लोअर ज्यूडिशरी में बढ़ रही महिला जजों की संख्या, लेकिन उच्च न्यायपालिका में अभी भी लंबा इंतजार
नई दिल्ली। देश आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है। यह दिन केवल महिलाओं की उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि समाज और संस्थाओं में उनके प्रतिनिधित्व की स्थिति पर गंभीरता से विचार करने का भी अवसर है।
पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं ने राजनीति, प्रशासन, विज्ञान, शिक्षा, सेना और न्यायपालिका सहित लगभग हर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
फिर भी एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ महिलाओं की भागीदारी अभी भी अपेक्षाकृत सीमित है—और वह है देश की उच्च न्यायपालिका।
अधीनस्थ न्यायपालिका यानी लोअर ज्यूडिशरी में पिछले एक दशक में महिला न्यायाधीशों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अभी भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है।
यही कारण है कि महिला दिवस के मौके पर यह सवाल फिर चर्चा में है कि क्या आने वाले समय में भारत की न्यायपालिका में भी एक “पिंक रिवोल्यूशन” देखने को मिलेगा।

लोअर ज्यूडिशरी में बढ़ी महिलाओं की भागीदारी
पिछले एक दशक में न्यायिक सेवाओं की परीक्षाओं में बड़ी संख्या में महिलाएं सफल हुई हैं। कई राज्यों में अधीनस्थ न्यायपालिका में महिला जजों का अनुपात लगातार बढ़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल संयोग नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का परिणाम है।
पहले जहां न्यायपालिका को पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था, वहीं अब बड़ी संख्या में महिलाएं कानून की पढ़ाई कर रही हैं और न्यायिक सेवाओं की परीक्षाओं में हिस्सा लेकर जज बन रही हैं।
इसका असर अदालतों की कार्यप्रणाली पर भी दिखाई देने लगा है। कई मामलों में महिला जजों की संवेदनशील दृष्टि न्याय प्रक्रिया को और अधिक मानवीय और संतुलित बनाती है।

लॉ कॉलेजों में छात्राओं की बढ़ती संख्या
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का सबसे बड़ा संकेत शिक्षा क्षेत्र में दिखाई देता है।
आज देश के अधिकांश लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में कानून की पढ़ाई करने वाली छात्राओं की संख्या कई जगह छात्रों से अधिक हो चुकी है।
कानून की पढ़ाई अब महिलाओं के लिए केवल एक डिग्री नहीं बल्कि एक मजबूत करियर विकल्प बन गई है।
पहले जहां सीमित संख्या में छात्राएं विधि शिक्षा की ओर आती थीं, वहीं अब बड़ी संख्या में छात्राएं इस क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं और अपने करियर को वकालत, न्यायिक सेवा, कॉर्पोरेट कानून और शोध जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ा रही हैं।
बढ़ा महिला अधिवक्ताओं का पंजीकरण
यह सकारात्मक बदलाव बार काउंसिल के आंकड़ों में भी दिखाई देता है। पिछले एक दशक में देशभर में नए अधिवक्ताओं के रूप में पंजीकृत होने वाली महिलाओं की संख्या कई गुना बढ़ी है।
वकालत का पेशा अब महिलाओं के लिए अधिक स्वीकार्य और आकर्षक बनता जा रहा है।
न्यायालयों में महिला अधिवक्ताओं की उपस्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देती है।
हालांकि, वरिष्ठ पदों और न्यायिक नियुक्तियों तक पहुंचने में महिलाओं को अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि बार में महिलाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद उच्च न्यायपालिका में उनका प्रतिनिधित्व अभी सीमित है।

उच्च न्यायपालिका में अभी भी कम प्रतिनिधित्व
लोअर ज्यूडिशरी में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों की संख्या अभी भी अपेक्षाकृत कम है।
भारत को महिला राष्ट्रपति, महिला प्रधानमंत्री, कई महिला मुख्यमंत्री और राज्यपाल मिल चुके हैं, लेकिन देश को अभी भी अपनी पहली महिला मुख्य न्यायाधीश (CJI) के लिए इंतजार करना पड़ रहा है।
2027 में बन सकती हैं देश की पहली महिला CJI
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस बी.वी. नागरत्ना सितंबर 2027 में भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने की कतार में हैं।
यदि ऐसा होता है तो यह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण होगा।
सुप्रीम कोर्ट में अब तक केवल 11 महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति हुई है। 31 अगस्त 2021 को पहली बार एक साथ तीन महिला न्यायाधीशों ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ ली थी। उस समय यह न्यायपालिका में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का महत्वपूर्ण संकेत माना गया था।

सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों की स्थिति
फरवरी 2026 में लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने बताया कि वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के 33 न्यायाधीशों में केवल एक महिला न्यायाधीश कार्यरत हैं—जस्टिस बी.वी. नागरत्ना।
जुलाई 2022 का समय सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय रहा जब एक साथ चार महिला न्यायाधीश सर्वोच्च अदालत में कार्यरत थीं। यह संख्या अब तक की सबसे अधिक थी।
पहली महिला जज मिलने में लगे चार दशक
भारत के सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान स्वरूप 1950 में स्थापित हुआ था, लेकिन पहली महिला न्यायाधीश मिलने में लगभग चार दशक लग गए।
6 अक्टूबर 1989 वह ऐतिहासिक दिन था जब जस्टिस फातिमा बीवी को सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
उन्होंने 1950 के दशक में अधिवक्ता के रूप में अपना करियर शुरू किया और 1958 में केरल अधीनस्थ न्यायिक सेवा में मुंसिफ बनीं। इसके बाद 1983 में वे केरल हाईकोर्ट की जज बनीं और 1989 में सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला न्यायाधीश के रूप में इतिहास रचा।
वकील कोटे से पहली महिला जज बनने में लगे 68 साल
सुप्रीम कोर्ट में वकील कोटे से किसी महिला के न्यायाधीश बनने में भी लंबा समय लगा।
वर्ष 2018 में जस्टिस इंदु मल्होत्रा सुप्रीम कोर्ट में वकील कोटे से नियुक्त होने वाली पहली महिला जज बनीं।
यह नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के 68 वर्ष बाद संभव हो सकी।
हाईकोर्ट में भी स्थिति बहुत अलग नहीं
देश के कई हाईकोर्ट में महिला जजों की नियुक्ति में लंबा समय लगा। कई हाईकोर्ट में तो चार दशक तक कोई महिला जज ही नहीं बनी।
कुछ जगह पहली महिला जज बनने में ही 50 साल से अधिक का समय लग गया।
राजस्थान हाईकोर्ट का अनुभव
राजस्थान हाईकोर्ट की स्थापना 29 अगस्त 1949 को हुई थी। लेकिन यहां पहली महिला न्यायाधीश बनने में लगभग 39 वर्ष लग गए।
1978 में जस्टिस कांता भटनागर राजस्थान हाईकोर्ट की पहली महिला जज बनीं।
अधिवक्ता कोटे से पहली महिला जज
राजस्थान हाईकोर्ट में अधिवक्ता कोटे से पहली महिला न्यायाधीश बनने का गौरव जस्टिस रेखा बोराणा को मिला।
उनकी नियुक्ति से पहले न्यायिक सेवा से राजस्थान की पांच महिला जज नियुक्त हो चुकी थीं, लेकिन अधिवक्ता कोटे से किसी महिला का चयन होने में लगभग सात दशक लग गए।
जस्टिस रेखा बोराणा की नियुक्ति को राजस्थान की न्यायपालिका में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना गया। उनके बाद जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी की नियुक्ति ने महिला अधिवक्ताओं के लिए न्यायिक क्षेत्र में प्रवेश की नई उम्मीद पैदा की।
राजस्थान हाईकोर्ट में चार महिला जज
राजस्थान हाईकोर्ट में वर्तमान में चार महिला जज कार्यरत हैं—
- जस्टिस रेखा बोराणा
- जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी
- जस्टिस शुभा मेहता
- जस्टिस संगीता शर्मा
हालांकि हाईकोर्ट में स्वीकृत 50 पदों के मुकाबले यह संख्या कम है, लेकिन इतिहास के संदर्भ में इसे महत्वपूर्ण प्रगति माना जा रहा है।
अब तक केवल 14 महिला जज
राजस्थान हाईकोर्ट की स्थापना से लेकर अब तक कुल 243 जज नियुक्त हुए हैं, जिनमें केवल 14 महिला जज रही हैं।
इनमें कुछ जज अन्य हाईकोर्ट से तबादले के माध्यम से राजस्थान हाईकोर्ट में आई थीं।
शीतल मिर्धा की नियुक्ति का इंतजार
राजस्थान हाईकोर्ट कॉलेजियम ने अधिवक्ता शीतल मिर्धा का नाम हाईकोर्ट जज के लिए भेजा था।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 5 मार्च 2025 को उनकी नियुक्ति की सिफारिश केंद्र सरकार को भेज दी थी।
लेकिन लगभग एक वर्ष बाद भी उनकी नियुक्ति लंबित है। अन्य सभी नामों को मंजूरी मिल चुकी है, जबकि शीतल मिर्धा की फाइल अभी भी कानून मंत्रालय में लंबित बताई जा रही है।
न्यायपालिका में महिलाओं की मौजूदगी क्यों महत्वपूर्ण
अदालतों में महिला जजों की मौजूदगी केवल प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं है। यह उन लाखों महिलाओं के लिए विश्वास का प्रतीक है जो न्याय की उम्मीद लेकर अदालत की चौखट तक पहुंचती हैं।
घरेलू हिंसा, लैंगिक उत्पीड़न, कार्यस्थल पर भेदभाव जैसे मामलों में महिला जजों की मौजूदगी कई बार पीड़ित महिलाओं को अपनी बात खुलकर रखने का साहस देती है।
महिला आरक्षण से मिलेगी मजबूती
हाल ही में 8 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद देशभर के बार काउंसिल में कम से कम 30 प्रतिशत सीटें महिला वकीलों के लिए आरक्षित रखने का प्रावधान तय किया गया.
सुप्रीम कोर्ट के बाद बीसीआई ने इसे देशभर में लागू कर दिया हैं जिसका प्रभाव आने वाले समय में सामने आएगा.
भविष्य की उम्मीद
महात्मा गांधी ने कहा था-
“जिस बात को हम खुद पर लागू नहीं करते, उस पर दूसरों को उपदेश नहीं दे सकते।”
न्यायपालिका को इस नजरिये से नहीं परखा जा सकता, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि न्याय की सर्वोच्च संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी सीमित है।
हालांकि शिक्षा, वकालत और लोअर ज्यूडिशरी में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इस बात का संकेत है कि आने वाले वर्षों में न्यायपालिका की तस्वीर बदल सकती है।
संभव है कि आने वाले समय में भारतीय न्यायपालिका में भी वह दिन आए जब महिलाओं की भागीदारी केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि निर्णायक हो-और तब शायद देश की अदालतों में सचमुच एक “पिंक रिवोल्यूशन” दिखाई दे।