr.P.C. की धारा 125 के तहत 30,000 रुपये प्रति माह (20,000 खुद के लिए और 10,000 बच्चे के लिए) का भरण-पोषण मांगा.
पत्नी का दावा खारिज?
पत्नी ने दावा किया कि पति अच्छी नौकरी करता है और शानदार जीवन जीता है, जबकि वह खुद मुश्किल से खर्च चला रही है। जबकि पति की तरफ से तर्क दिया गया कि पत्नी ने अपनी वास्तविक आय छुपाई और बिना वजह घर छोड़ दिया।
पति ने फैमिली कोर्ट के आदेश के तहत बच्चे के भरण-पोषण के 16,000 रुपये को भी अधिक बताया।
जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने साफ कहा कि भरण-पोषण की मांग तभी जायज है जब पत्नी यह साबित कर सके कि वह खुद अपना खर्च उठाने में असमर्थ है.
लेकिन यहां पत्नी अपने तर्क को सबूतों से पुष्ट नहीं कर सकी। लिहाजा, उसे गुजारा भत्ता देने से अदालत ने इनकार कर दिया।
जस्टिस शर्मा की पीठ ने कहा कि धारा 125 का उद्देश्य पत्नी और बच्चों को आर्थिक असुरक्षा से बचाना है। पत्नी के भरण-पोषण के दावे पर कोर्ट ने देखा कि उसने 2016 में 33,052 रुपये मासिक वेतन प्राप्त किया था और आयकर रिटर्न में 4,00,724 रुपये वार्षिक आय दिखी.
हालांकि, बाद में उसने दावा किया कि उसकी सेवा अस्थायी आधार पर 10,000 रुपये मासिक पर चली गई, लेकिन यह साबित नहीं कर सकी.
कोर्ट ने कहा कि बिना लेटेस्ट सैलरी स्लिप या फॉर्म-16 पेश किए पत्नी के दावे को ठोस नहीं माना जा सकता है.
”बच्चे का हक झगड़े से ऊपर”
हालांकि, जब बात बच्चे की आई तो कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया.
नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण के मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे का हक माता-पिता के झगड़े से प्रभावित नहीं होता.
इसके साथ ही पिता की 58,000 रुपये मासिक आय के आधार पर बच्चे के लिए 16,000 रुपये प्रति माह का भरण-पोषण अत्यधिक नहीं माना गया और फैमिली कोर्ट का आदेश कायम रखा गया।